Showing posts with label Tantra. Show all posts
Showing posts with label Tantra. Show all posts

Sunday, January 25, 2026

केतु कमाल भी करता है लेकिन

Media Link on Sunday 25th January 2026 at 2:30 AM  Regarding Ketu in Tantra Screen 

लेकिन केतु के हिसाब किताब भी बहुत बारीकी वाले होते हैं

लुधियाना: 25 जनवरी 2026: (मीडिया लिंक 32//तंत्र स्क्रीन डेस्क)::

साभार तस्वीर 
राहू को शायद आम तौर पर अधिक लोग जानते हैं। हालांकि केतु की शक्तियां भी कम नहीं होती लेकिन राहू की प्रकृति ही ऐसी है कि वह लोगों के दिलों पर राज करने वाली स्थिति में जल्दी पहुँच जाता है। हालांकि केतु महाराज भी कम नहीं हैं। कई बार केतु ही कमाल करता  है। केतु की अपनी क्षमता है जिसकी विशेषता बिलकुल ही अलग है। जो लोग भोग विलास को छोड़ने की कल्पना भी नहीं कर सकते उन्हें केतु ही सदमार्ग दिखाता है। उस समय केतु की बात मान कर ही ज़िंदगी के सही राह नज़र आते हैं। कई बार जीवन तक का संकट केतु की कृपा से ही दूर होता है। ऐसे में चिंतन मनन बहुत बढ़ जाता है। वह भी इतना ज़्यादा  कि कई बार जातक सन्यास लेना ही सही समझता है।  वत्व होता यह सब उन कर्मों का ही फल है जो जातक का मन इस शरीर के ज़रिए करता है। आम तौर पर तब जब केतु शरीर को बहुत से कष्ट देने लगता है।  

केतु के हिसाब किताब भी बहुत बारीकी वाले होते हैं। मीन राशि (Pisces) में पंचम भाव (5th House) में केतु (Ketu) की स्थिति व्यक्ति को आध्यात्मिक, रचनात्मक और अंतर्ज्ञानी बनाती है, लेकिन यह प्रेम, संतान और शिक्षा के मामलों में चुनौतियां दे सकती है। व्यक्ति को मानसिक तनाव, संतान संबंधी देरी या समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है, हालाँकि, यह स्थिति व्यक्ति को गूढ़ विद्याओं और रिसर्च में गहरी रुचि भी दे सकती है जो सभी के नसीब में नहीं होती। इस रूचि के चलते ही करियर में अचानक सफलता मिल सकती है पर साथ ही यह ज़रूरी है कि अहंकार त्याग कर काम किया जाए। इस त्याग के बाद ही होते हैं कमाल। केतु जब कमाल करता है तो वह समय भी हैरानकुन होता है। सचमुच कमाल से भी बड़ा कमाल कर देता है। 

केतु की प्रकृति की चर्चा करें तो इसके बहुत से सकारात्मक पहलू भी हैं जिन्हें अंग्रेज़ी में हम लोग अक्सर Positive Aspects कहते हैं। केतु के प्रभाव में आए व्यक्ति का आध्यात्मिक विकास भी होने;लगता है। कई बार तो आध्यात्मिक विकास बहुत तेज़ी से होने लगता है। यह स्थिति इतनी तेज़ी से बदलती है की व्यक्ति को आध्यात्मिक  बनाती है और किसी दिव्य रंग में रंगती महसूस होने लगती है। इसके साथ ही रहस्यवाद और गूढ़ विद्याओं में भी रुचि बढ़ाती है।जिससे इंसान कुछ का कुछ बन जाता है। उसे दैवी कृपा बरसती महसूस होने लगती है। 

केतु जब अपने ढंग तरीके से अपना प्रभाव डालता है तो रचनात्मकता और बुद्धिमत्ता भी तेज़ी से बढ़ने लगती है।  इसका परिणाम यह होने लगता है कि व्यक्ति बहुत क्रिएटिव होना शुरू हो जाता है। उसमे रिसर्च और विश्लेषण करने की क्षमता का गन भी आने लगता है। सिर्फ आता ही नहीं तेज़ी से विकसित भी होने लगता है। उसकी शख्सियत आकर्षक भी बनने लगती है और वह दूसरों को प्रभावित भी करने लगता है। लोग उसकी बात मानने भी लगते हैं। उसकी लोकप्रियता भी बढ़ने लगती है। इन सब के परिणामस्वरूप उनकी आमदनी में भी वृद्धि होने लगती है। पैसा आने से उसे मिली सफलता की चमक भी पूरी दुनिया की नज़र में भी आने लगती है। देहते ही देखते वह छाने भी लगता है। 

करियर के मामले भी केतु के प्रभाव में आए सबंधित व्यक्ति की तरक्की होने लगती है। सफलता बहुत तेज़ी से उसके कदम चूमने लगती है। अंतर्दृष्टि और सहायता की आवश्यकता वाले करियर जैसे कि ज्योतिष, रिसर्च, हीलिंग इत्यादि में सफलता बहुत तेज़ी से मिल सकती है।  लेकिन यहां यह भी ज़रूरी है कि ऐसी स्थिति में अहंकार का त्याग आवश्यक है। अहंकार त्यागने पर ही करियर में चमक आती है।अहंकार को केतु बाबा भी अच्छा नहीं समझता। 

इसके साथ ही रिश्तों में गहराई भी आने लगती है। रिश्ते में अंतरंगता और गहराई की इच्छा भी बढ़ती है। गहराई बढ़ने से रिश्ते बहुत अच्छे होने लगते हैं। रिश्ते अच्छे होते हैं तो काम भी बनने लगते हैं और जीवन में सफलताएं मिलने लगती हैं। 

सकारत्मक पक्ष की तरह केतु महाराज के भी नकारात्मक पहलू होते हैं। इनकी गंभीरता भी कम नहीं होती। ज़िन्दगी भर इनका भी असर पड़ता है। इनमें संतान संबंधी चिंताएँ प्रमुखता से छै रहती हैं। ऐसे में संतान प्राप्ति में देरी या समस्याएं भी हो सकती हैं या फिर संतान से जुड़ी चिंताएँ भी रह सकती हैं।  अगर संतान की चिंता लग जाए तो पूरी ज़िंदगी पर इसका प्रभाव पड़ता है। ऐसे बहुत से मामले देखे हैं। केतु महाराज की पूजा अर्चना से उन्हें फायदा भी हुआ। 

केतु जी नाराज़गी के सुर में हों तो मानसिक तनाव भी बढ़ने लगता है। लोगों से दूर हो कर एकांतप्रियता का विचार छाने लगता है। धैर्य की कमी होने लगती हैजिसके परिणाम स्वरूप काम बिगड़ने लगते हैं। यह सब देर तक रहे तो मानसिक तनाव या अवसाद का सामना भी करना पड़ सकता है। 

दोस्ती के साथ साथ प्यार और रिश्ते भी केतु से प्रभावित होते हैं। कई बार तो बहुत बुरी तरह से भी प्रभावित होते हैं। केतु जी नाराज़ हैं तो प्रेम संबंधों में उतार-चढ़ाव या कर्मिक बाधाएँ आ सकती हैं। इंसान सोचता ही रह जाता है कि सुबह तक तो सब ठीक ठाक था अब अचानक यह सब क्या हुआ कि सब कुछ उल्टपुल्टा हो गया।  

मोहतरमा अंजुम रहबर साहिबा की पंक्तियाँ याद आ रही हैं : 

मिलना था इत्तिफ़ाक़ बिछड़ना नसीब था

वो उतनी दूर हो गया जितना क़रीब था।  ऐसी बहुत सी बातें सिर्फ शायरी में ही नहीं बल्कि हकीकत में भी सच होती हैं। ऐसा बहुत बार सच होते हुए अपनी आँखों से भी देखा। 

केतु अगर प्रकोप दिखाने लगे तो स्वास्थ्य से सबंधित बहुत सी समस्याएं भी खड़ी होने लगती हैं। कई बार स्वास्थ्य की स्थिति चिंताजनक हद तक बिगड़ने लगती है। स्वास्थ्य में बिगाड़ अत है तो पेट और पाचन संबंधी समस्याएं गंभीर हो कर खड़ी होने लगती हैं। स्वास्थ्य की चिंता को लेकर कई और खतरे भी बढ़ने लगते हैं। इन खतरों में से एक खतरा है ऊँचाई से गिरने का खतरा। इस तरह गिरने से गंभीर चोट भी लग सकती है।  इसलिए केतु जी से बना कर रखो। बना कर रखो का मतलब उनके कहे में रहो। नहीं रहोगे तो वह अपने ढंग से मनवा लेंगें। 

यहां यह भी याद रखने वाली बात है कि मीन राशि में पंचम भाव का केतु एक जटिल स्थिति है, जो आध्यात्मिक और बौद्धिक गहराई के साथ-साथ भावनात्मक और पारिवारिक चुनौतियों को भी जन्म देता है, जिसके लिए ध्यान, धैर्य और अहंकार त्यागने की आवश्यकता होती है ताकि इसके शुभ प्रभावों को बढ़ाया जा सके। केतु का प्रभाव बहुत ही संवेदनशील क्यूँ और कैसे होता है इसकी चर्चा भी की जाएगी लेकिन जल्द ही किसी अलग पोस्ट में।  

Sunday, January 11, 2026

शनि हालात भी बदल देता है और दॄष्टि भी

Media Link on 10th January 2026 Regarding Seven and a half years of Saturn//Tantra Screen

ढैया और साढ़ेसाती रहस्य्मय भी होते हैं और बहुत ही अर्थपूर्ण भी 

लुधियाना: 11 जनवरी 2026: (मीडिया लिंक 32//तंत्र स्क्रीन डेस्क )::

ज़िंदगी के हालात भी और दुनिया के हालात भी
Pinterest से साभार 
काफी लंबे समय से अस्थिरता वाले चल रहे हैं। अगर सोच विचार और चिंतन मनन कर के कुछ किया जाए तो भी बात नहीं बनती क्यूंकि सोचा कुछ और ही जाता है और सामने कुछ और ही आता है। कई दिनों से मन में भी बेचैनी चल रही है। कभी कम हो जाती है और कभी ज़्यादा। कोशिश कर रहा था कि इस बेचैनी के स्रोत  तक पहुंचा जाए। कौन करता है मन में बदलाव? कई पहलू सामने भी आए लेकिन मामला किसी स्पष्ट तस्वीर की तरह सामने नहीं आया। 

शनि का मीन राशि में गोचर (Transit) मीन राशि वालों के लिए साढ़ेसाती का दूसरा चरण शुरू करता है, जो वास्तव में आत्म-मंथन, चुनौतियों और कड़ी मेहनत में एकरस होने का समय होता है, जहां धैर्य और ईमानदारी से काम लेने पर ही सफलता मिलेगी, खासकर करियर और रिश्तों के मामलों में, क्योंकि शनि आपकी राशि में रहकर आपके लग्न, पराक्रम, सप्तम और दशम भाव पर दृष्टि डालेंगे, जिससे भावनात्मक मजबूती और जिम्मेदार निर्णय लेने की सीख भी मिलेगी और क्षमता भी।  

मीन राशि पर शनि गोचर का प्रभाव बहुत गहरा भी है और ज़ोरदार भी। इसकी मुख्य बातें बहुत बारीकी से जीवन को प्रभावित करती हैं। जीवन इनसे प्रभावित होता भी है। इसका यह प्रभाव जातक को तो महसूस होगा ही दुनिया को भी इस बदलाव की चमक महसूस होगी। 

चूंकि यह साढ़ेसाती का दूसरा चरण है इसलिए इसका प्रभाव भी अधिक है। यह चरण आत्म-विश्लेषण का समय है और साथ ही गलतियों से सीखने और जीवन में सुधार का भी समय है।  जीवन में आवश्यक सुधार इतनी तेज़ी से आएगा की दुनिया भी इस प्रभाव को नोय करेगी । इस सब के चलते अधिक मेहनत और धैर्य की आवश्यकता होगी। ऐसी मेहनत ला फायदा भी ज़रूर होगा इसके परिणाम भी सामने आएंगे। ज़िंदगी पहले से बेहतर बनेगी लेकिन कभी कभी मूषकजीलें बढ़ने का अहसास भी होगा।  

इस दौरान सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि आत्म-मंथन का समय एक सुअवसर की तरह मिलेगा। शनि आपके लग्न में होने से यह आत्म-मंथन और आत्म-विश्लेषण का समय है, जहां भावनात्मक रूप से मजबूत होकर जिम्मेदारी से फैसले लेने होंगे। किस किस ने क्यूं आपके साथ धोखा किया इसका स्पष्ट विवरण आप अपने दिल दिमाग में किसी फिल्म की तरह देख सकेंगे। जो लोग आपके अपने बन कर किसी अज्ञात रहस्य की तरह बने हुए थे उनके चेहरे और सोच आपके सामने स्पष्ट रूप से सामने आएगी। 

इसी दौरान कड़ी मेहनत और धैर्य का साथ बनाए रखना। नौकरी और व्यापार में भी चुनौतियां आएंगी। सफलता के लिए आनंद लेकर मेहनत करना और धैर्य बनाए रखना जरूरी है। इसी से बदलेंगें बरसों पुराने हालात। एक नै और चमकदार दुनिया आपके सामने आएगी। यह इस बदलाव का ही हिस्सा होगा। 

रिश्ते और वैवाहिक जीवन में भी काफी तबदीली आएगी। बहुत सी उलझनों भी अहसास हो सकता है लेकिन जीवनसाथी के साथ हर हाल में अनबन से ज़रूर बचें। रिश्तों में प्यार बनाए रखने की कोशिश करें इसके अच्छे परिणाम सामने आएंगे। इस साढ़ेसाती के दौरान भाई-बहनों से संबंध सुधर सकते हैं जिसे आप बहुत अच्छा महसूस करेंगे। इन सुधरे संबंधों का प्रभाव आपके जीवन पर नज़र भी आएगा। 

इसी दौरान करियर और धन की स्थिति में भी बेहतरी आएगी। करियर में स्थिति अनुकूल रहेगी, धन को संतुलित रहते हुए बहुत सोच समझ कर ही खर्च करें। हालांकि भविष्य में अच्छे धन लाभ के योग हैं फिर भी खर्च सोच समझ कर ही किया जाना चाहिए। इस बेहतरी के चलते विदेश यात्रा के भी अवसर बन सकते हैं। 

इसी बेहतरी के चलते स्वास्थ्य की सावधानी भी ज़रूरी रहेगी। लाइफस्टाईल और खान पान के चलते वायु तत्व असंतुलित हो सकता है जिसकी मुश्किलें कई बार ज़्यादा बिगड़ जाती हैं। एसिडिटी की समस्या भी गंभीर हो सकती है। इसी बदलाव के चलते कुछ बातों का विशेष ध्यान रखें । छोटी बातों को बड़ा न बनाएं और जोखिम से बचें।  वैसे तो दान दक्षिणा का स्वभाव संवेदना को बढ़ता है कर कई अच्छेपरनाम देता है। शनि की साढ़ेसाती में भी दान के उपाय बताए जाते हैं।

चलते चलते आपको यह जानकारी भी दे दें कि इस साढ़ेसाती के चलते क्या करें उपाय। शनिवार को काले तिल और साबुत उड़द दाल का दान करें। ऐसे में स्वास्थ्य लाभ मिलेगा। इसके आलावा भी खानपान और लाइफस्टाइल में सात्विक खानपान बेहतरी देगा। 

सात्विक खानपान के साथ साथ पूजापाठ की तरफ ध्यान देना भी अच्छा रहेगा। मानसिक एकाग्रता और मानसिक शांति बढ़ जाती है। भगवान लक्ष्मीनारायण और हनुमान जी की पूजा करें, हनुमान चालीसा का पाठ करें। इससे तन मन को लाभ मिलेगा और  और मानसिक शांति बढ़ेगी।  

शनि की साढ़ेसाती के उपायों में पीपल के वृक्ष के नीचे तेल का दीपक जलाने को अच्छा कहा जाता है। इसमें काला तिल डालकर जलाना इसे और भी बेहतर बना देता है। कई लोग तो इसे नियमित तौर पर अपने रखते हैं। पीपल के पेड़ के नीचे दीपक जलाने से विशेष तरंगें उठती हैं। 

गरीबों को अन्न दान करें और गाय को हरा चारा खिलाएं। इससे से लाभ उठाने वाले के दिल दिमाग से जो तरंगें उठती हैं वे आपकी बेहतरी के सुअवसरों को चुंबक की तरह खींच लाती हैं। संवेदनशील जातकों को इन तरंगों की अनुभूति भी होने लगती है। इन न ुभूतियों से ही जातक अपनी अभिव्यक्ति भी बहुत मधुर होने लगती है।  

इसी सिलसिले में संक्षेप में कहा जा सकता है कि यह समय चुनौतियों से भी भरा है और सुअवसरों से भी भरा है।  चुनौतियाँ स्वीकार करके ही हालात को अपने पक्ष में बदला जा सकेगा। लेकिन मानसिक शांति और एकाग्रता सही दिशा में मेहनत के तरीके और मार्ग बताएगी। धार्मिक उपायों से शनिदेव की कृपा भी प्राप्त की जा सकती है।

यह  कृपा शरीरक और मानसिक दोनों तरफ से आएगी और आत्मा की चमक चेहरे पर भी सपष्ट दिखने लगेगी। इन्हीं तब्दीलियों के चलते जीवन में सकारात्मक बदलाव लाए जा सकते हैं।  इन तब्दीलियों को आप ही नहीं आपके आसपास के माहौल में रहने वाले भी महसूस कर पाएंगे। 

---------

Monday, November 17, 2025

स्वप्न विजय साधना सिद्ध हो जाए तो बहुत काम देती है...!

स्वप्न विजय साधना सिद्ध हो जाए तो बहुत काम देती है...!

यादों की दुनिया से कुछ अनुभूतियां 16 नवंबर 2025: (रेक्टर कथूरिया/ /तंत्र स्क्रीन डेस्क )::


बहुत पहले की बात है।
ज़िंदगी की गर्दिश ने परेशान कर रखा था।  कोई रास्ता नहीं सूझता था। आत्म हत्या तो हमेशां ही बुरी ही लगी बिलकुल उसी तरह जैसे जीवन की जंग को हार जाना। कमज़ोर से कमज़ोर और बुरे से बुरे व्यक्ति को भी कभी हार अच्छी नहीं लगती ।  ऐसे में बहुत बार ख्याल आता बस भगवान् ही सहारा है। लेकिन ख्याल तो ख्याल ही होता है। उसे एक्शन में साकार किए बिना बात नहीं बनती और इसे एक्शन में साकार करना आसान नहीं होता। फिर भी इसका स्पष्ट इशारा मिला मुझे हरिद्वार की अनौपचारिक यात्रा में।   मैं उस समय ऊँगली पकड़ कर तो नहीं चलता था लेकिन स्वतंत्र भागदौड़ की समझ भी नहीं आई थी। मेले में खोने का डर मुझे खुद भी बना रहता और साथ वालों को भी।  हरिद्वार में हर की पौड़ी,  बड़े बड़े पहाड़, मंदिर,  मूर्तियां और कल कल बेहटा गंगा जी का जल बहुत अच्छा लगता।  मेरे सबसे बड़े मामा के घर लखनऊ में उनकी बेटी या बेटे की की शादी थी। वहां से लौटते हम लोग हरिद्धार के दर्शनों के लिए चल पड़े।  मेरे बाकी के तीन मामा परिवार सहित साथ थे। हम लोग ट्रेन से हरिद्वार पहुंचे थे ,स्टेशन पर गाड़ी पहुँचने से पहले ही माहौल बहुत सुंदर और अध्यतमियक होता चला गया। मेरी उम्र दस बरस से भी बहुत कम थी लेकिन मैं रेलवे स्टेशनों के बोर्डों पर लिखे नाम पढ़ने के प्रयास करने लगा था। 

स्टेशन से बाहर निकले तो मेरे मामा हमें उस आश्रम/कम धर्मशाला की तरफ लेजाने लगे जिसे उन्होंने अपने हाथों अपनी देखरेख में बनवाया था। उस समय वह ठेके दारी का काम करते थे। इस प्रोजेक्ट को पूरा करवाए शायद उन्हें कुछ देर हो गई थी या फिर आसपास बहुत से बदलाव आ गए थे कि उन्हें बार बार रस्ते भू ;  रहे थे। कभी एक सड़क पर  बढ़ते और हूँ फिर का फिर वहीँ चौराहे पर आ जाते। यह जगह हर की पौड़ी के नज़दीक ही थी। अगर हर की पौड़ी की तरफ मुँहकरो तो पीठ के पीछे बाजार था। उसी बाजार में चल कर आगे से आश्रम की तरफ रास्ता निकलता था। 

मैं उस समय हरिद्वार में पहली बार गया था पर न जाने मुझे क्या हुआ। मुझे ऐसा लगने लगा कि मैं यहाँ पहले भी आ चुका हूँ। मैंने मां जी से पूछा आप मुझे उस आश्रम का नाम बताएं। वे मेरी बात पर हँसे भी लेकिन उन्हीने नाम बताया और उस रस्ते पर बढ़ने तो राह में आने वाले कुछ पॉइंट भी बताए ,सब सुन कर मेरे मुँह से निकला अब समझ गया ,मैं उन्हें रास्ता बताता गया हम सब आगे बढ़ते गए और कुछ मिनटों बाद ही मां कहने लगे आ गए हम सही राह पर। मैंने उन्हें मोड़ मुद कर आने वाली दुकानों और अन्य इमारतों के नाम और निशानियां भी बताईं। 

आश्रम पहुँचने पर हमने भोजन भी किया और आराम भी। सभी ने मुझे बहुत पूछा तुम तो कहते थे तुम यहाँ पहली बार आए हो। फिर यह सारा रास्ता कैसे जानते हो ?  मैंने उन्हें लाख समझाया कि यह सब मैंने अपने स्वप्नों में कई बाद देखा हुआ है। मैं खुद हैरान था कि स्वप्न में देखे स्थल और नाम इतने साकार हो कर सामने कैसे आ रहे हैं? किसी ने मेरी बात पर यकीन नहीं किया। मुझे खुद भी अपने बारे में भरम जैसी स्थिति लगने लगी थी लेकिन यह सब सच था। यह सपनों का वह सच सामने आया था जी हकीकत से भी बड़ा सत्य बन कर दिखाई दे रहा था। मेरे लिए यह सचमुच बहुत बड़ी अनुभूति थी। इस सच की चमक मेरी तन मन की आंखों को चुंधिया रही थी। मन में की सवाल खड़े हो रहे थे जिनका जवाब मुझे नहीं मिल रहा था। शायद अध्यात्म और तंत्र साधना की तरफ मेरी उत्सुकता जन्म ले चुकी थी। 

वहां आश्रम में मौजूद कुछ साधू बाबाओं से भी इस पर पूछा। बहुतों ने तो मेरी बात हंसी में उड़ा दी लेकिन कुछ गंभीर लोग भी मिले। कहने लगे इस ज्योति को जलाए रखना। जिस दिन यह बड़ी जवका बनेगी उस दिन सही यात्रा पर निकल जाओगे। यही ज्योति रस्ते भी बटेगी और संसाधन भी सहायता भी यही करेगी पर इस ध्यान केंद्रित रखना। फिर एक बाबा ने स्वप्नों के विज्ञानं की चर्चा भी की। साथ ही सावधान भी किया की इस रस्ते पर बढ़े तो दुनियादारी की पढ़ाईलिखि बहुत पीछे छूट जाएगी। 

क्या होती है स्वपन विजय साधना यह सवाल मेरे सामने गंभीर होता जा रहा था। हरिद्वार में बहुत कुछ दर्शनीय और बेहद सुंदर है लेकिन मेरे सामने बस यही सवाल मुंह बाएं खड़ा  था। उम्र भी छोटी थी और समझ भी बहुत छोटी। उस अल्पबुद्धि में इस सवाल को समझ पाने की क्षमता भी शायद नहीं थी। इसी बीच परिवार के लोगों के सवाल और बातें मुझे सब डिस्टर्ब कर रहे थे। शांत बैठ कर सोच भी नहीं पा रहा था। पता नहीं कब मैं लेते लेते उठा और फिर सीधा बैठ गया। दीवार के साथबड़ा सा सिरहाना भी मिला। लेकिन सिरहाने के बावजूद रीढ़ सीढ़ी हो गई पदम् आसन भी लग गया। आँखें भी बंद हो गई। कुछ ही मिंट गुज़रे थे। स्वप्न विजय साधना का अण्वस्स्ड मन ही ही मन चलने लगा। 

उन बंद आँखों से मन देख भी रहा है,  कुछ पूछ भी रहा है और कुछ सुन भी रहा है। अनकही बातें बिना कहे कही जा रही थी। इन बातों को बिना कानों के सुने सुना भी जा रहा था। उन बंद आँखों से भी बहुत कुछ देखा रहा था। एक फ़िल्मी गीत याद है शायद फिल्म अनुराग का। जिसमें नायक बिना आँख वाली उस नायिका से पूछता है अरे तूने कैसे जान लिया?  जवाब मिलता है - -मन से आँखों का काम लिया  का काम लिया। 

बाद में इस लोकप्रिय फिल्म की बेहद खूबसूरत नायिका की ऑंखें ठीक हो जाती हैं। उसे फिल्म वाली कहानी के ही एक बच्चे की ऑंखें लगाई जाती हैं। बच्चे का देहांत हो चुका होता है।  ठीक होने के बाद वह नायिका उस बच्चे को देखना चाहती है - -उसे ढूंढ़ने की कोशिश करती है लेकिन वह तो जा चुका होता है। अनुमान लगाएं उसे रौशनी देने वाली ज़िंदगी जा चुकी होती है तो उस पर क्या गुज़री होगी? हमारी ज़िंदगी भी कुछ ऐसी ही रहती है। हम बहुत कुछ खो बैठते हैं। पाना - खोना - -खोना पाना बस यही एक सिलसिला है ज़िंदगी। खैर बात तो चल रही थी हरिद्वार के एक आश्रम की। वहां पर मेडिटेशन जैस स्थिति में चल रहे एक स्वप्न की। चलो लौटते हैं उसी मुद्दे पर। 

उस समय आश्रम में बैठे हुए जो मनोस्थिति थी उस समय स्वप्न जैसे कुछ दृश्य भी चल रहे हैं। अधखुली आलखों जैसी सी स्तिति भी कह सकते हैं। कुछ दृश्य कभी धुंधले से और कभी कुछ स्पष्ट भी। कभी आमने सामने होती बात भी लगती। स्पष्ट सी परिभाषा शाद मेरी समझ से परे  है। 

वास्तव में कई लोगों को स्वप्न विजय की सिद्धि भी हो चुकी होती है।  ऐसे स्वपन की विजय साधना एक धार्मिक संकल्प का प्रयास हो सकता है जिसमें  स्वप्नों के माध्यम से सफलता और उपलब्धि प्राप्त करने का प्रयास और चाहत दोनों मिल कर सक्रिय हो जाते हों। ज़िंदगी की मुश्किलें और मुसीबतों से छुटकारा पाने के रस्ते और समाधान नज़र आने लगते हैं। ज़िंदगी के अंधेरों में रौशनी दिखाते हैं ऐसे स्वप्न।  

ऐसा भी लगने लगा कि यह कोई विशेष आध्यात्मिक इशारा भी है। आगे बढ़ना होगा लेकिन कैसे?  जवाब मिला स्वपन विजय साधना के माध्यम से ही पता लगाना होगा क्यूं आए हो इस दुनिया में? अब समझ आने लगा कि बचपन में ही बहुत पहले खेलने की तरफ भी मन क्यूं नहीं लगा रहा था। न गिल्ली डंडा न ही पतंगबाज़ी - -किसी में रस नहीं जग रहा था।  खाने पीने और सुंदर वस्त्र पहनने की तरफ भी रुचि क्यूं नहीं थी। बस गीत संगीत सुन्ना और पेन्सिल से स्केच बनाना। पीला रंग भी बहुत अच्छा लगता फिर भी सफेद वस्त्र मुझे अच्छे लगते। वस्त्रों में बस एक लंबी चादर सी मुझे बहुत पसंद रही। सिर से लेकर पाँव तक यही थी मेरा वस्त्र। लेटता तो ऊपर ओढ़ लेता और बैठता तो लोई की तरह ओढ़ ओट लेता। ऐसा भी लगा कि इस चादर के साथ में साधना आगे बढ़ाना सुविधाजनक है।  ऐसा ही लगता कि अपने स्वप्नों, इच्छाओं, और लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए उपलब्ध तकनीकों और साधनों का उपयोग भी इस के साथ किया जा सकता है। 

स्वपन विजय साधना के लिए कुछ महत्वपूर्ण तत्व ज़रूरी भी होते हैं। एकांत भी.  स्वछता भी थोड़ा सा अँधेरा करके आँखों को अधखुला रखना भी। उस चादर को लपेटना और ऊपर ओढ़ना अच्छा अच्छा लगता। सिर से पाँव तक उसे ओढ़ कर लेटने से अच्छा लगता। रेलगाड़ी , रेलवे स्टेशन या सुनसान स्थानों पर तो और भी अच्छा महसूस होता। कभी कभी स्वच्छ ताज़ी हवा के लिए नाक और मुँह से थोड़ी सी चादर हटा कर कुछ लंबे सांस लेना और फिर मेडिटेशन में उतरने के प्रयास करना। उसी चादर से मूंह को ढके हुए ही दिन के समय भी कभी आसमान देख लेना और कभी सितारे,  चन्द्रमा और सूर्य इत्यादि भी। ऐसे दृश्य बहुत बार देखे। अलौकिक आनंद भी देते ।  ऐसी यात्रियों की कृपा उस भगवान् ने बहुत बार की। दूर दराज के कई स्थान उन्हीं स्वप्नों में देखे जहां वास्तव में बहुत बाद में ही जाया जा सका। इनके बारे में पहले कभी कुछ पढ़ा या सुना भी नहीं था। फिर भी यूं लगा जैसे पूरा दृश्य सामने नज़र आ रहा हो। सचमुच बहुत विशेष अनुभव रहा। 

मन को शांत करने की भी ज़रूरत नहीं पड़ती थी। यह खुद-ब-खुद शांत होना शुरू हो गया था। बस बैठना और इच्छा करना। मन और स्वप्न की इस यात्रा के साथ साथ तन को भी यात्रा की अनुभूतियां होने लगीं थी। फिर इन अनुभवों और दृश्यों को कागज़ पर उतारने का भी मन होता लेकिन मुझे उस समय ताल लिखने में मुहारत नहीं हुई थी। स्वपन विजय साधना के लिए मन को शांत और स्थिर रखना महत्वपूर्ण भी होता है लेकिन यह सब स्वयंमेव होने लगा था। ध्यान भी लगने लगा और प्राणायाम की इच्छा भी बढ़ने लगी। मेडिटेशन में रहने की इच्छा तो हर पल रहने लगी। अपने मन को शांत करने की इच्छा और साधना की एक अलग सी चमक भी चिहरे पर दिखाई देने लगी। मन और विचारों की स्थिरता भी बढ़ने लगी। मन अध्यात्म की जानकारी की तरफ दौड़ता। 

घर परिवार से बिना पूछे कहीं जाना मुमकिन नहीं था। उस उम्र मैं ऐसा रिवाज ही नहीं था। केवल कल्पना ही एक जरिया था जहां मैं अपनी मर्ज़ी से जा सकता था। इसके इलावा कोई रास्ता था तो बस स्वप्न का ही था। जब जागता रहता तब भी मैं इस मकसद के संकल्प को मज़बूत बनाता।  सचमुच संकल्प शक्ति में बहुत सी क्षमता छुपी होती है। मैंने अपने उद्देश्यों और मकसद पर अपने स्वप्न बुनने शुरू किए। साहिर लुधियानवी साहिब की पंक्तियाँ प्रेरणा भी देती - -ज़रा देखें एक नज़र:

तुम ने कितने सपने देखे मैं ने कितने गीत बुने

इस दुनिया के शोर में लेकिन दिल की धड़कन कौन सुने


सरगम की आवाज़ पे सर को धुनने वाले लाखों पाए

नग़्मों की खिलती कलियों को चुनने वाले लाखों पाए


राख हुए जो दिल में जल कर वो अंगारे कौन चुने

तुम ने कितने सपने देखे मैं ने कितने गीत बुने


अरमानों के सूने घर में हर आहट बेगानी निकली

दिल ने जब नज़दीक से देखा हर सूरत अन-जानी निकली


बोझल घड़ियाँ गिनते गिनते सदमे हो गए लाख गुने

तुम ने कितने सपने देखे मैं ने कितने गीत बुने। ..!

यह गीत और साहिर लुधियानवी साहिब की अन्य रचनाएं। मन को किसी दूसरी दुनिया में जाने में काफी सहायक रहे। बहुत बार लगने लगता यह दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है! साहिर लुधियानवी साहिब के गीतों ने मुझे जहाँ समाजवाद के नज़दीक किया वहां शायरी की दुनिया के काफी नज़दीक भी किया। दुनिया में रहते हुए दुनिया से अलग ह कर सोचने के अनुभव इस शायरी ने भी बहुत दिए। उन दिनों रेडियो में ऐसे गीत संगीत आते भी बहुत थे। 

साहिर साहिब भी मुझे इस बात की प्रेरणा देते रहे कि सपने भी कैसे बुने जाते हैं गीत भी कैसे बुने जाते हैं। इस गीत साधना के रास्ते भी मुझे अपने लक्ष्यों को स्पष्ट करेने में सहायता मिलती रही। फिर उनसे अपने संकल्पों को देखने समझने और मज़बूत बनाने की कला भी आती गई।  सोते जागते वे गीत,  उनके बोल मेरे दिन रात के रूटीन में शामिल हो गए। मेरा सोने जागने रूटीन भी सुधरने लगा।  सुबह ढाई तीन बजे जग जाना ,  प्राणायाम करना और पांच छह बजे तक तैयार हो जाना इसी रूटीन से समझा और सीखा। धीरे धीरे इस तरफ रुचि विकसित हुई तो इसी क्षेत्र से जुड़े अच्छे अनुभवी लोग भी मिलते रहे। 

दिल्ली में जब डाक्टर मुखर्जीनगर में रहना हुआ तो यमुना किनारे जा कर मेडिटेशन में बैठना भी रोज़ की बात हो गई। मेरे साथ कभी कभार दो चार लोगों की मित्र मंडली भी होती थी। उस उम्र में गिने चुने मित्रों की यह मंडली शायद ज़रूरी भी थी। उनको मालुम था उस बांध के नज़दीक किस जगह मैं समाधि में बैठता था। एक बार घर लौटने में अँधेरा हुआ तो उन्होंने मेरे परिवा और मोहल्ले को बता दिया। कहीं बाढ़ न आ गई हो कहीं बाँध से पानी न छोड़ा गया हो ,  कहीं उधर कोई खूंखार जानवर न आ निकला हो . ..!परिवार के लोग और अड़ोस पड़ोस वाले ढूंढ़ने पहुंचे। जिन मित्रों को जगह मालूम थे वे ही साथ लेकर वहां गए थे। 

योगाभ्यास भी इसी रूटीन से ज़िंदगी में शामिल हुआ। योग से जहाँ शरीरक तंदरुस्ती मिलती वहीँ मानसिक शक्ति, भी मिलती। शरीरिक स्वास्थ्य और उच्च स्तरीय ध्यान प्राप्त करने  की इच्छा और मार्गदर्शन भी मिलता गया। यह मार्गदर्शन ज़िंदगी की अधयत्मिक यात्रा में भी मदद कर सकता है। नियमित योगाभ्यास करने से मनोदशा भी सुधरती है और दिशा भी सही मिलती है। ऐसा होने से स्वप्नों को साकार करने में भी सहायता मिलती है।

इसी संबंध में पुराणों और शास्त्रों का अध्ययन करें तो हिंदू धर्म में, स्वप्न विजय साधना के बारे में कैफीकुछ मिलता है। विविध पुराणों और ग्रंथों में इस तरह की बहुत सी अर्थपूर्ण बात की गई है। जिनको यह सब कठिन लगता हो वे लोग ओशो के ज़रिये इनका अधीन कर सकते हैं समझ जल्दी आ जाएगी।  इन पुराणों और ग्रंथों का अध्ययन करने से आपको स्वप्नों के विजय पर विस्तारित ज्ञान मिल सकता है। स्वप्न में क्या देखना चाहते हैं आप इस का भी ज्ञान है। इसका पता चलते ही उस अलौकिक ज्ञान की झलक मिलनी शुर होती है। 

हाँ इस संबंध में नियमित और ईमानदार रूप से साधना करना आवश्यक है। जो लोग खुद के प्रति ईमानदार नहीं होते वे साधना व संसार के प्रति भी ईमानदार नहीं हो सकते।  स्वप्न विजय साधना के लिए नियमितता और निष्ठा महत्वपूर्ण हैं। संकल्प तभी मज़बूत बन पाएंगे। आपको अपने विशिष्ट साधनाओं को निरंतरता के साथ करना चाहिए और उन्हें पूरा करने के बाद निष्ठा के साथ प्रतिक्रिया करनी चाहिए। इसी क्रिया प्रतिक्रिया से ही नया नया ज्ञान भी मिलेगा। 

यदि आप स्वप्न विजय साधना करना चाहते हैं, तो यह आपके धार्मिक अनुयायियों या आपके गुरु या धार्मिक मार्गदर्शक के संपर्क में रहने से मदद मिलतिओ ही है। इसी दिशा में यात्रा करने वाले मित्रों, सहयोगियों या साथियों की नज़दीकी भी आमतौर पर सहायक रहती है वैसे इस दिशा की यात्रा कई बार बिलकुल अकेले में अधिक मज़ेदार भी रहती है। 

इस आश्रम में मेरे आसपास परिवार के भी काफी लोग थे। इस से ध्यान साधना बार बार भंग हो रही थी। उस छोटी आयु में वहां से निकल कर मैं कहाँ गया यह एक अलग कहानी है जिसकी चर्चा मैं हकड़ ही करूंगा। तब के लिए आज्ञा चाहता हूँ कि यह पोस्ट पहले ही काफी लंबी हो गई है। इस आश्रम की जानकारी भी जल्द ही किसी अलग पोस्ट में सांझी करूंगा कि कैसे पंजाब के एक बहुत बड़े कारोबारी ने अपनी श्रद्धा से इसे बनाया। इसकी सेवा उन्होंने उन महापुरुषों के चरणों में की जिन्हें वह अपना गुरु मानते थे उनकी मान्यता भी बहुत है।  हमें यहाँ जाने का सुअवसर मिला इसी आश्रम का निर्माण करवाने वाले ठेकेदार गुरुचरण सिंह छाबड़ा के स्नेह और सहयोग से। 

                              --रेक्टर कथूरिया/ /तंत्र स्क्रीन डेस्क

Wednesday, November 12, 2025

बहुत जल्दी सुन लेते हैं काल भैरव भक्तों की पुकार

Wednesday 11th November 2025 Regarding Kaal Bhairav Jayanti 2025 Details Kaal Bhairav//Tantra Screen 

चंडीगढ़:11 नवंबर 2025: (मीडिया लिंक रविंद्र/ /तंत्र स्क्रीन-अध्यात्म डेस्क)::

सिसवा डैम के नज़दीक स्थित भगवान काल भैरव मंदिर को बिलकुल ही निकट महसूस करते हुए थोड़ा सा ही सोचा तो कई अनुभव होने लगे। काल भैरव से मेरा स्नेह और इनमें मेरी आस्था बहुत पुरानी है।  इसकी शुरुआत का सही समय भूल गया है लेकिन मैं अभी 9 बरस का भी नहीं हुआ था। 

                      काठमांडू नेपाल में स्थित इस प्रतिमा की तस्स्वीर क्लिक की रुपेशाग्राफी ने 
उन दिनों के ज्योतिषी लोग यूट्यूब के साथ सुसज्जित नहीं हुआ करते थे।
ऐसा कुछ उन दिनों था भी नहीं। बड़ा सा कुरता पहना होता उसके साथ पायजामा कभी कभार ही होता आम तौर पर धोती जैसी पौशाक होती। ।  कंधे पर तीन झोले लटकते होते। एक में वह सामान डालते जों जयोतिष लगवाने वाले उपाय के लिए ला कर देते। सरसों के तेल का बर्तन भी होता। एक झोले में उपाय के रत्न इत्यादि भी होते। हाथ में जंत्रियां हुआ करती थीं और हाथों की उँगलियों में पांसे जैसी चौकौर से कुछ डिज़ाइन जो एक माला जैसी चीज़ से लटके होते। हर सवाल पर वह इन्हीं चौकौर खानों को नीची बिछाई छड्ड पर फेंकते। फिर कई बार जंत्री भी खंगालते। कई बार हाथों की लकीरें भी गहराई से देखते। यही थे उस दौर के ज्योतिषी। हर गली में चक्क्र लगा कर आवाज़ भी देते कि कौन सा दिन त्यौहार है ?  

बस यही याद करते करते विचार आया कि कल अर्थात बुधवार को 12 नवंबर 2025 है। लगा निश्चय ही कल का यह दिन त्यौहार भी ख़ास ही होगा क्यूंकि कल को काल भैरव जयंती है। इसका पक्का होने पर काल भैरव जी का समरण भी हुआ। बहुत छोटी सी उम्र में हुआ था परिचय। भगवान शिव के इस अवतार का पता चलते ही मुझे लगा जैसे पाने किसी पारिवारिक पुरखे से बात हो गई ही। भगवान् से शिव के साथ इस अनन्य प्रेम की कहानी भी अलग है जिसकी चर्चा फिर कभी सही।  

वास्तव में मुख्य हिन्दू दिन त्योहारों में कालभैरव जयंती का अपना ही महत्व है। इस त्यौहार को जिसे कालाष्टमी भी कहते हैं) है। वास्तव में यह दिन भगवान शिव के रौद्र रूप, भगवान कालभैरव के अवतरण दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस रौद्र रूप को देखने ,  दिखने और अपनाने की ज़रूरत ज़िन्दगी में कई बार महसूस होती है। भक्त इस दिन व्रत रखते हैं और भय, पाप व संकटों से मुक्ति पाने के लिए उनकी विशेष पूजा-अर्चना करते हैं। इस रूप के स्मरण मात्र से ही एक शक्ति का अहसास होता है। एक आत्म विश्वास जागने लगता है। 

अब जबकि 12 नवंबर 2025 को कालभैरव जयंती है तो थोड़ी सी आस्था होते ही आप महसूस कर सकते हैं कि तन मन में बहुत से बदलाव आते हैं। बहुत ही अदभुत अहसास-शक्ति के,  क्षमता के,  आत्म विश्वास के विजय के और भगवान काल बी भैरव के दर्शनों के। साथ ही इस तरह के योग भी बनने लगते हैं। भगवान काल भैरव के स्वरूप को ध्यान से देखने का मन भी होता है। आसपास स्थित भगवान् काल भैरव मंदिर के दर्शनों की अभिलाषा भी होने लगती है। 

काल भैरव जयंती पर यह उल्लेख भी ज़रूरी है कि काशी के कोतवाल, जिनसे काल भी डरता है वह बहुत बड़ी शक्ति हैं। जानिए क्यों कहलाते हैं कालभैरव 'काशी के कोतवाल' वैसे यह कहानी भी जल्द ही अलग से राख्नेगे आप के सामने। 

गौरतलब यह भी कि हर साल कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को भगवान कालभैरव की जयंती भक्ति और श्रद्धा से मनाई जाती है। 

वैसे तो मोहाली-चंडीगढ़ क्षेत्र में कई भैरव मंदिर हैं, लेकिन श्री काल भैरव का सबसे प्रसिद्ध मंदिर सिसवां डैम, नया चंडीगढ़ के पास स्थित है। 

श्री भैरव जाति मंदिर की भी बहुत गहरी मान्यता है यह मंदिर चंडीगढ़-बद्दी रोड पर स्थित है। यह स्थान प्रकृति से घिरा हुआ है और सिसवां डैम के पास होने के कारण बहुत शांत और सुंदर है। यह विशेष रूप से काल भैरव की पूजा के लिए जाना जाता है। तंत्र साधना करने वाले भी अक्सर यहाँ हाज़री लगवाते हैं। 

अन्य भैरव मंदिर भी आसपास हैं। इसी क्षेत्र में कई अन्य भैरव मंदिर भी हैं। भैरव मंदिर, मनसा देवी परिसर: यह मंदिर पंचकूला में मनसा देवी परिसर के भीतर स्थित है। श्री भैरव मंदिर, ढकौली: यह मंदिर जीरकपुर में स्थित है। 

भैरव जाति मंदिर, सिसवां, न्यू चंडीगढ़ सचमुच चंडीगढ़ क्षेत्र में एक अवश्य देखने योग्य स्थान है फिर भी दर्शन तो किस्मत से ही होते हैं।

कुछ लोग नॉनवेज और शराब के सेवन को इस मौके पर अच्छा समझते हैं। लेकिन है यह व्यक्तिगत मान्यता। अंडा मांसाहार और शराब का सेवन आपकी व्यक्तिगत मान्यताओं और परंपराओं पर निर्भर करता है, लेकिन सामान्य धार्मिक मान्यताओं के अनुसार धार्मिक त्योहारों, विशेषकर कालभैरव जयंती जैसे शुभ और पवित्र दिनों पर, अधिकांश लोग अंडा, मांस और शराब के सेवन से परहेज करते हैं।

कुछ लोग इसे लेकर धार्मिक कारण बताते हैं और इनकी पालना सही समझते हैं। यह बात भी सभी जानते समझते हैं कि हिन्दू धर्म में त्योहारों और उपवास के दिनों को सात्विक (शुद्ध) रहने और मन व शरीर को पवित्र रखने का समय माना जाता है। तामसिक (मांस, शराब, आदि) भोजन का सेवन इस दिन वर्जित माना जाता है, क्योंकि यह पूजा-पाठ के माहौल के विपरीत होता है। पूजा पता का माहौल सात्विक रखा जाना ज़रूरी भी है। इसलिए तामसिक सोच और खानपान से परहेज़ ही रखना उचित होता है। 

इसके चलते एक सच और भी है कि क्षेत्रीय और व्यक्तिगत प्रथाएं कुछ विशिष्ट तांत्रिक या क्षेत्रीय प्रथाओं में, भैरव पूजा के हिस्से के रूप में कुछ विशेष प्रकार के प्रसाद (जिन्हें महाप्रसाद कहते हैं) का उपयोग किया जाता है, लेकिन यह आम जनता के बीच प्रचलित नहीं है। सभी मंदिरों और सभी स्थानों पर यह होता भी नहीं। इसलिए मान कर चलिए कि यदि आप धार्मिक मान्यताओं का पालन करते हुए कालभैरव जयंती मना रहे हैं, तो इन चीजों का सेवन करने से बचना ही सबसे अच्छा माना जाता है।

फिर भी कुछ हद तक यह बात सच है कि कुछ लोग भैरव मंदिरों में शराब और कुछ मामलों में मांसाहारी प्रसाद भी चढ़ाते हैं। यह प्रथा मुख्य रूप से तांत्रिक परंपराओं और कुछ विशिष्ट मान्यताओं से जुड़ी हुई है, जिसके पीछे कई कारण बताए जाते हैं। 

वैसे इस मुद्दे पर बात करते हुए शराब और नॉन-वेज प्रसाद चढ़ाने के जो कारण उनका भी कुछ न कुछ आधार तो होता ही है। काम ही सही पर इसका प्रचलन तो है ही। 

इस सब के साथ ही तांत्रिक परंपरा भी प्रचल्लित है। भैरव को तंत्र विद्या का देवता माना जाता है। तांत्रिक साधना में तामसिक चीजों का महत्व होता है, और शराब को भी इसी का हिस्सा माना जाता है। साधक और सेवक तरह केसवन से मिलने वाली ऊर्जा को अपनी साधना में उन्नति के लिए इस्तेमाल करते हैं। 

शायद सभी लोग न जानते हों लेकिन शिव के इस स्वरूप को तामसिक देवता मान कर भी पूजन किया जाता है।  काल भैरव को शिव का एक उग्र या तामसिक रूप माना जाता है। भक्तों का मानना ​​है कि ऐसी चीजें अर्पित करने से वह प्रसन्न होते हैं। इस लिए इस प्रसन्नता को हासिल करने के लिए ऐसी चीज़ें चढ़ाई भी जटरी हैं ,  इनका सेवन भी होता है इसका प्रसाद भी वितरित होता है। 

मनोवैज्ञानिक कारण:  यह सब एक और रहस्य के चलते भी किया जाता है। दुर्गुणों का समर्पण इस देवता के सामने बहुत श्रद्धा से किया जाता है। एक मान्यता यह भी है कि शराब जैसी बुरी आदतों को भगवान को समर्पित करके भक्त अपने अंदर के दुर्गुणों से मुक्ति पाने की प्रार्थना करते हैं। यह आत्म-नियंत्रण और सांसारिक मोह-माया से मुक्त होने का प्रतीक है। ऐसी साधना से धीरे धीरे ऐसे व्यसन छूट जाते हैं। 

बहुत पुरानी क्षेत्रीय और विशिष्ट परंपराएं हैं यह सब। भारत के कुछ विशेष मंदिरों में यह परंपरा सदियों से चली आ रही है। उदाहरण के लिए, उज्जैन के काल भैरव मंदिर में शराब चढ़ाने की प्रथा बहुत प्रसिद्ध है, जहां भक्त भगवान को शराब चढ़ाते हैं और उसे प्रसाद के रूप में भी ग्रहण करते हैं। ऐसा करके यदि आप ऐसे दुर्गुण छोड़ने में कामयाब हो जाते है तो यह सौदा भी महंगा नहीं है।  

मोहाली और चंडीगढ़ क्षेत्र में, श्री भैरव जाति मंदिर बहुत प्रसिद्ध है। यह मंदिर सिसवां डैम के पास नया चंडीगढ़ में स्थित है। पब्लिक ट्रांसपोर्ट आम तौर पर न मात्र जैसी ही है। अपने व्यक्तिगत या कराये के वाहन से ही पहुंचा जा सकता है। यह एक ऐसा मंदिर है जहाँ कुछ भक्त शराब का प्रसाद चढ़ाते हैं। इस आस्था को वहां पांच कर देखा भी जा सकता है और महसूस भी किया जा सकता है। यह मंदिर अपनी अनूठी परंपरा के लिए जाना जाता है, जहाँ भक्तों का मानना है कि भगवान काल भैरव को शराब चढ़ाने से उनकी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। हालांकि, यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि:यह परंपरा मुख्य रूप से कुछ विशेष मंदिरों की है, न कि क्षेत्र के सभी भैरव मंदिरों की। साथ ही भैरव बाबा के सात्विक रूप भी तो हैं आप चाहें तो उस सवरूप की पूजा अर्चना कर सकते हैं। अन्य मंदिरों में, जैसे कि मनसा देवी परिसर के मंदिर में, आमतौर पर सात्विक प्रसाद ही चढ़ाया जाता है। कुल मिला कर मन की आस्था को पहल देना सब से ज़रूरी है। 

इसे विचार में रखना आवश्यक है कि मांसाहारी (नॉन-वेज) प्रसाद चढ़ाने के बारे में यह प्रथा भारत के कुछ बहुत ही विशिष्ट तांत्रिक मंदिरों तक ही सीमित है (जैसे कि कुछ काली मंदिर, जहां बकरी की बलि दी जाती है)। वास्तव में ऐसी प्रथाएं भी किसी गहरे रहसयमय कारणों से शुरू हुई होती हैं। कथाओं के आयोजन में इनकी चर्चा भो होती है। ऐसी किसी प्रथा में कोई स्वयं मांस मदिरा का सेवन करना छाए तो अलग बात है।  . 

Tuesday, September 17, 2024

तंत्र मन्त्र से जीवन में सफलता कितनी सम्भव है

Tuesday 16th September 2024 at 6:45 PM

 यह आस्था और साधना की शिद्दत पर ही निर्भर करेगा 


लुधियाना: एक तपोबन और मंदिर भूमि:17 सितंबर 2024:( मीडिया लिंक//तंत्र स्क्रीन डेस्क)::

बहुत से मामले और बहुत सी बातें बिलकुल सच होते हैं लेकिन उनका सच दिखाई नहीं देता। उनका कोई सबूत भी नहीं होता। उन्हें साबित करना संभव नहीं होता। बहुत से मामलों में सच जैसा कुछ दिखाई तो देता है लेकिन होता वह झूठ ही है। विज्ञान की प्रयोगशाला में सब कुछ साबित करना संभव भी नहीं होता। यही सच्चाई तंत्र मंत्र और यंत्र के प्रयोग पर भी लागू होती है। इसे विश्वास  नहीं  सवालों के चश्मे से देखना उचित भी नहीं क्यूंकि तंत्र मंत्र उन लोगों के बिगड़े हुए काम ज़रूर बना देते हैं जिनका आत्म विश्वास डगमगा चुका होता है। जिन्हें खुद पर विश्वास नहीं रहा होता। तंत्र मंत्र उन्हें फायदा पहुंचाते हैं। 

इसी तरह के ढंग तरीकों से उनके मन की एकाग्रता भी बढ़ती है और दिमाग की भी। तंत्र-मंत्र-यंत्र और साथ में  सामूहिक जाप उनमें शक्ति जगाता है। यह जाएगी हुई शक्ति ही उनमें एक नए जोश का संचार करती है। आप इस शक्ति को कोई भी नाम दे सकते हैं। वैसे जिस शक्ति के नाम से जाप हो रहा होता उस समय साधक के सामने वही शक्ति साकार  हुई होती है।  अल्पकाल की सिद्धि भी कह सकते हैं। जाप रोज़ हो रहा हो तो यही स्थाई सिद्धि भी बन जाती है। 

तंत्र मन्त्र और यंत्र का प्रयोग यूं तो व्यक्तिगत और आध्यात्मिक उद्देश्यों के लिए किया जाता है। लेकिन आजकल हर रोज़ की ज़िन्दगी में आने वाली छोटी मोती ज़रूरतों के लिए भी इस तरह के प्रयोग होने लगे हैं। वास्तव में यह एक प्राचीन पद्धति है जो विभिन्न उद्देश्यों की प्राप्ति और अभिप्रेत शक्तियों के प्रकटीकरण के लिए उपयोगी मानी जाती है। इसके वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक आधार होते हैं। अगर कोई व्यक्ति आध्यात्मिक तौर पर जाग जाता है तो उसके काम खुद-ब-खुद बनने लगते हैं। उसके सामने कोई गलत व्यक्ति आने से घबराने लगता है। शक्ति का जागना यही होता है। 

तंत्र मन्त्र का प्रभाव व्यक्ति के निश्चित उद्देश्यों और उपास्य देवता/शक्ति के संबंध में भी निर्भर करता है। कुछ लोग इसे अपने साधना और स्वयं सुधार के लिए उपयोग करते हैं, जबकि दूसरे लोग यह उपयोग विशेष प्रभावों, जैसे धन, स्वास्थ्य, संघर्ष, प्रेम आदि की प्राप्ति के लिए करते हैं। इस तरह के दुनियावी काम तो अपने आप बनने लगते हैं। उनका प्रभामंडल भी सुधरने लगता है। चेहरे की चमक भी बढ़ जाती है। 

तंत्र मन्त्र के प्रभाव को व्यक्ति के श्रद्धा, विश्वास, साधना की क्षमता, उचित नियमों का पालन और निरंतरता प्रभावित कर सकते हैं। तंत्र मन्त्र की सफलता परिणाम व्यक्ति की अन्तरंग स्थिति, कर्म, दैवीय अनुमति आदि पर भी निर्भर करते हैं। साधक अंदर से जितना शुद्ध और सच्चा होगा उसे फायदा भी उतना बड़ा और जल्दी होने लगेगा। जो साधक साधना में ईमानदार नहीं होते उनकी साधना फलित नहीं होती।  मामला उल्टा भी पढ़ जाता है। 

हालांकि, तंत्र मन्त्र का उपयोग करने के दौरान सभी सावधानियां और सम्पूर्णता के साथ कार्य किया जाना चाहिए। यह मान्यता है कि तंत्र मन्त्र का दुरूपयोग अनुकरणीय प्रभावों के साथ आएगा और इससे दुष्प्रभाव भी हो सकता है। यह सब साधक की नीयत पर निर्भर करता है।  साफ़ है तो आपके  परिणाम भी जल्द आने लगेंगे। 

सफलता व्यक्ति की साधना, अध्ययन, कर्म और परिश्रम पर निर्भर करती है। तंत्र मन्त्र का प्रयोग उन लोगों द्वारा किया जाता है जो निरंतर अभ्यास करते हैं, शिक्षा प्राप्त करते हैं, आदर्शों का पालन करते हैं और नियमित रूप से अपनी साधना को जारी रखते हैं। निरंतरता और शुद्धता इस मामले में बहुत महत्व रखती है। 

च्छी गुरुभक्ति, निष्ठा, निरंतरता और सम्पूर्णता के साथ तंत्र मन्त्र के प्रयोग से सफलता की संभावना बढ़ सकती है, लेकिन इसका प्रयोग समय-समय पर अनुभवित और निश्चित गतिविधियों के साथ ही करना चाहिए। परंतु एकदिवसीय प्रयासों से मानसिक, शारीरिक या आर्थिक अभिवृद्धि की प्राप्ति निश्चित नहीं होती है। यह एक संशोधित प्रकृति और प्रयोग के लिए अवधारित कार्य है जो समय, तत्परता और समर्पण की मांग करता है। शिद्दत के साथ पूरा समर्पण, पूरी भक्ति, पूरी शुद्धता अगर हैं तो आप का मकसद सफल रहेगा। 

आप अगर ईमानदारी से समर्पित हो कर साधना करते हैं तो यकीन रखिए फायदे भी ज़रूर होंगें। शक्ति जागेगी तो आपको इसका अहसास भी कराएगी। 

Monday, September 16, 2024

ग्युतो तांत्रिक कॉलेज:तिब्बती बौद्ध ज्ञान का गढ़

Monday:16th September 2024 at 11:21 AM

एक पूर्ण और सफल इंसान बना  देते हैं इस कठिन परीक्षण से 


धर्मशाला
: (हिमाचल प्रदेश): 16 सितंबर 2024: (मीडिया लिंक//तंत्र स्क्रीन डेस्क)::

भारत में हिमाचल प्रदेश  स्थित धर्मशाला के सुरम्य शहर में स्थित, ग्युतो तांत्रिक कॉलेज तिब्बती बौद्ध धर्म की समृद्ध परंपराओं को संरक्षित करने और प्रचारित करने के लिए समर्पित एक प्रसिद्ध संस्थान है। 1474 में जेत्सुन कुंगा धोंडुप द्वारा स्थापित, जो कि प्रख्यात जे त्सोंगखापा के एक समर्पित शिष्य थे, यह प्रतिष्ठित कॉलेज सदियों से आध्यात्मिक उत्कृष्टता का प्रतीक रहा है।

बिना कोई शोर मचाए ये लोग अपने मिशन और मकसद में लगे रहते हैं। इनका उद्देश्य और इनके कार्य  भी सचमुच महान हैं। ग्युतो तांत्रिक कॉलेज वज्रयान बौद्ध धर्म की उन्नत और गूढ़ शिक्षाओं में मुहारत हासिल करने के इच्छुक भिक्षुओं के लिए प्रमुख गंतव्य है। यह विशेष कॉलेज तांत्रिक ज्ञान के उच्चतम स्तर को प्रदान करने में माहिर है, जिसमें ज़ोर दिया जाता है  बातों पर जो संक्षेप में इस तरह हैं। 

इस प्रशिक्षण के अनुष्ठान अभ्यास बहुत गहरे हैं। जटिल समारोह, पवित्र मंत्रोच्चार और तोरमा (मक्खन की मूर्ति) निर्माण पर यहां काफी ध्यान दिया जाता है। 

इसके साथ ही ध्यान और माइंडफुलनेस को बहुत परिपक्व किया जाता है।  गहन विज़ुअलाइज़ेशन तकनीक, मंत्रोच्चार और एकाग्रता के अभ्यास से  को बहुत गहराई से शिष्यों और छात्रों के मन  बैठाया जाता है। 

इस तरह की गहरी तैयारियों के बाद ही बारी आ पाती है तंत्र के प्रशिक्षण की। तांत्रिक अध्ययन के दौरान बौद्ध धर्मग्रंथों, दर्शन और प्रतीकवाद की गहन खोज करवाई जाती है। 

इस तंत्र कालेज का शैक्षणिक प्रभाव बहुत ही सूक्ष्मता से तन और मन पर प्रभाव डालता है। ग्युटो तांत्रिक कॉलेज एक परिवर्तनकारी शिक्षा प्रदान करता है, जिसके ज़रिए निम्नलिखित को पूरी तरह से विकसित किया जाता है। 

आध्यात्मिक विकास के लिए भिक्षु कठोर आध्यात्मिक अभ्यासों के माध्यम से गहन अंतर्दृष्टि, करुणा और ज्ञान विकसित करते हैं। उन्हें अभ्यास की सख्ती बहुत निपुण बना देती है। हर तरह से विकसित मानव भी और तांत्रिक भी। 

कौशल निपुणता में ट्रेनिंग के दौरान  को जप, अनुष्ठान प्रदर्शन, वाद-विवाद और कलात्मक अभिव्यक्ति (मंडल, तोरमा) में पूरी विशेषज्ञता दी जाती  है। हर तरह से पूरी तरह निपुण बना दिया जाता है। 

यहां का प्रशिक्षण पूरा करने के बाद इनके छात्र सफल व्यक्ति बन जाते हैं। तरक्की के साथ साथ नेतृत्व और शिक्षण में,इनके स्नातक दुनिया भर में तिब्बती बौद्ध धर्म के सम्मानित शिक्षक, नेता और राजदूत बन जाते हैं। हर क्षेत्र में इनका डंका  बोलता है। 

यहां का पाठ्यक्रम भी बेहद महत्वपूर्ण है। कॉलेज के व्यापक पाठ्यक्रम में बहुत कुछ शामिल है नींव मज़बूत करने से लेकर जीवन के हर पहलु का निर्माण मज़बूत किया जाता है। आप कह सकते हैं कि यहाँ के  किसी भी तरह किसी सुपरमैन  नहीं होते।  संकट का सामना करना सिखाया जाता है। यहां के सिलेबस में जिन बातों पर ज़ोर दिया जाता है उनमें हैं- सूत्रयान अध्ययन: बौद्ध धर्मग्रंथों, दर्शन और नैतिकता की खोज। इसमें जीवन  पहलू नहीं छोड़ा जाता। हर विद्या सिखा दी जाती है। 

इसके बाद तंत्रयान अध्ययन गहराई से कराया जाता है। तांत्रिक अनुष्ठानों, ध्यान और विज़ुअलाइज़ेशन पर उन्नत शिक्षाएँ दी जाती हैं। जप योग और तंत्र हर मामले ये भिक्षु पूरी तरह से निपुण बन जाते हैं। 

फिर बारी आती है अनुष्ठान और समारोह अभ्यास की। इसके अंतर्गत पवित्र जप, तोरमा निर्माण और समारोह प्रक्रियाओं में पूरी गहराई से प्रशिक्षण दिया जाता है। 

यह सब सिखाने के बाद बारी आती है समुदाय और आउटरीच की। ग्युटो तांत्रिक कॉलेज भिक्षुओं, विद्वानों और आध्यात्मिक साधकों का एक जीवंत समुदाय है। इस कालेज में ट्रेनिंग देते वक्त किसी भी तरह की कोई कसर नहीं छोड़ी जाती।  वाले हर  सक्षम बन जाते हैं। 

अपने छात्रों और शिष्यों की सफलता का पता लगाने के लिए  प्रबंधन  सार्वजनिक प्रदर्शन भी आयोजित करता है।  मंत्रोच्चार समारोह, अनुष्ठान प्रदर्शन और सांस्कृतिक कार्यक्रम देखने वाले होते हैं। यहाँ से पढ़ने वाले छात्रों को भी अपना हुनर दिखने का मौका मिलता है। 

यह कालेज अंतर्राष्ट्रीय आगंतुकों का भी पूरी  गर्मजोशी के साथ स्वागत करता है। आध्यात्मिक साधक, पर्यटक और शोधकर्ता यहाँ आते ही रहते हैं। उन्हें बहुत प्रेम  कहा  जाता है। 

अंतरधार्मिक संवाद का भी यह संस्थान समर्थन करता है। अन्य आध्यात्मिक परंपराओं के साथ सहयोग, आपसी समझ को बढ़ावा देना इनके लिए  प्राथमिक स्थान पर रहता है। 

कालेज का स्थान और संक्षिप्त इतिहास यहाँ फिर दोहराया जा रहा है। मूल रूप से यह संस्थान ल्हासा, तिब्बत में स्थापित रहा लेकिन ग्युटो तांत्रिक कॉलेज 1959 में चीनी आक्रमण के बाद धर्मशाला, भारत में स्थानांतरित हो गया। उस समय  नज़ाकत यही थी। आज, कॉलेज परम पावन दलाई लामा के निवास के पास फल-फूल रहा है, जो तिब्बती बौद्ध समुदाय के लचीलेपन और दृढ़ संकल्प का प्रतीक भी है।  नज़दीक  गुज़रो तो सुगंधित तरंगे मन ओके मोह लेती हैं। विरासत और प्रभाव भी ी इन तरंगों  रहते हैं। 

ग्युटो तांत्रिक कॉलेज ने तिब्बती संस्कृति को संरक्षित किया।  बौद्ध सम्पदा को  संभाला। प्राचीन परंपराओं, अनुष्ठानों और कलात्मक प्रथाओं की भी रक्षा की।जलावतनी के जीवन में यह सब आसान नहीं होता लेकिन इन लोगों ने यह सब कर दिखाया। 

इसके साथ ही आध्यात्मिक विकास को विकसित और प्रेरित किया। आध्यात्मिक नेताओं, विद्वानों और चिकित्सकों की पीढ़ियों का भी यहाँ पोषण किया।

चीन जैसी महाशक्ति का तीव्र विरोध सामने होने के बावजूद इनके तन, मन और चेहरों की शांति कभी  कम नहीं हुई। तिब्बती समुदाय के इन बुद्धिजीवियों ने वैश्विक समझ को बढ़ावा देना भी  प्राथमिक महत्व पर समझा।  तिब्बती बौद्ध धर्म के ज्ञान, करुणा और शांति को दुनिया के साथ साझा करना। यह सब इनकी दूरअंदेशी का भी  परिचायक है। 

हम अन्य पोस्टों में भी इस संस्थान के संबंध में चर्चा करते रहेंगे।  

Sunday, July 14, 2024

कैसे मिलते हैं तंत्र मार्ग पर सही रास्ते और सच्चे गुरु

तंत्र की हकीकत--प्रमाणिकता और इतिहास....! 

लुधियाना: 13 जुलाई 2024: (के. के.सिंह//तंत्र स्क्रीन डेस्क)

तंत्र को मानने वालों की संख्या न मानने वालों से आज भी ज़्यादा है। केवल गांवों में ही नहीं बल्कि शहरों में भी। देश में ही नहीं विदेशों में भी।  बस अलग अलग जगहों पर इसका रंग रूप अलग हो सकता है। अफ्रीका के तंत्र की बहुत सी कहानियों पर तो बहुत दिलचस्प नावल भी लिखे गए थे। किसी भी इंसान का पुतला बना कर उसे सुईयां चुभो चुभो कर और मंत्र पढ़ कर उसे बिमार करना और धीरे धीरे मौत के घात उतार देना अफ्रीकी तंत्र में आम रहा है। हालांकि विज्ञानं और तर्कशील सोच वालों ने इसे कभी सच नहीं माना लेकिन फिर भी बहुत बड़ी संख्या में लोगों की इस में आस्था और मान्यता निरंतर बनी हुई है। 

अगर हम तंत्र की हकीकत--प्रमाणिकता और इतिहास पर चर्चा करें तो बहुत सी बातें इसके हक़ में भी मिलेंगी और विरोध में भी। जो लोग इसके हक़ में हैं वो बहुत सी बातें बताएंगे जो सबूत जैसी ही लगेंगी। इनमें पढ़े लिखे लोग भी अक्सर शामिल होते हैं। 

जो लोग तंत्र के हक़ में नहीं हैं वे भी बंटे हुए हैं। उनमें से अधिकतर लोग ऐसे हैं जो दबे दबे से स्वर में इसका विरोध करते हैं खुल कर नहीं। उनके स्वर में भय मिश्रित सुर को भी महसूस किया जा सकता है। उन्को खुद चाहे तंत्र प्रयोग का कोई भी अच्छा या बुरा अनुभव न रहा हो लेकिन किसे से सुना सुनाया कोई भयानक अनुभव ज़रूर याद रहता है और उसका भय उनकी आंखों में महसूस कीजै जा सकता है। कई लोग ऐसे में घबरा कर ऐसा भी कहते हैं हमें इस पर कुछ नहीं कहना। आपको पता नहीं यह चीज़ें बहुत भरी होती हैं। 

तंत्र की उत्पत्ति और इतिहास

तंत्र एक प्राचीन भारतीय आध्यात्मिक परंपरा है, जिसकी जड़ें वैदिक काल में पाई जाती हैं। इसका उल्लेख वेदों, उपनिषदों, पुराणों और अन्य धार्मिक ग्रंथों में मिलता है। तंत्र साधना का विकास मुख्यतः गुप्त काल (4वीं से 6वीं सदी) में हुआ, जब इसे बौद्ध, जैन और हिंदू परंपराओं में अपनाया गया। बहुत से समुदायों और संगठनों ने इसे धीरे धीरे पूरी तरह से अपना लिया। अब अलग अलग नामों से तंत्र हर क्षेत्र और सम्प्रदाय में मौजूद है। 

केवल इतना ही नहीं छोटे छोटे डेरों और मज़ारों पर भी अक्सर तंत्र के क्रियाकलाप किए जाते हैं। लोग झाड़ा करवाने वहां जाते हैं और उसके बाद वे पूरी तरह से ठीक होने का दावा भी करते हैं। ीा मामले में क्या क्या संभव है इसकी चर्चा भी हम अलग से किसी पोस्ट में करेंगे ही। 

तंत्र के सिद्धांत गहरी बातें करते हैं

तंत्र का मुख्य उद्देश्य आत्मा और परमात्मा के मिलन को प्राप्त करना है। यह यथार्थवादी दृष्टिकोण अपनाता है और मानता है कि संसार को त्यागने के बजाय, उसकी वास्तविकता को समझकर और उसमें रहकर आत्मा की उन्नति की जा सकती है। तंत्र साधना में मंत्र, यंत्र, और विभिन्न प्रकार की ध्यान विधियों का प्रयोग होता है। इन विधियों को समझना और करना सहज नहीं होता लेकिन फिर भी बहुत से लोग ऐसा करते हैं। 

तंत्र और योग का संबंध 

शरीर शुद्ध और निरोग न हो तो तंत्र की बात तो दूर साधारण मेडिटेशन भी संभव नहीं रहती। शरीर की निरोगता और उसका बलवान होना आवश्यक है। शरीर की शक्ति अर्जित करने के बाद ही मन को बलवान बनाना सिखाया जाता है। इसके बाद आत्मा की शक्ति को जगाने और उसे बढाने की विधियां आती हैं। वास्तव में तंत्र और योग का गहरा संबंध है। तंत्र साधना में ध्यान, प्राणायाम, मुद्रा और बंध जैसे योग के अंगों का उपयोग किया जाता है। तंत्र साधना का एक महत्वपूर्ण हिस्सा कुंडलिनी योग है, जिसमें शरीर में स्थित ऊर्जा केंद्रों (चक्रों) को जागृत किया जाता है। जो साधक इन रहस्यों को समझ जाता है उसके लिए तंत्र साधना के मर्म तक पहुंचना भी संभव हो जाता है। 

तंत्र साहित्य के क्षेत्र 

यूं तो तंत्र में बहुत सा साहित्य शामिल है जिसे गिना भी नहीं जा सकता। किसी बड़े पुस्तकालय या पुस्तक बिक्री केंद्र में जाएं तो तंत्र पर बहुत सी पुस्तकें और ग्रंथ वहां देखने को मिलेंगे। हर पुस्तक का कवर लुभावना होगा। तस्वीर रहसयमय और नाम अपने आप में बहुत कुछ समेटे होगा। लेकिन इसमें सच्चे तंत्र साहित्य को कोई सच्चा साधक या गंभीर पाठक ही समझ पाता है। 

तंत्र साहित्य में विभिन्न ग्रंथ शामिल हैं, जैसे कि शैव आगम। भगवान शिव के भक्तों में शैव आगम से सबंधित ये ग्रंथ बहुत महत्वपूर्ण होते हैं। साधक भगवान शिव को सर्वोच्च देवता मानते हैं। ओशो ने भी तंत्र की जिन 112 विधियों का उल्लेख किया है वह बहुत अर्थपूर्ण है। तंत्र पर ओशो के प्रवचनों पर आधारित बहुत सी किताबें भी मार्कीट में हैं। ख़ास बात यह है कि इन 112 विधियों में से कोई न कोई ऐसी विधि सभी को मिल जाती है जो उसकी शरीरक सरंचना, मन की अवस्था, समय की अनुकूलिता और हर मामले में रास आ ही जाती है। 

इसी तरह शाक्त आगम का क्षेत्र भी बहुत अलग और विशाल है। इस क्षेत्र से जुड़े ग्रंथ देवी की पूजा पर आधारित होते हैं। इन ग्रंथों में तंत्र से सबंधित विधियां भी बहुत गहन होती हैं। इन विधियों के लिए अग्रसर होना हो तो साधक को बहुत तैयारी भी करनी पड़ती है। इन विधियों में देवी के रूप को बहुत विधि से ध्याना होता है। देवी को बुलाने और उसके आने पर जो जो करना होता है उसके पूरे नियम भी होते हैं। इसमें क्यूंकि मुख्यता देवी को मां के रूप में पूजा जाता है तो साधक के मन में यह बात पूरी मज़बूती से बनी रहती है कि मैं मां की संतान हूं इसलिए मां मुझे मेरी हर बुराई और पाप के साथ स्वीकार करेगी और मुझे क्षमा करेगी। इस भावना से साधक की आत्मिक प्रगति तेज़ी से होने लगती है। उसका शरीर भी शुद्ध और बलवान होने लगता है और मन भी मज़बूत बन जाता है। 

तंत्र साधना से जुड़े साहित्य और ग्रंथों में वैष्णव आगम  ग्रंथ  महत्वपूर्ण हैं। ये विष्णु और उनके अवतारों की पूजा पर केंद्रित हैं। वर्ष 1972  में आई फिल्म हरी दर्शन एक तरह से इन्हीं ग्रंथों पर आधारित थी। निर्देशक थे चंद्रकांत और मुख्य कलाकारों में थे दारा सिंह। फिल्म की कहानी प्रहलाद भक्त पर आधारित थी और गीत संगीत भी बेहद जादू भरा था। बालक प्रह्लाद की भूमिका निभाई थी सत्यजीत पुरी ने। 

आखिर में यह उल्लेख आवश्यक है कि तंत्र का आधुनिक संदर्भ बहुत प्रदूषित जैसा हो गया है। आजकल तंत्र को अक्सर गलत तरीके से प्रस्तुत किया जाता है, जिससे इसकी वास्तविकता और महत्व धुंधला हो जाता है। तंत्र की सच्ची साधना में नैतिकता, स्व-अनुशासन और गुरु-शिष्य परंपरा का विशेष महत्व है। इसलिए इस तरफ भी ध्यान दिया जाना आवश्यक है। 

कुल मिलकर तंत्र एक समृद्ध और जटिल परंपरा है, जिसका इतिहास और प्रामाणिकता गहन अध्ययन और अनुभव से ही समझा जा सकता है। यह केवल एक साधना पद्धति नहीं है, बल्कि जीवन को देखने और समझने का एक व्यापक दृष्टिकोण है, जो व्यक्ति के मानसिक, शारीरिक और आध्यात्मिक विकास में सहायक होता है। इसकी सच्ची खोज केवल किताबों से कुछ वीडियो चैनल देख कर नहीं हो सकती। अंतर्मन में तंत्र के लिए सवयं की प्यास जागने पर ही रास्ते मिलते हैं और गुरु भी। 

Tuesday, April 16, 2024

तंत्र की हकीकत//प्रमाणिकता और इतिहास

Monday 15th April 2024 at 09:45 AM 

तंत्र का सच तंत्र में आ कर ही समझना सही होगा


हरिद्वार
: 16 अप्रैल 2024: (तंत्र स्क्रीन डेस्क)::

तंत्र की हकीकत कैसी है, कितनी है यह लगातार शोध का विषय रहा है। इसकी प्रमाणिकता को लेकर भी दलीलें मिलती हैं और इसके इतिहास  भी। तंत्र की कथाएं और गाथाएं सदियों पुरानी हैं। तंत्र की उत्पत्ति और इतिहास को लेकर बहुत कुछ कहा, सुना और लिखा जा चुका है। 

लेकन यह एक सत्य है कि तंत्र एक प्राचीन भारतीय आध्यात्मिक परंपरा है, जिसकी जड़ें वैदिक काल में पाई जाती हैं। इसका उल्लेख वेदों, उपनिषदों, पुराणों और अन्य धार्मिक ग्रंथों में मिलता है। तंत्र साधना का विकास मुख्यतः गुप्त काल (4वीं से 6वीं सदी) में हुआ, जब इसे बौद्ध, जैन और हिंदू परंपराओं में अपनाया गया।बौद्ध, जैन और हिन्दू परंपराओं में तंत्र की बहुत जहां चर्चा मिलती है। इस संबंध में मंदिर जैसी विशाल इमारतें भी मिलती हैं। इन्हीं में एक है 64  जो कई अलग अलग जगहों पर बना हुआ है। इसके महत्व और मकसद को लेकर भी बहुत कुछ कहा गया है। तंत्र में आस्था रखने वाले इसे तंत्र की यूनिवर्सिटी कहते भी हैं और मानते भी हैं। कहा जाता है कि संसद के पुराने भवन का डिज़ाईन और आकार इसी मंदिर से प्रेरणा पा कर रचा गया था।  

अब तंत्र के सिद्धांत की बात करें तो वह बहुत उंच और पवित्र है अब यह बात अलग अलग है बहुत से लोगों ने इसे अपने अपने ढंग से लेकर स्वार्थ सिद्धि करनी शुरू कर दी। वास्तव में तंत्र का मुख्य उद्देश्य आत्मा और परमात्मा के मिलन को प्राप्त करना है। यह यथार्थवादी दृष्टिकोण अपनाता है और मानता है कि संसार को त्यागने के बजाय, उसकी वास्तविकता को समझकर और उसमें रहकर आत्मा की उन्नति की जा सकती है। तंत्र साधना में मंत्र, यंत्र, और विभिन्न प्रकार की ध्यान विधियों का प्रयोग होता है। सच्चा तांत्रिक हर मिशन में कामयाब होता है बेशक वह कितना ही कठिन मकसद क्यूं न हो। 

तंत्र और योग का भी बहुत गहरा संबंध है। योग साधना से शरीर की मुश्किलें और व्याधियां दूर होती हैं जिससे तंत्र में सहायता मिलती है।  तंत्र का मिशन जल्दी कामयाब होता है। सिद्धि जल्दी मिलती है। समाधी भी जल्दी लगती है और भगवान से गहन ध्यान जल्दी जुड़ता है। भूख, प्यास, गर्मी सर्दी का अहसास और दुःख-सुख की भावना सब नियंत्रित हो जाते हैं। कई कारणों से तंत्र और योग का गहरा संबंध है। तंत्र साधना में ध्यान, प्राणायाम, मुद्रा और बंध जैसे योग के अंगों का उपयोग किया जाता है। तंत्र साधना का एक महत्वपूर्ण हिस्सा कुंडलिनी योग है, जिसमें शरीर में स्थित ऊर्जा केंद्रों (चक्रों) को जागृत किया जाता है।

तंत्र साधना के इस क्षेत्र में आने से इससे जुड़ा साहित्य पढ़ना लाभदायक रहता है। इस साहित्य का अध्यन मार्ग दिखने में सहायक साबित होता है। मन की शंकाओं का भी निवारण करता है। इस तरह से तंत्र साहित्य के अधिक से अधिक ग्रंथ पढ़ने फायदेमंद रहते हैं। गौरतलब है कि तंत्र साहित्य में विभिन्न ग्रंथ शामिल हैं, जैसे कि:

शैव आगम बहुत ही महत्वपूर्ण गिना गया है। ये ग्रंथ शिव को सर्वोच्च देवता मानते हैं।

इसी तरह शाक्त आगम का भी बहुत महत्व है। ये ग्रंथ देवी की पूजा पर आधारित हैं।

वैष्णव आगम में भी बहुत से रहस्य उजागर किए गए हैं। ये विष्णु और उनके अवतारों की पूजा पर केंद्रित हैं।

तंत्र की प्रामाणिकता को लेकर अभी भी लोग अक्सर बहस में पड़ जाते हैं। तंत्र की प्रामाणिकता को लेकर कई मतभेद हैं। कुछ विद्वान इसे वैदिक परंपरा का ही एक अंग मानते हैं, जबकि कुछ इसे स्वतंत्र परंपरा के रूप में देखते हैं। तंत्र साधना का वैज्ञानिक आधार भी है, जिसमें ध्यान और प्राणायाम की विधियाँ मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के लिए लाभकारी मानी जाती हैं। फिर भी यह एक हकीकत है कि बहुत पढ़े लिखे और उच्च पदों पर नियुक्त लोग तंत्र में गहरी आस्था रखते हैं। तांत्रिकों के पास सलाह लेने के लिए जाने वालों में  विद्वान भी शामिल रहते हैं। 

इस तरह तंत्र का आधुनिक संदर्भ भी बहुत प्रभावशाली है। अब यह बात अलग है कि आजकल तंत्र को अक्सर गलत तरीके से प्रस्तुत किया जाता है, जिससे इसकी वास्तविकता और महत्व धुंधला हो जाता है। तंत्र की सच्ची साधना में नैतिकता, स्व-अनुशासन और गुरु-शिष्य परंपरा का विशेष महत्व है। चादर या चटाई बिछा कर  बिछा कर सड़क पर बैठने वालों ने ज्योतिष और तंत्र दोनों को सस्ता बना दिया है। लोगों की नीर में यह सब अब सड़क छाप बन गया है। 

लेकिन सच में निष्कर्ष यही है कि तंत्र एक समृद्ध और जटिल परंपरा है, जिसका इतिहास और प्रामाणिकता गहन अध्ययन और अनुभव से ही समझा जा सकता है। यह केवल एक साधना पद्धति नहीं है, बल्कि जीवन को देखने और समझने का एक व्यापक दृष्टिकोण है, जो व्यक्ति के मानसिक, शारीरिक और आध्यात्मिक विकास में सहायक होता है।

तंत्र का सच तंत्र में आ कर ही समझना सही होगा। सुनी सुनाई या पढ़ी पढाई बातों से भी वह बात नहीं बनती। सच्च मार्गदर्शक या गुरु बहुत किस्मत से   देखरेख में तंत्र साधना करना ठीक रहता है वरना यह सब खतरनाक भी साबित हो सकता है।  

Friday, March 15, 2024

महिला तांत्रिक बहुत ज़िम्मेदारी से सहेज रही हैं तंत्र की गुप्त विद्या

बहुत सख्त किस्म का अनुशासन होता है तंत्र के लाइफ स्टाईल में 


हरिद्वार
: 15 मार्च 2024: (मीडिया लिंक//तंत्र स्क्रीन डेस्क)::

भारत में महिला तांत्रिकों और महिला अघोरीयों  का जीवन कैसा है और उनकी शक्ति या सिद्धि कैसी है इसे जानने की जिज्ञासा मीडिया से जुड़े हम सभी लोगों को भी थी लेकिन यह सब इतना आसान भी तो नहीं था। बिना उनकी आज्ञा के उनके शिविर, आश्रम या रिहायशी ठिकानों के नीदीक जाना न तो उचित होता है न ही खतरों से खाली। उन्हें किसी भी छोटी सी बात पर नाराज़ करना कई मुश्किलें खड़ी कर सकता है। 

ज़िन्दगी का इत्तफाक कहो या फिर किस्मत की बातें कि मन की इच्छाएँ अगर शिद्दत से भरी हुई हों तो वे पूर्ण भी हो जाती हैं .इसी तरह रूटीन के जीवन में भी कभी कभार कहीं न कहीं किसी न किसी महिला साधवी से भेंट हो भी जाती रही लेकिन वह बहुत संक्षिप्त सी ही रहती। प्रणाम और नमस्कार से ज़्यादा कभी कभी उनकी तप सथली का कुछ प्रसाद भी मिल जाता। उनके इस प्रसाद में कई बार ताज़े फल भी शामिल होता कई बार सूखे फल भी। कई बार जीवन के कुछ गुर भी लेकिन मीडिया मकसद से तन्त्र पर वार्ता या तो शुरू ही न हो पाती या फिर अधूरी छूट जाती। 

इस तरह की भेंट के दौरान साधना की गुप्त बातों की गहन चर्चा तो किसी भी तरह से शायद सम्भव भी नहीं थी। बिना कोई ख़ास चर्चा वाली ऐसी भेंट हरिद्वार के जंगलों में भी हुई, दिल्ली में भी और पंजाब में कुछ स्थानों पर भी। इनका रोमांच और रहस्य बहुत यादगारी भी रहा। 

इन मुलाकातों के दौरान विश्व हिन्दु परिषद के उस समय के सक्रिय नेता मोहन उपाध्याय जी भी साथ रहते रहे। उनकी पहल और मार्गदर्शन से ही यह सम्भव होता रहा। मोहन जी की असमय मृत्यु से यह सारा मिशन और प्रोजेक्ट भी अधर में ही छूट गया। बस इतना ही याद रहा कि दिव्यता की मूर्ती लगने वाली इन महिलाओं का रहन सहन पूरी गहनता से अंतर्मन तक प्रभावित करता रहा। उनकी बातें बहुत देर तक मानसिक जगत में गूंजती भी रहती।  उनके पास बेउठने एक ऊर्जा का अहसास करवाता रहा। 

भारत के हृदय में, जहाँ प्राचीन परंपराएँ और मान्यताएँ बहुत ही गहरी हैं, वहाँ महिलाओं का यह एक छोटा, गुप्त समुदाय लम्बे समय से मौजूद है। हालांकि वे आपकी औसत गृहिणियां या माताएं तो नहीं होती हैं, लेकिन उनके पास एक ऐसी शक्ति ज़रूर है जिसके बारे में अधिकांश कई बार पुरुष साधक भी केवल सपना ही देख सकते हैं। उनके सामीप्य से मुँह से जय माता दी निकलता या फिर कोई और आध्यात्मिक सम्बोधन तो वह हमारे अतीत और रूटीन से बहुत ही अलग होता। तंत्र की उन महिला साधिकाओं से बात करते हुए उनमें से मातृ शक्ति का स्वरूप कई बार पूरी तरह से उभर कर सामने भी आता है। जहां वात्सल्य का अहसास भी होता। यह सब एक आशीर्वाद जैसा अहसास भी होता है। ऐसा बहुत कुछ अनुभव होने लगता जो अलौकिक जैसा होता। तंत्र में महिला तांत्रिकों के योगदान पर तंत्र स्क्रीन की यह विशेष प्रस्तुति उन्हीं अनुभूतियों को अभिव्यक्त करने का प्रयास है। 

तंत्र के कठिन रास्तों पर निकलीं इन महिलाओं को अक्सर महिला तांत्रिक और महिला अघोरी के नाम से भी जाना जाता है। उनका पूरा जीवन और उनका पूरा लाइफ स्टाईल तंत्र और अघोर की साधना के लिए समर्पित हुआ महसूस होता है।

तंत्र और अघोर पथ ये दो ऐसे अलग अलग और गूढ़ आध्यात्मिक मार्ग हैं जो समाज के मानदंडों और पूर्व कल्पित धारणाओं को ज़ोरदार चुनौती भी देते हैं। ईश्वरीय सत्ता के साथ सीधा राब्ता उनका लक्ष्य रहता है।  इसी सर्वोच्च सत्ता के साथ उनका तारतम्य जुड़ा रहता है। वे अकेले में जब बात करती हैं तो लगता है सामने कोई नहीं है लेकिन उनको इसका पूरा सतर्क अहसास रहता है कि वे कहाँ हैं और किस्से बात कर रही हैं। हमारे पास पहुंचने का भी उन्होंने नोटिस लिया और साथ ही हमारे मन की एक दो बातें भी उन्होंने उसी सर्वोच्च सत्ता के सामने उजागर कर दी और कहा लो अब यह भी यहाँ पहुँच गया आपके दरबार में इसका संकट दूर कर दो। इसके साथ ही हमें यह भी बताया कि जीवन की यह समस्या अब इस दिन या तारीख से समाप्त समझो। ऐसी बहुत सी बातें होती रहीं जिनका पता केवल हमें था और जिनकी गहन चिंता भी केवल हमें थी।   

दिलचस्प बात है कि अपने पुरुष समकक्षों के विपरीत, जो अक्सर अधिक ध्यान भी आकर्षित करते हैं, ये महिलाएं अपनी प्रथाओं और ज्ञान को दुनिया की नज़रों से छिपाकर रखने में अधिक कामयाब रही हैं। वे आधुनिक जीवन की हलचल से दूर सुदूर गांवों और आश्रमों में रहती हैं। उनकी साधना पद्धति भी अक्सर पूरी तरह से गुप्त होती है। उनके दिन गहन आध्यात्मिक अभ्यास, ध्यान और अध्ययन में व्यतीत होते हैं। उन्हें कम उम्र में ही तंत्र और अघोर के रहस्यों की शिक्षा दी जाती है, अक्सर उनकी मां या दादी द्वारा, जिन्हें पीढ़ियों से यह ज्ञान विरासत में मिला है। इस साधना की चमक उनकी आँखों में देखी जा सकती है और उनके चेहरों पर भी। उनकी बॉडी  लैंग्वेज साथ साथ इस बात का अहसास करवाती रहती है कि उनके शब्दों, बोलों, उनकी उंगलियों और आशीर्वाद की मुद्रा में उठे हाथों से कोई न कोई शक्ति तो प्रवाहित हो ही रही है। उनकी रहस्य्मय मुस्कान और गुस्सा आने पर आँखों में अपनेपन वाली वो थोड़ी सी घूरने वाली अनुभूति भी बिना बोले बहुत कुछ बताती कि किस किस बात से दूर रहना है। 

आम लोग उन्हें भयानक स्वरूप वाली या ऐसा कुछ भी समझें या कहें लेकिन महिला तांत्रिकों और महिला अघोरियों का स्थानीय आबादी के लोग पूरी तरह से सम्मान भी करते हैं। इस प्रेम और सम्मान के साथ साथ ये लोग उनसे एक तरह से डरते भी हैं। यह ख़ामोशी भरा मूक भय होता है। बिना किसी आवाज़ के अपना असर दिखाता  है। आसपास रहने वाले लोग उन्हें अपना रक्षक ही समझते हैं। ज़िन्दगी की मुश्किलों और संकटों से घबराए हुए बहुत से लोग दूर दराज से भी उनके पास आ कर सिर झुकाते हैं। तंत्र और अध्यात्म में बहुत से लोग बेहद पढ़े लिखे भी हैं। दुनिया की पढाई समाप्त करने के बाद उन्हें लगा इस पढ़ाई में कुछ नहीं रखा अब इस क्षेत्र में कुछ अभ्यास ज़रूरी हैं। 

तंत्र की दुनिया के ज्ञाता इस संबंध में जो बताते हैं वह कई बार हैरान कर देता है। ऐसा कहा जाता है कि तंत्र के इन साधकों के पास तत्वों, आत्माओं और यहाँ तक कि मृत्यु पर विजय जैसी बहुत ही कठिन और अत्यधिक सिद्धि और शक्ति भी होती है। वे अपनी क्षमताओं का उपयोग बीमारों को ठीक करने, जादू-टोना करने और खोई हुई आत्माओं का मार्गदर्शन करने के लिए करते हैं। हालाँकि, उनकी शक्ति की भारी कीमत भी चुकानी पड़ती है।  उनकी साधना और भी कठिन हो जाती है। इस शक्ति का अर्जित करना भी आसान कहां होता है। 

उन्हें एक सख्त आचार संहिता बनाए रखनी होती है। इस अनुशासन का वे सभी लोग पालन भी करते हैं। साधना  के कई पड़ावों में यौन सुख और यहां तक कि दूसरों को छूने से भी बचना होता है। वे कठोर जीवन जीते हैं, अक्सर साधना मार्ग के प्रति अपनी भक्ति के प्रतीक के रूप में केवल मृतकों की राख पहनते हैं। हर सुख सुविधा को पलक झपकते ही अपने पास उपलब्ध करवा लेने की इस क्षमता के बावजूद यह तांत्रिक अघोरी महिलाएं बेहद कठिन जीवन जीती हैं वो भी बिना किसी शिकायत के। महिला तांत्रिक बहुत ज़िम्मेदारी से सहेज कर रख रही हैं तंत्र की गुप्त विद्या को। बेहद कठिन और लम्बे उपवास इनकी शरीरक और मानसिक क्षमता को मज़बूत बना देते हैं। महिला तांत्रिक बहुत ज़िम्मेदारी से सहेज कर रख रही हैं तंत्र की गुप्त विद्या को

अपने एकांतवास के बावजूद, ये महिलाएं दुनिया से अलग-थलग नहीं रहती हैं। वे अक्सर जरूरतमंद लोगों को अपनी सेवाएं देने के लिए दूसरे गांवों और शहरों की यात्रा भी करती हैं। वे आध्यात्मिक और सांसारिक लोगों के बीच मध्यस्थ के रूप में भी कार्य करते हैं। आधुनिक जीवन की हलचल से दूर कहीं बस्ती है इन  महिला तांत्रिकों की दुनिया जहां एक अनाम सा आकर्षण भी पैदा हो जाता है। वहां की हवा में कोई अलौकिक सी सुगंध भी महसूस होने लगती है। 

इसके साथ ही यह तांत्रिक लोग उन लोगों के लिए मार्गदर्शक और संरक्षक के रूप में कार्य करते हैं जो उनकी सलाह चाहते हैं। वे सभाओं और समारोहों की मेजबानी करने के लिए भी जाने जाते हैं जहां वे एक-दूसरे के साथ अपना ज्ञान और बुद्धिमत्ता साझा करते हैं। इस सबके बावजूद उनकी साधना और जीवन शैली तकरीबन गुप्त ही रहती है। ऐसी बहुत सी बातें हम अन्य लेखों में आपके सामने लाने का प्रयास करते रहेंगे। 

Thursday, June 15, 2023

अघोरी बाबाओं की कृपा भी कमाल की होती है

लेकिन उनके क्रोध से बचना ही बुद्धिमता होती है 

अघोरी बाबाओं की प्रतीकात्मक तस्वीरें 

लुधियाना: 15 जून 2023: (रेक्टर कथूरिया//मीडिया लिंक रविंद्र//तंत्र स्क्रीन डेस्क)::

एक थे जगजीत सिंह एडवोकेट। पेशे से वकील थे। वही वकालत जिसमें कदम कदम झूठ बोलना पड़ता है।  झूठ के बिना शायद इस प्रोफेशन का चलना ही मुश्किल हो जाए। इस हकीकत के बावजूद एडवोकेट जगजीत सिंह ने झूठ से ज़िंदगी के हर कदम पर एक दूरी बना रखी थी। नफा हो या नुकसान वह इस दुरी को हमेशां कायम रखते। यह सब एक चमत्कार जैसा ही तो था लेकिन सच्चाई की गरिमा और चमक केवल उनके चेहरे पर ही नहीं बल्कि पूरी शख्सियत में हुआ करती थी। उनके  हर कदम में जादूभरा असर हुआ करता था। उनसे हमारे परिवार का राब्ता उनकी लेखनी के कारण था। वह लोकप्रिय समाचार पत्र पंजाब केसरी और उन्हीं के पंजाबी  प्रकाशन जग बाणी में नियमित तौर पर एक स्तम्भ लिखा करते थे। उनके इस कालम में अक्सर अध्यात्म की दुनिया से  बातें होतीं। साधना की चर्चा रहती और जिन साधु बाबाओं से कभी उनकी भेंट होती उनकी चर्चा रहती। 

वह बताते थे एक बार एक अघोरी बाबा ने एक जगह आसान जमा लिया। इतने में द्वार खुला और एक महिला बाहर आई।अघोरी बाबा ने भोजन की इच्छा व्यक्त की। उस महिला ने थोड़ी देर पहली ही बना कर रखी दो रोटियां बाबा को सम्मान से दे दी। 

भोजन करके उसे आशीर्वाद दे ही रहे थे कि पास में बैठा उनका कुत्ता उनकी तरफ ही मुंह कर के भौंकने लगा। ऐसे लगता था शायद उन्हें कुछ कह रहा हो। बाबा ने आंखें बंद की और कुत्ते की तरफ देखते हुए उसे बोले अच्छा अच्छा दे देता हूं। इतना कह कर अपनी पोटली में से एक बेशकीमती लाल निकाल कर उस महिला को दे दिया। साथ ही कहा इसे अपने बेटे के गले में रखना उसकी सुरक्षा होती रहेगी। 

इतने में ही घर में से फोन की घंटी बजी तो वह महिला क्षमा मांग कर घर के अंदर गई लेकिन साथ ही कह कर गई कि वह फोन सुन कर अभी आती है। अंदर जा कर फोन सुना तो सन्न  रह गई। फोन पर एक बुरी खबर थी। जिस जहाज़ से उसके दोनों बेटे घर लौट रहे थे वह हादसे का शिकार हो गया था। इस हादसे में उसका एक बेटा मर गया  बताया गया लेकिन एक बेटे को बचा लिया गया। फोन सुन कर उसे बाबा  समझ आई। 

वह रोते रोते बाहर आई तो बाबा का कुत्ता फिर से भौंकने लगा। इस बार कुछ ज़्यादा ऊंची आवाज़ में भौंक रहा था। बाबा ने फिर उसे शांत करने के लिए हाथ खड़ा किया और कहा अच्छा अच्छा दूसरा भी दे देता हूं। यह कह कर बाबा ने अपने कंधे से उतार कर रखे झोले में से फिर वही पहले वाली पोटली निकाली और और दूसरा लाल निकाल कर भी दे दिया। साथ ही बोले भैरव बाबा नाराज़ हो रहे हैं और कह रहे हैं दूसरा लाल भी दे दो। ले अब तेरे दूसरे लाल को भी कुछ नहीं होगा। इस पर महिला ने रोते हुई फोन पर सुनी सारी खबर बाबा को बताई। बाबा फिर मुस्कराते हुए बोले चिंता मत कर तेरे दुसरे लाल को भी कुछ नहीं होगा। दोनों सुरक्षित तेरे पास रहेंगे। 

इतने में फिर से फोन की घंटी बजी। उन दिनों मोबाईल नहीं हुआ करते थे। महिला फोन सुनने के लिए भाग कर घर कर अंदर गई। इस बार फोन था आपके दोनों बेटे सुरक्षित हैं। पहले हमें बेहोशी के कारण धोखा हुआ था। महिला की आँखों से आंसुओं की धरा नेह निकली। वह आँखें पौंछती हुई बाहर आई और बाबा के चरणों पर गिर पड़ी। बाबा ने उन्हें झोले से फिर कुछ प्रसाद दिया और कहना अपने ाप्ति और दोनों बेटों को भी खिलाना सब ठीक रहेगा। इसके साथ ही आशीर्वाद देते हुए उठ खड़े हुए। इस दर से मिली वो दो रोटियां तो शायद बहाना थीं। अघोरी बाबा उस महिला के दोनों बेटों को जीवनदान देने आए थे। 

क्या होते हैं अघोर पंथ के गहन रहस्य? कौन होते हैं अघोरी? कैसा होता है इनका जीवन? इसकी चर्चा किसी अलग पोस्ट में जल्दी ही की जाएगी।

निरंतर सामाजिक चेतना और जनहित ब्लॉग मीडिया में योगदान दें। हर दिन, हर हफ्ते, हर महीने या कभी-कभी इस शुभ कार्य के लिए आप जो भी राशि खर्च कर सकते हैं, उसे अवश्य ही खर्च करना चाहिए। आप इसे नीचे दिए गए बटन पर क्लिक करके आसानी से कर सकते हैं।

Tuesday, June 13, 2023

तंत्र की गहन शिक्षा और साधना ही दे सकती है सिद्धियों की कृपा

Tuesday 13th June 2023 at 05:45 PM

 उचित मार्गदर्शन के बिना न रखें इन रास्तों पर एक भी कदम 

लुधियाना: 13 जून 2023: (तंत्र स्क्रीन डेस्क):: 

*सुयोग्य गुरु का मार्गदर्शन ही दे सकता है पूरा लाभ 

*क्या तंत्र साधना से आयु और स्वास्थ्य के लिए हो सकता है लाभ?

*क्या इस रह पर चल कर मिल सकती है दौलत और शोहरत?

*अगर मन में सच्ची प्यास है तो सच्चा गुरु स्वयं आपको खोज लेगा!

योग, तंत्र और सिद्धि हमारे समय से भी पहले से उपयोग में हैं। यह विज्ञान की एक अलौकिक सी शाखा है जो अधिकतर लोग नहीं जानते हैं और जिसके बारे में शायद बहुत से लोगों की भ्रमित धारणाएं होती हैं। तंत्र और सिद्धि के इस्तेमाल से लोग अपनी आयु और स्वास्थ्य को स्थिर और स्वस्थ रखते हैं। इस ब्लॉग पोस्ट में हम सही तरीके से तंत्र और सिद्धियों का इस्तेमाल करना सीखेंगे जो आपके जीवन के लिए बहुत महत्वपूर्ण हो सकता है। इस ब्लॉग पोस्ट के जरिए हम आपको तंत्र और सिद्धियों के बारे में संपूर्ण जानकारी देंगे जो आपकी आयु और स्वास्थ्य की देखभाल करने में मदद करेगी।

तंत्र और सिद्धि क्या होते हैं? तंत्र साधना से शक्ति भी मिलती है और सिद्धि भी लेकिन रास्ता कम कठिन नहीं होता। तंत्र की साधना के लिए पहले स्वयं में शरीरक बल की भी आवश्कता पड़ती है, बुद्धि बल की भी और मनोबल की भी। तब कहीं जा कर आत्मिक बल सक्रिय होता है और साधना में सफलता मिलने के आसार बनने लगते हैं।  आम और कमज़ोर इन्सान तो आरम्भिक दौर में ही डर कर इस मार्ग पर बढना छोड़ देता है। इस मार्ग पर निरंतर चलने के लिए शक्तियों के भंडार अर्जित करने पड़ते हैं। तंत्र साधना अपने घर में हो, किसी सुनसान जगह पर बने किसी मन्दिर में या फिर श्मशान में-हर जगह पर कदम कदम पर परीक्षा जैसी स्थितियां बनती हैं। तंत्र साधनामें अगर साधक बुरी तरह डर जाए तो हार्ट अटैक जैसी बहुत सी समस्याएं पैदा होने के खतरा बना रहता है इस लिए अपने शरीर की रक्षा के उपाय सबसे पहले कर लिए जाने चाहियें।  

गौरतलब है कि तंत्र और सिद्धि एक वैज्ञानिक प्रक्रिया ही है जो अधिकतर भारतीय धर्म और तंत्र के अनुयायियों द्वारा उपयोग की जाती है। अब यह बात अलग है कि इसका अधिकतर विज्ञान धीरे धीरे लुप्त होता चला गया। तंत्र की ये सभी प्रक्रियाएं धार्मिक उद्देश्यों के लिए उपयोग की जाती रहीं हैं और विभिन्न साधनों व साधकों द्वारा की जाती हैं जो स्वयं में अद्भुत शक्तियों को लाया करते थे। 

तंत्र और सिद्धि का उपयोग व्यक्तिगत उन्नति और शारीरिक आरोग्य के लिए किया जाता है। तन,  आत्मा  शक्तियां बढ़ाना बहुत पहले बहुत ज़रूरी समझा जाता था। इसके अलावा, इन प्रक्रियाओं का उपयोग तनाव से मुक्ति, शांति और अधिक समझदार जीवन जीने में मदद मिलती है। इन प्रक्रियाओं का उपयोग प्राकृतिक तरीकों से अस्थिर मनोवैज्ञानिक समस्याओं से निपटने में भी किया जाता है। 

अब उल्लू के शरीर का कौन सा भाग कब और कहां काम आता है इसका पता तो बाद में किया जा सकता है लेकिन उल्लूक सिद्धि से भी पहले और अन्य सबसे पहले अपने स्वयं के शरीर का हर रहस्य पता लगाना ज़रुरी होता है। मानव शरीर की सरंचना इतनी दुर्लभ है कि विकसित विज्ञान आज भी इसके सामने चकरा जाता है। शरीर के बहुत से रहस्य ऐसे हैं जिनकी सही जानकारी अगर पता चल जाए तो इसे साधना सहज हो जाता है। शरीर और मन को साधने की प्रक्रिया के दौरान ही सिद्धियों जैसा आभास होने लगता है। सर्दी, गर्मी और मौसम की मार बेअसर होने लगती है। बातों में मधुरता के साथ साथ एक दैवी पभाव भी आ जाता है जिससे सद्ध्क की हर बात हर जगह मानी जाने लगती है।

इस शुरूआती साधना के कुछ पड़ाव पूरे करने के बाद ही साधना की कठिनाई और स्तर भी बढ़ने लगते हैं। तन्त्र और सिद्धियों के विभिन्न उपयोग विभिन्न तरह के अनुभव देने लगते हैं। बौद्ध तंत्र और जैन तंत्र साथ मुस्लिम तंत्र भी लोकप्रिय रहा है। 

तंत्र और सिद्धियों का सही उपयोग चिरआयु रहने और पूरी तरह से स्वस्थ रहने के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। इन तंत्रों और सिद्धियों के विभिन्न उपयोग हैं जो आप अपने जीवन में शामिल कर सकते हैं। एक बहुत सामान्य उपयोग है तंत्रों और सिद्धियों का उपयोग मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के लिए। आप अपनी चिंताओं को कम करने के लिए तंत्रों और सिद्धियों का उपयोग कर सकते हैं। इन तंत्रों और सिद्धियों का उपयोग आपको एक अधिक सकारात्मक जीवन जीने में मदद कर सकता है। आप तंत्रों और सिद्धियों का उपयोग अपने परिवार और दोस्तों के साथ संयोजित कर सकते हैं। इन तंत्रों को उपयोग करने की एक और विशेषता है कि आप इन्हें अपने घर में भी उपयोग कर सकते हैं। आप इन तंत्रों का उपयोग घर की सफाई, कुछ विशेष उद्योगों में सफलता, स्वास्थ्य और लंबी आयु के लिए कर सकते हैं। इन तंत्रों का उपयोग आपके जीवन को आसान बना सकता है। आप इन तंत्रों का उपयोग अपनी जरूरत के अनुसार कर सकते हैं। आप अपने दुखों को कम करने के लिए सिद्धियों का उपयोग कर सकते हैं। सिद्धियों का उपयोग आपको बड़े सपने देखने में मदद कर सकता है। तंत्रों और सिद्धियों का उपयोग करने से आप खुशहाल और स्वस्थ जीवन जी सकते हैं। इसका अनुभव थोड़ी सी साधना के बाद ही होने लगता है। निरंतर प्रयास की अपने आप में ही काफी महत्ता होती है। 

इस तरह तंत्र और सिद्धियों के लाभ आयु और स्वास्थ्य के लिए लोकप्रिय भी रहे हैं। ज्योतिष, वास्तु, और तंत्र-मंत्र सिद्धि आदि को दुनिया भर में लोग बहुत शक्तिशाली मानते हैं। वे अपने जीवन की समस्याओं को हल करने के लिए इनका सही इस्तेमाल करते हैं। तंत्र और सिद्धियों के इस्तेमाल से आप अपने जीवन में बदलाव ला सकते हैं और अपनी आयु और स्वास्थ्य को भी सुधार सकते हैं। तंत्र और सिद्धियों का सही इस्तेमाल करने से आप अपने जीवन को और बेहतर बना सकते हैं। बहुत से लोग तंत्र और सिद्धियों का इस्तेमाल सिर्फ अपनी समस्याओं को हल करने के लिए करते हैं। लेकिन इनके इस्तेमाल से आप अपनी आयु और स्वास्थ्य को भी सुधार सकते हैं। तंत्र और सिद्धियों की मदद से आप अपने जीवन में एक नए उलझन से निपट सकते हैं और अपनी स्वास्थ्य को सुधार सकते हैं। तंत्र और सिद्धियों के इस्तेमाल करने से आप अपनी आयु को भी बढ़ा सकते हैं और अपने जीवन की दिशा को निर्देशित कर सकते हैं। इसलिए, तंत्र और सिद्धियों का सही इस्तेमाल करने से आप अपनी आयु, स्वास्थ्य, और जीवन को बेहतर बना सकते हैं। अपनी मुसीबतों को काम कर सकते हैं और अपनी क्षमताओं को बढ़ा  सकते हैं छोटी मोती सीढ़ी सरल साधनाओं से भी बहुत सी सिद्धियां मिलने लगती हैं। 

इस ब्लॉग पोस्ट में, हमने तंत्र और सिद्धियों के सही इस्तेमाल के बारे में जाना। हम जानते हैं कि तंत्र और सिद्धियों का सही इस्तेमाल हमारे आयु और स्वास्थ्य के लिए कितना महत्वपूर्ण है। इनका सही इस्तेमाल हमें आर्थिक समृद्धि, शांति, सम्पूर्णता और स्वस्थ जीवन जीने में मदद करता है। अतः, हमें तंत्र और सिद्धियों का सही इस्तेमाल करना चाहिए। अगर हम तंत्र और सिद्धियों को सही तरीके से इस्तेमाल करते हैं तो हम अपने जीवन को सफल बना सकते हैं। इनका सही इस्तेमाल हमें आध्यात्मिक और शारीरिक रूप से स्वस्थ बनाता है। यह हमें आत्मविश्वास देता है कि हम अपने जीवन में कुछ भी हासिल कर सकते हैं। इसलिए, यदि हम तंत्र और सिद्धियों का सही इस्तेमाल करना सीखते हैं तो हम अपने जीवन को सफल बना सकते हैं। सभी मज़हबों में दैनिक पूजापाठ से जुड़ीं बातें तंत्र का ही बस उतना सा मामूली हिस्सा हैं जो आम जनमानस के लिए ज़रूरी समझा गया। बाकी ज्ञान को छुपा लिया गया था। तंत्र की शक्ति और सिद्धियां सुयोग्य पात्र को ही मिल सकें इसका पूरा ध्यान रखा जाता था। कुछ धार्मिक संगत आज के युग में इस तरह की साधना करवाते हैं लेकिन उनके अपने विशेष नियम भी हैं। उन नियमों का पालन आवश्यक है। 

(AIGWC//RK//Karthika//WhatsApp)

Friday, July 29, 2022

क्या तंत्र सिद्धियां भूल जाती हैं या बेअसर होने लगती हैं?

 क्यूं होता है ऐसा और क्या होता है उपाय 


हरिद्वार
29 जुलाई 2022 (तंत्र स्क्रीन डेस्क)::

तंत्र और साधना अलग अलग शब्द होते हुए भी काफी हद तक एक दुसरे से जुड़े हुए हैं। बहुत से संगठन हैं जहाँ साधना का मतलब ही तंत्र साधना है। यह बात अलग है कि साधक को चरणबद्ध तरीके से इसकी जेकरि दी जाती है। सिद्धियां मिलने पर भी उसे शांत और मौन रहना होता है। जो साधक ख़ुशी से ज़्यादा ही उछलने लगते हैं उनकी साधना का विकास भी रुक जाता है। जो साधक नियमित तौर पर गुरु से ली दीक्षा के मुताबिक साधनाकरते रहते हैं उन्हें अछे अनुभव अक्सर होने लगते हैं। उनके रुके हुए काम भी होने लगते हैं। मुख मंडल पर तेज और सिद्धि की चमक हबी दिखाई देने लगती है। आत्मविश्वास में हैरानीजनक वृद्धि होती है। 

दूसरी तरफ बहुत से साधकों को यह समस्या होने लगती है कि उन्हें कई बार कुछ वर्षों के बाद निराशा का सामना होना शुरू हो जाता है।  उन्हें  लगने लगता है कि उनके द्वारा की हुई सिद्धि अब काम नहीं कर रही। उनके तंत्र, मंत्र और हवन इत्यादि निरथर्क से लगने लगते हैं। जिस काम को लेकर सब कुछ किजा जाता है वह होता ही नहीं। जिसका आह्वान करते हैं उसके दर्शन भी नहीं होते। ऐसा सच में होता है। कोई आशंका या ग़लतफहमी नहीं होती। इसके कारण भी होते हैं। 

वास्तव में इसके पीछे कहीं न कहीं साधक अथवा साधिका की स्वयं की ही गलती होती है। जब जब भी अहंकार आने लगता है। सिद्धियों का गलत प्रयोग होने लगता है। निर्दोष मासूम लोगों का नुकसान होने लगता है तब तब सिद्धियों में भी व्यवधान आने लगता है और सिद्धियां भूलने भी लगती हैं। उनमे प्रमुख कारण है शक्ति के प्रयोग का विधि विधान भूल जाना। सिद्ध की हुई सिद्धि के मंत्र को भूल जाना अथवा कभी कभी मंत्र स्मरण का जाप भी याद न रहना। जब जब मंत्र नियमित तौर पर भी नहीं नहीं जपा जाता तब तब भी ऐसी समस्या आती है। तंत्र साधना में नियमित साधना आवश्यक है। 

ऐसी स्थिति तब तब भी विकट बनती है जब जब चरित्र की दुर्बलता आने लगती है। इसके अलावा सबसे प्रबल कारण है चरित्र से भटक जाना।  चरित्र के मार्ग से भटकते ही बुद्धि भर्मित रहने लगती है। उसे सही गलत का ज्ञान भूलने लगता है। ऐसी स्थित में अक्सर होता है कि कुछ अन्य महत्वपूर्ण सूत्र जो गुरु अथवा मार्ग दर्शक के द्वारा सिखाए गए होते हैं साधक उन्हें भी भूल जाता है। 

यह हालत बहुत बार दयनीय भी बन जाती है। बाहर से सब कुछ सही लगता है लेकिन साधक के अंदर की शक्ति खत्म हो चुकी है। ऐसी अवस्था में सिद्धि के होते हुए भी मनुष्य शक्तिहीन हो जाता है। इस स्थिति में जल्द ही संभला न जाए तो भौतिक और शरीरक समस्याएं भी आने लगती हैं।  

साधक का नाम तो अतीत में बन चूका होता है लेकिन वो न ही किसी पारलौकिक समस्या को ठीक कर सकता है न ही किसी के विषय में भूत काल से सम्बंधित घटनाओं को जान सकता है न ही स्वयं को ठीक कर पाता है।  ऐसे में गुरु का समरण ही उसे बचाता है। गुरु ही उसकी अशुद्धियां दूर कर के उसे शुद्ध करता है। साधना को फिर से करने के बाद ही उसे सिद्धियों की वापिसी मिलती है। ऐसा न करने पर उसका नाम पहले की तरह नहीं रहता। 

इस वापिसी के बिना साधक न ही भविष्य में घटित होने वाली सम्भावित घटनाओं का सही विश्लेषण भी नहीं कर सकता है। उसे खतरे का आभास होना भी बंद हो जाता है। उसके मन में निराशा, क्रोध और अन्य उपद्रव उठने लगते हैं। 

 इस लिए आवश्यक है कि सिद्धि प्राप्ति के बाद साधक को सदैव अभ्यास करते रहना चाहिए। उसे हमेशां नैतिक मूल्यों को याद रखना चाहिए। सिद्धि शक्ति के प्रयोगों का और समय समय पर हवन क्रियाओं द्वारा ऊर्जा को बढ़ाते रहना चाहिए। इससे उसकी सिद्धियां बनी रहेंगी , न केवल बनी रहेंगी बल्कि इनमें वृद्धि भी होगी। 

Saturday, December 11, 2021

बीमारी क्यूं कभी अकेली नहीं आती?

ओशो बताते हैं गहरा रहस्य जो हर किसी को पता होना चाहिए 


सोशल मीडिया
: 11 दिसंबर 2021: (तंत्र स्क्रीन डेस्क)::

कभी कभी बड़ी बड़ी बीमारियां भी इंसान को हरा नहीं पाती वह अपने रूटीन में चलता जाता है लेकिन कभी कभी नज़ला ज़ुकाम का छोटा सा अटेक भी मुसीबत खड़ी कर देता है। मैं हैरान था कि कभी कभी छोटी सी बीमारी मजबूरी क्यूं बन जाती है? इस बार मुझे इसका अटेक हुआ  एक पुराने मित्र के अचानक आने से। मुझे लगा कि शायद उसे भी था इस लिए मुझे भी इंफेक्शन हो गयी। इस बीमारी में पढ़नलिख्ना सम्भव ही नहीं था इस लिए सोचता रहा। मसाले वाली चाय पी और इंफेक्शन की गोली भी खाई। तभी ध्यान में आया की आज तो 11 दिसंबर है। ओशो का अवतरण दिवस। फोन पर कुछ तलाश किया तो ओशो की ढेर सारी समग्री मिली। इन्हीं में एक है जिनमें ओशो कहते हैं: बीमारी अकेली नहीं आती।  

ओशो ने जो बताया वह अनमोल है। समझने की गहरी बात है। उसी में है आरोग्य रहने का रहस्य। एक बहुत बड़ा सीक्रेट। ओशो बाकायदा हवाला देते हुए कहते हैं: आधुनिक मनोविज्ञान कहता है  कि जब तक आदमी का मन न बदला जाए, तब तक किसी बीमारी से वस्तुत: छुटकारा नहीं होता।

इसलिए तुमने भी देखा होगा, एक दफे बीमारी के चक्कर में पड़ जाओ तो उससे बचने का रास्ता नहीं दिखता। किसी तरह एक बीमारी से निकल नहीं पाते कि दूसरी घर कर लेती है, 'कि दूसरे से निकल नहीं पाते कि तीसरी घर कर लेती है। ऐसा लगता है, एक कतार है बीमारियों की, तुम एक से निपटे कि दूसरी बीमारी पकड़ती है। जब तक ठीक थे, ठीक थे। इसलिए लोग कहते हैं, बीमारी अकेली नहीं आती। कहावतें कहती हैं, बीमारी अकेली नहीं आती। संग—साथ में और बीमारियां लाती है। दुख अकेला नहीं आता, साथ में भीड़ लाता है।

इसका कारण? इसका कारण न तो दुख है, न बीमारी है। इसका कारण यह है कि मूल को हम छूते नहीं।

समझो कि एक वृक्ष की जड़ों में रोग लग गया है और पत्ते विकृत होकर आने लगे हैं। पूरे खिलते नहीं, पूरे खुलते नहीं, हरियाली खो गयी है। तुम पत्ते काटते रहो, या पत्तों पर मलहम लगाते रहो, या पत्तों पर जल का छिड़काव करते रहो—गुलाब जल का छिड़काव करो, तो भी कुछ बहुत होगा नहीं। जड़ जब तक आमूल स्वस्थ न हो तब तक कुछ भी न होगा।

मनुष्य की जड़ उसके मन में है। मनुष्य शब्द ही मन से बना है। मनुष्य यानी जो मन में रुपा है, मन में गड़ा है। उर्दू का शब्द है, आदमी, वह उतना महत्वपूर्ण नहीं। उसमें बहुत गहरा अर्थ नहीं है। उसमें जो अर्थ भी है, वह छिछला है। आदम का अर्थ होता है, मिट्टी। 'जो मिट्टी से बना है, उसको कहते आदमी। क्योंकि भगवान ने पहले आदमी को मिट्टी से बनाया और फिर उसमें श्वास फूंक दी, इसलिए उसका नाम आदम। फिर आदम के जो बच्चे हुए, उनका नामे आदमी। आदमी मिट्टी से बना है, मतलब आदमी देह है।

हमारी पकड़ इससे गहरी है। हम कहते है, मनुष्य। अंग्रेजी का मैन भी संस्कृत के मन का ही रूपांतर है। वह भी महत्वपूर्ण है। हम कहते हैं, मनुष्य। हम कहते हैं, मिट्टी नहीं है आदमी, आदमी है मन, आदमी है विचार, आदमी है उसका मनोविज्ञान। जैसे ईसाइयत, इस्लाम और यहूदी आदम को पहला आदमी मानते हैं, हम नहीं मानते। क्योंकि आदम होना तो आदमी का ऊपरी वेश है, वह असली बात नहीं है। असली बात तो भीतर छिपा हुआ सूक्ष्म रूप है।

मनुष्य का अर्थ ही होता है, जिसकी जड़ें मन में गड़ी हैं। लेकिन आधुनिक खोजें इस सत्य के करीब आ रही हैं। आधुनिक खोजें इस बात को स्वीकार करने लगी हैं कि आदमी शरीर पर समाप्त नहीं है। न तो शरीर पर शुरू होता है, न शरीर पर समाप्त होता है। शरीर तो घर है जिसमें कोई बसा है। फिर हम यह भी नहीं कहते कि आदमी मन पर समाप्त हो जाता है, हम कहते हैं, मन में गड़ा है। है तो मन से भी पार। इसलिए आदमी है तो आत्मा।

अब इन तीन शब्दों को ठीक से लेना—आत्मा, मन, देह। मन दोनों के बीच में है। मन को तुम शरीर से जोड़ दो तो संसारी हो जाते हो और मन को तुम आत्मा से जोड़ दो तो संन्यासी हो जाते हो। मन के जोड़ का सारा खेल है। आत्मा भी तुम्हारे भीतर है, शरीर भी तुम्हारे पास है, बीच में डोलता हुआ मन है। इसलिए मन सदा डोलता है। डांवाडोल रहता है। मध्य में लहरें लेता रहता है। अगर तुम्हारा मन शरीर की छाया होकर चलने लगे तो तुम संसारी, अगर तुम्हारा मन आत्मा की छाया होकर चलने लगे, तुम संन्यासी। कुछ और फर्क नहीं है। मन अगर अपने से नीचे की बात मानने लगे तो संसारी, मन अगर अपने ऊपर देखने लगे तो संन्यासी।

संन्यास की धारणा इस देश में पैदा हुई, क्योंकि हमें यह बात समझ में आ गयी कि मन दो ढंग से काम कर सकता है। मन तटस्थ है। मन की अपनी कोई धारणा नहीं है। मन यह नहीं कहता, ऐसा करो। तुम पर निर्भर है। तुम चाहो तो मन को शरीर के पीछे लगा दो, तो वह शरीर की गुलामी करता रहेगा। मन तो बड़ा अदभुत गुलाम है। उस जैसा आज्ञाकारी कोई भी नहीं। तुम उसे आत्मा की सेवा में लगा दो, वह आत्मा की सेवा में लग जाएगा। तुम उसे लोभ में लगा दो, वह लोभ बन जाएगा। तुम उसे करुणा में लगा दो, वह करुणा बन जाएगा।

सारे धर्म की कला इतनी ही है कि हम मन को नीचे जाने से हटाकर ऊपर जाने में कैसे लगा दें। और खयाल रखना, जो सीढ़ियां नीचे ले जाती हैं वही सीढ़ियां ऊपर ले जाती हैं। सीढ़ियां तो वही हैं। ऐसा भी हो सकता है कि दो आदमी बिलकुल एक जैसे हों, एक जगह हों, और फिर भी एक संन्यासी हो और एक संसारी हो।

ओशो.

एस धम्मों सनंतनो

प्रवचन:: 75

ओशो की बहुत सी और महत्वपूर्ण बातें आप यहां क्लिक करके भी पढ़ सकते हैं