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Monday, November 17, 2025

स्वप्न विजय साधना सिद्ध हो जाए तो बहुत काम देती है...!

स्वप्न विजय साधना सिद्ध हो जाए तो बहुत काम देती है...!

यादों की दुनिया से कुछ अनुभूतियां 16 नवंबर 2025: (रेक्टर कथूरिया/ /तंत्र स्क्रीन डेस्क )::


बहुत पहले की बात है।
ज़िंदगी की गर्दिश ने परेशान कर रखा था।  कोई रास्ता नहीं सूझता था। आत्म हत्या तो हमेशां ही बुरी ही लगी बिलकुल उसी तरह जैसे जीवन की जंग को हार जाना। कमज़ोर से कमज़ोर और बुरे से बुरे व्यक्ति को भी कभी हार अच्छी नहीं लगती ।  ऐसे में बहुत बार ख्याल आता बस भगवान् ही सहारा है। लेकिन ख्याल तो ख्याल ही होता है। उसे एक्शन में साकार किए बिना बात नहीं बनती और इसे एक्शन में साकार करना आसान नहीं होता। फिर भी इसका स्पष्ट इशारा मिला मुझे हरिद्वार की अनौपचारिक यात्रा में।   मैं उस समय ऊँगली पकड़ कर तो नहीं चलता था लेकिन स्वतंत्र भागदौड़ की समझ भी नहीं आई थी। मेले में खोने का डर मुझे खुद भी बना रहता और साथ वालों को भी।  हरिद्वार में हर की पौड़ी,  बड़े बड़े पहाड़, मंदिर,  मूर्तियां और कल कल बेहटा गंगा जी का जल बहुत अच्छा लगता।  मेरे सबसे बड़े मामा के घर लखनऊ में उनकी बेटी या बेटे की की शादी थी। वहां से लौटते हम लोग हरिद्धार के दर्शनों के लिए चल पड़े।  मेरे बाकी के तीन मामा परिवार सहित साथ थे। हम लोग ट्रेन से हरिद्वार पहुंचे थे ,स्टेशन पर गाड़ी पहुँचने से पहले ही माहौल बहुत सुंदर और अध्यतमियक होता चला गया। मेरी उम्र दस बरस से भी बहुत कम थी लेकिन मैं रेलवे स्टेशनों के बोर्डों पर लिखे नाम पढ़ने के प्रयास करने लगा था। 

स्टेशन से बाहर निकले तो मेरे मामा हमें उस आश्रम/कम धर्मशाला की तरफ लेजाने लगे जिसे उन्होंने अपने हाथों अपनी देखरेख में बनवाया था। उस समय वह ठेके दारी का काम करते थे। इस प्रोजेक्ट को पूरा करवाए शायद उन्हें कुछ देर हो गई थी या फिर आसपास बहुत से बदलाव आ गए थे कि उन्हें बार बार रस्ते भू ;  रहे थे। कभी एक सड़क पर  बढ़ते और हूँ फिर का फिर वहीँ चौराहे पर आ जाते। यह जगह हर की पौड़ी के नज़दीक ही थी। अगर हर की पौड़ी की तरफ मुँहकरो तो पीठ के पीछे बाजार था। उसी बाजार में चल कर आगे से आश्रम की तरफ रास्ता निकलता था। 

मैं उस समय हरिद्वार में पहली बार गया था पर न जाने मुझे क्या हुआ। मुझे ऐसा लगने लगा कि मैं यहाँ पहले भी आ चुका हूँ। मैंने मां जी से पूछा आप मुझे उस आश्रम का नाम बताएं। वे मेरी बात पर हँसे भी लेकिन उन्हीने नाम बताया और उस रस्ते पर बढ़ने तो राह में आने वाले कुछ पॉइंट भी बताए ,सब सुन कर मेरे मुँह से निकला अब समझ गया ,मैं उन्हें रास्ता बताता गया हम सब आगे बढ़ते गए और कुछ मिनटों बाद ही मां कहने लगे आ गए हम सही राह पर। मैंने उन्हें मोड़ मुद कर आने वाली दुकानों और अन्य इमारतों के नाम और निशानियां भी बताईं। 

आश्रम पहुँचने पर हमने भोजन भी किया और आराम भी। सभी ने मुझे बहुत पूछा तुम तो कहते थे तुम यहाँ पहली बार आए हो। फिर यह सारा रास्ता कैसे जानते हो ?  मैंने उन्हें लाख समझाया कि यह सब मैंने अपने स्वप्नों में कई बाद देखा हुआ है। मैं खुद हैरान था कि स्वप्न में देखे स्थल और नाम इतने साकार हो कर सामने कैसे आ रहे हैं? किसी ने मेरी बात पर यकीन नहीं किया। मुझे खुद भी अपने बारे में भरम जैसी स्थिति लगने लगी थी लेकिन यह सब सच था। यह सपनों का वह सच सामने आया था जी हकीकत से भी बड़ा सत्य बन कर दिखाई दे रहा था। मेरे लिए यह सचमुच बहुत बड़ी अनुभूति थी। इस सच की चमक मेरी तन मन की आंखों को चुंधिया रही थी। मन में की सवाल खड़े हो रहे थे जिनका जवाब मुझे नहीं मिल रहा था। शायद अध्यात्म और तंत्र साधना की तरफ मेरी उत्सुकता जन्म ले चुकी थी। 

वहां आश्रम में मौजूद कुछ साधू बाबाओं से भी इस पर पूछा। बहुतों ने तो मेरी बात हंसी में उड़ा दी लेकिन कुछ गंभीर लोग भी मिले। कहने लगे इस ज्योति को जलाए रखना। जिस दिन यह बड़ी जवका बनेगी उस दिन सही यात्रा पर निकल जाओगे। यही ज्योति रस्ते भी बटेगी और संसाधन भी सहायता भी यही करेगी पर इस ध्यान केंद्रित रखना। फिर एक बाबा ने स्वप्नों के विज्ञानं की चर्चा भी की। साथ ही सावधान भी किया की इस रस्ते पर बढ़े तो दुनियादारी की पढ़ाईलिखि बहुत पीछे छूट जाएगी। 

क्या होती है स्वपन विजय साधना यह सवाल मेरे सामने गंभीर होता जा रहा था। हरिद्वार में बहुत कुछ दर्शनीय और बेहद सुंदर है लेकिन मेरे सामने बस यही सवाल मुंह बाएं खड़ा  था। उम्र भी छोटी थी और समझ भी बहुत छोटी। उस अल्पबुद्धि में इस सवाल को समझ पाने की क्षमता भी शायद नहीं थी। इसी बीच परिवार के लोगों के सवाल और बातें मुझे सब डिस्टर्ब कर रहे थे। शांत बैठ कर सोच भी नहीं पा रहा था। पता नहीं कब मैं लेते लेते उठा और फिर सीधा बैठ गया। दीवार के साथबड़ा सा सिरहाना भी मिला। लेकिन सिरहाने के बावजूद रीढ़ सीढ़ी हो गई पदम् आसन भी लग गया। आँखें भी बंद हो गई। कुछ ही मिंट गुज़रे थे। स्वप्न विजय साधना का अण्वस्स्ड मन ही ही मन चलने लगा। 

उन बंद आँखों से मन देख भी रहा है,  कुछ पूछ भी रहा है और कुछ सुन भी रहा है। अनकही बातें बिना कहे कही जा रही थी। इन बातों को बिना कानों के सुने सुना भी जा रहा था। उन बंद आँखों से भी बहुत कुछ देखा रहा था। एक फ़िल्मी गीत याद है शायद फिल्म अनुराग का। जिसमें नायक बिना आँख वाली उस नायिका से पूछता है अरे तूने कैसे जान लिया?  जवाब मिलता है - -मन से आँखों का काम लिया  का काम लिया। 

बाद में इस लोकप्रिय फिल्म की बेहद खूबसूरत नायिका की ऑंखें ठीक हो जाती हैं। उसे फिल्म वाली कहानी के ही एक बच्चे की ऑंखें लगाई जाती हैं। बच्चे का देहांत हो चुका होता है।  ठीक होने के बाद वह नायिका उस बच्चे को देखना चाहती है - -उसे ढूंढ़ने की कोशिश करती है लेकिन वह तो जा चुका होता है। अनुमान लगाएं उसे रौशनी देने वाली ज़िंदगी जा चुकी होती है तो उस पर क्या गुज़री होगी? हमारी ज़िंदगी भी कुछ ऐसी ही रहती है। हम बहुत कुछ खो बैठते हैं। पाना - खोना - -खोना पाना बस यही एक सिलसिला है ज़िंदगी। खैर बात तो चल रही थी हरिद्वार के एक आश्रम की। वहां पर मेडिटेशन जैस स्थिति में चल रहे एक स्वप्न की। चलो लौटते हैं उसी मुद्दे पर। 

उस समय आश्रम में बैठे हुए जो मनोस्थिति थी उस समय स्वप्न जैसे कुछ दृश्य भी चल रहे हैं। अधखुली आलखों जैसी सी स्तिति भी कह सकते हैं। कुछ दृश्य कभी धुंधले से और कभी कुछ स्पष्ट भी। कभी आमने सामने होती बात भी लगती। स्पष्ट सी परिभाषा शाद मेरी समझ से परे  है। 

वास्तव में कई लोगों को स्वप्न विजय की सिद्धि भी हो चुकी होती है।  ऐसे स्वपन की विजय साधना एक धार्मिक संकल्प का प्रयास हो सकता है जिसमें  स्वप्नों के माध्यम से सफलता और उपलब्धि प्राप्त करने का प्रयास और चाहत दोनों मिल कर सक्रिय हो जाते हों। ज़िंदगी की मुश्किलें और मुसीबतों से छुटकारा पाने के रस्ते और समाधान नज़र आने लगते हैं। ज़िंदगी के अंधेरों में रौशनी दिखाते हैं ऐसे स्वप्न।  

ऐसा भी लगने लगा कि यह कोई विशेष आध्यात्मिक इशारा भी है। आगे बढ़ना होगा लेकिन कैसे?  जवाब मिला स्वपन विजय साधना के माध्यम से ही पता लगाना होगा क्यूं आए हो इस दुनिया में? अब समझ आने लगा कि बचपन में ही बहुत पहले खेलने की तरफ भी मन क्यूं नहीं लगा रहा था। न गिल्ली डंडा न ही पतंगबाज़ी - -किसी में रस नहीं जग रहा था।  खाने पीने और सुंदर वस्त्र पहनने की तरफ भी रुचि क्यूं नहीं थी। बस गीत संगीत सुन्ना और पेन्सिल से स्केच बनाना। पीला रंग भी बहुत अच्छा लगता फिर भी सफेद वस्त्र मुझे अच्छे लगते। वस्त्रों में बस एक लंबी चादर सी मुझे बहुत पसंद रही। सिर से लेकर पाँव तक यही थी मेरा वस्त्र। लेटता तो ऊपर ओढ़ लेता और बैठता तो लोई की तरह ओढ़ ओट लेता। ऐसा भी लगा कि इस चादर के साथ में साधना आगे बढ़ाना सुविधाजनक है।  ऐसा ही लगता कि अपने स्वप्नों, इच्छाओं, और लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए उपलब्ध तकनीकों और साधनों का उपयोग भी इस के साथ किया जा सकता है। 

स्वपन विजय साधना के लिए कुछ महत्वपूर्ण तत्व ज़रूरी भी होते हैं। एकांत भी.  स्वछता भी थोड़ा सा अँधेरा करके आँखों को अधखुला रखना भी। उस चादर को लपेटना और ऊपर ओढ़ना अच्छा अच्छा लगता। सिर से पाँव तक उसे ओढ़ कर लेटने से अच्छा लगता। रेलगाड़ी , रेलवे स्टेशन या सुनसान स्थानों पर तो और भी अच्छा महसूस होता। कभी कभी स्वच्छ ताज़ी हवा के लिए नाक और मुँह से थोड़ी सी चादर हटा कर कुछ लंबे सांस लेना और फिर मेडिटेशन में उतरने के प्रयास करना। उसी चादर से मूंह को ढके हुए ही दिन के समय भी कभी आसमान देख लेना और कभी सितारे,  चन्द्रमा और सूर्य इत्यादि भी। ऐसे दृश्य बहुत बार देखे। अलौकिक आनंद भी देते ।  ऐसी यात्रियों की कृपा उस भगवान् ने बहुत बार की। दूर दराज के कई स्थान उन्हीं स्वप्नों में देखे जहां वास्तव में बहुत बाद में ही जाया जा सका। इनके बारे में पहले कभी कुछ पढ़ा या सुना भी नहीं था। फिर भी यूं लगा जैसे पूरा दृश्य सामने नज़र आ रहा हो। सचमुच बहुत विशेष अनुभव रहा। 

मन को शांत करने की भी ज़रूरत नहीं पड़ती थी। यह खुद-ब-खुद शांत होना शुरू हो गया था। बस बैठना और इच्छा करना। मन और स्वप्न की इस यात्रा के साथ साथ तन को भी यात्रा की अनुभूतियां होने लगीं थी। फिर इन अनुभवों और दृश्यों को कागज़ पर उतारने का भी मन होता लेकिन मुझे उस समय ताल लिखने में मुहारत नहीं हुई थी। स्वपन विजय साधना के लिए मन को शांत और स्थिर रखना महत्वपूर्ण भी होता है लेकिन यह सब स्वयंमेव होने लगा था। ध्यान भी लगने लगा और प्राणायाम की इच्छा भी बढ़ने लगी। मेडिटेशन में रहने की इच्छा तो हर पल रहने लगी। अपने मन को शांत करने की इच्छा और साधना की एक अलग सी चमक भी चिहरे पर दिखाई देने लगी। मन और विचारों की स्थिरता भी बढ़ने लगी। मन अध्यात्म की जानकारी की तरफ दौड़ता। 

घर परिवार से बिना पूछे कहीं जाना मुमकिन नहीं था। उस उम्र मैं ऐसा रिवाज ही नहीं था। केवल कल्पना ही एक जरिया था जहां मैं अपनी मर्ज़ी से जा सकता था। इसके इलावा कोई रास्ता था तो बस स्वप्न का ही था। जब जागता रहता तब भी मैं इस मकसद के संकल्प को मज़बूत बनाता।  सचमुच संकल्प शक्ति में बहुत सी क्षमता छुपी होती है। मैंने अपने उद्देश्यों और मकसद पर अपने स्वप्न बुनने शुरू किए। साहिर लुधियानवी साहिब की पंक्तियाँ प्रेरणा भी देती - -ज़रा देखें एक नज़र:

तुम ने कितने सपने देखे मैं ने कितने गीत बुने

इस दुनिया के शोर में लेकिन दिल की धड़कन कौन सुने


सरगम की आवाज़ पे सर को धुनने वाले लाखों पाए

नग़्मों की खिलती कलियों को चुनने वाले लाखों पाए


राख हुए जो दिल में जल कर वो अंगारे कौन चुने

तुम ने कितने सपने देखे मैं ने कितने गीत बुने


अरमानों के सूने घर में हर आहट बेगानी निकली

दिल ने जब नज़दीक से देखा हर सूरत अन-जानी निकली


बोझल घड़ियाँ गिनते गिनते सदमे हो गए लाख गुने

तुम ने कितने सपने देखे मैं ने कितने गीत बुने। ..!

यह गीत और साहिर लुधियानवी साहिब की अन्य रचनाएं। मन को किसी दूसरी दुनिया में जाने में काफी सहायक रहे। बहुत बार लगने लगता यह दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है! साहिर लुधियानवी साहिब के गीतों ने मुझे जहाँ समाजवाद के नज़दीक किया वहां शायरी की दुनिया के काफी नज़दीक भी किया। दुनिया में रहते हुए दुनिया से अलग ह कर सोचने के अनुभव इस शायरी ने भी बहुत दिए। उन दिनों रेडियो में ऐसे गीत संगीत आते भी बहुत थे। 

साहिर साहिब भी मुझे इस बात की प्रेरणा देते रहे कि सपने भी कैसे बुने जाते हैं गीत भी कैसे बुने जाते हैं। इस गीत साधना के रास्ते भी मुझे अपने लक्ष्यों को स्पष्ट करेने में सहायता मिलती रही। फिर उनसे अपने संकल्पों को देखने समझने और मज़बूत बनाने की कला भी आती गई।  सोते जागते वे गीत,  उनके बोल मेरे दिन रात के रूटीन में शामिल हो गए। मेरा सोने जागने रूटीन भी सुधरने लगा।  सुबह ढाई तीन बजे जग जाना ,  प्राणायाम करना और पांच छह बजे तक तैयार हो जाना इसी रूटीन से समझा और सीखा। धीरे धीरे इस तरफ रुचि विकसित हुई तो इसी क्षेत्र से जुड़े अच्छे अनुभवी लोग भी मिलते रहे। 

दिल्ली में जब डाक्टर मुखर्जीनगर में रहना हुआ तो यमुना किनारे जा कर मेडिटेशन में बैठना भी रोज़ की बात हो गई। मेरे साथ कभी कभार दो चार लोगों की मित्र मंडली भी होती थी। उस उम्र में गिने चुने मित्रों की यह मंडली शायद ज़रूरी भी थी। उनको मालुम था उस बांध के नज़दीक किस जगह मैं समाधि में बैठता था। एक बार घर लौटने में अँधेरा हुआ तो उन्होंने मेरे परिवा और मोहल्ले को बता दिया। कहीं बाढ़ न आ गई हो कहीं बाँध से पानी न छोड़ा गया हो ,  कहीं उधर कोई खूंखार जानवर न आ निकला हो . ..!परिवार के लोग और अड़ोस पड़ोस वाले ढूंढ़ने पहुंचे। जिन मित्रों को जगह मालूम थे वे ही साथ लेकर वहां गए थे। 

योगाभ्यास भी इसी रूटीन से ज़िंदगी में शामिल हुआ। योग से जहाँ शरीरक तंदरुस्ती मिलती वहीँ मानसिक शक्ति, भी मिलती। शरीरिक स्वास्थ्य और उच्च स्तरीय ध्यान प्राप्त करने  की इच्छा और मार्गदर्शन भी मिलता गया। यह मार्गदर्शन ज़िंदगी की अधयत्मिक यात्रा में भी मदद कर सकता है। नियमित योगाभ्यास करने से मनोदशा भी सुधरती है और दिशा भी सही मिलती है। ऐसा होने से स्वप्नों को साकार करने में भी सहायता मिलती है।

इसी संबंध में पुराणों और शास्त्रों का अध्ययन करें तो हिंदू धर्म में, स्वप्न विजय साधना के बारे में कैफीकुछ मिलता है। विविध पुराणों और ग्रंथों में इस तरह की बहुत सी अर्थपूर्ण बात की गई है। जिनको यह सब कठिन लगता हो वे लोग ओशो के ज़रिये इनका अधीन कर सकते हैं समझ जल्दी आ जाएगी।  इन पुराणों और ग्रंथों का अध्ययन करने से आपको स्वप्नों के विजय पर विस्तारित ज्ञान मिल सकता है। स्वप्न में क्या देखना चाहते हैं आप इस का भी ज्ञान है। इसका पता चलते ही उस अलौकिक ज्ञान की झलक मिलनी शुर होती है। 

हाँ इस संबंध में नियमित और ईमानदार रूप से साधना करना आवश्यक है। जो लोग खुद के प्रति ईमानदार नहीं होते वे साधना व संसार के प्रति भी ईमानदार नहीं हो सकते।  स्वप्न विजय साधना के लिए नियमितता और निष्ठा महत्वपूर्ण हैं। संकल्प तभी मज़बूत बन पाएंगे। आपको अपने विशिष्ट साधनाओं को निरंतरता के साथ करना चाहिए और उन्हें पूरा करने के बाद निष्ठा के साथ प्रतिक्रिया करनी चाहिए। इसी क्रिया प्रतिक्रिया से ही नया नया ज्ञान भी मिलेगा। 

यदि आप स्वप्न विजय साधना करना चाहते हैं, तो यह आपके धार्मिक अनुयायियों या आपके गुरु या धार्मिक मार्गदर्शक के संपर्क में रहने से मदद मिलतिओ ही है। इसी दिशा में यात्रा करने वाले मित्रों, सहयोगियों या साथियों की नज़दीकी भी आमतौर पर सहायक रहती है वैसे इस दिशा की यात्रा कई बार बिलकुल अकेले में अधिक मज़ेदार भी रहती है। 

इस आश्रम में मेरे आसपास परिवार के भी काफी लोग थे। इस से ध्यान साधना बार बार भंग हो रही थी। उस छोटी आयु में वहां से निकल कर मैं कहाँ गया यह एक अलग कहानी है जिसकी चर्चा मैं हकड़ ही करूंगा। तब के लिए आज्ञा चाहता हूँ कि यह पोस्ट पहले ही काफी लंबी हो गई है। इस आश्रम की जानकारी भी जल्द ही किसी अलग पोस्ट में सांझी करूंगा कि कैसे पंजाब के एक बहुत बड़े कारोबारी ने अपनी श्रद्धा से इसे बनाया। इसकी सेवा उन्होंने उन महापुरुषों के चरणों में की जिन्हें वह अपना गुरु मानते थे उनकी मान्यता भी बहुत है।  हमें यहाँ जाने का सुअवसर मिला इसी आश्रम का निर्माण करवाने वाले ठेकेदार गुरुचरण सिंह छाबड़ा के स्नेह और सहयोग से। 

                              --रेक्टर कथूरिया/ /तंत्र स्क्रीन डेस्क

Sunday, July 14, 2024

कैसे मिलते हैं तंत्र मार्ग पर सही रास्ते और सच्चे गुरु

तंत्र की हकीकत--प्रमाणिकता और इतिहास....! 

लुधियाना: 13 जुलाई 2024: (के. के.सिंह//तंत्र स्क्रीन डेस्क)

तंत्र को मानने वालों की संख्या न मानने वालों से आज भी ज़्यादा है। केवल गांवों में ही नहीं बल्कि शहरों में भी। देश में ही नहीं विदेशों में भी।  बस अलग अलग जगहों पर इसका रंग रूप अलग हो सकता है। अफ्रीका के तंत्र की बहुत सी कहानियों पर तो बहुत दिलचस्प नावल भी लिखे गए थे। किसी भी इंसान का पुतला बना कर उसे सुईयां चुभो चुभो कर और मंत्र पढ़ कर उसे बिमार करना और धीरे धीरे मौत के घात उतार देना अफ्रीकी तंत्र में आम रहा है। हालांकि विज्ञानं और तर्कशील सोच वालों ने इसे कभी सच नहीं माना लेकिन फिर भी बहुत बड़ी संख्या में लोगों की इस में आस्था और मान्यता निरंतर बनी हुई है। 

अगर हम तंत्र की हकीकत--प्रमाणिकता और इतिहास पर चर्चा करें तो बहुत सी बातें इसके हक़ में भी मिलेंगी और विरोध में भी। जो लोग इसके हक़ में हैं वो बहुत सी बातें बताएंगे जो सबूत जैसी ही लगेंगी। इनमें पढ़े लिखे लोग भी अक्सर शामिल होते हैं। 

जो लोग तंत्र के हक़ में नहीं हैं वे भी बंटे हुए हैं। उनमें से अधिकतर लोग ऐसे हैं जो दबे दबे से स्वर में इसका विरोध करते हैं खुल कर नहीं। उनके स्वर में भय मिश्रित सुर को भी महसूस किया जा सकता है। उन्को खुद चाहे तंत्र प्रयोग का कोई भी अच्छा या बुरा अनुभव न रहा हो लेकिन किसे से सुना सुनाया कोई भयानक अनुभव ज़रूर याद रहता है और उसका भय उनकी आंखों में महसूस कीजै जा सकता है। कई लोग ऐसे में घबरा कर ऐसा भी कहते हैं हमें इस पर कुछ नहीं कहना। आपको पता नहीं यह चीज़ें बहुत भरी होती हैं। 

तंत्र की उत्पत्ति और इतिहास

तंत्र एक प्राचीन भारतीय आध्यात्मिक परंपरा है, जिसकी जड़ें वैदिक काल में पाई जाती हैं। इसका उल्लेख वेदों, उपनिषदों, पुराणों और अन्य धार्मिक ग्रंथों में मिलता है। तंत्र साधना का विकास मुख्यतः गुप्त काल (4वीं से 6वीं सदी) में हुआ, जब इसे बौद्ध, जैन और हिंदू परंपराओं में अपनाया गया। बहुत से समुदायों और संगठनों ने इसे धीरे धीरे पूरी तरह से अपना लिया। अब अलग अलग नामों से तंत्र हर क्षेत्र और सम्प्रदाय में मौजूद है। 

केवल इतना ही नहीं छोटे छोटे डेरों और मज़ारों पर भी अक्सर तंत्र के क्रियाकलाप किए जाते हैं। लोग झाड़ा करवाने वहां जाते हैं और उसके बाद वे पूरी तरह से ठीक होने का दावा भी करते हैं। ीा मामले में क्या क्या संभव है इसकी चर्चा भी हम अलग से किसी पोस्ट में करेंगे ही। 

तंत्र के सिद्धांत गहरी बातें करते हैं

तंत्र का मुख्य उद्देश्य आत्मा और परमात्मा के मिलन को प्राप्त करना है। यह यथार्थवादी दृष्टिकोण अपनाता है और मानता है कि संसार को त्यागने के बजाय, उसकी वास्तविकता को समझकर और उसमें रहकर आत्मा की उन्नति की जा सकती है। तंत्र साधना में मंत्र, यंत्र, और विभिन्न प्रकार की ध्यान विधियों का प्रयोग होता है। इन विधियों को समझना और करना सहज नहीं होता लेकिन फिर भी बहुत से लोग ऐसा करते हैं। 

तंत्र और योग का संबंध 

शरीर शुद्ध और निरोग न हो तो तंत्र की बात तो दूर साधारण मेडिटेशन भी संभव नहीं रहती। शरीर की निरोगता और उसका बलवान होना आवश्यक है। शरीर की शक्ति अर्जित करने के बाद ही मन को बलवान बनाना सिखाया जाता है। इसके बाद आत्मा की शक्ति को जगाने और उसे बढाने की विधियां आती हैं। वास्तव में तंत्र और योग का गहरा संबंध है। तंत्र साधना में ध्यान, प्राणायाम, मुद्रा और बंध जैसे योग के अंगों का उपयोग किया जाता है। तंत्र साधना का एक महत्वपूर्ण हिस्सा कुंडलिनी योग है, जिसमें शरीर में स्थित ऊर्जा केंद्रों (चक्रों) को जागृत किया जाता है। जो साधक इन रहस्यों को समझ जाता है उसके लिए तंत्र साधना के मर्म तक पहुंचना भी संभव हो जाता है। 

तंत्र साहित्य के क्षेत्र 

यूं तो तंत्र में बहुत सा साहित्य शामिल है जिसे गिना भी नहीं जा सकता। किसी बड़े पुस्तकालय या पुस्तक बिक्री केंद्र में जाएं तो तंत्र पर बहुत सी पुस्तकें और ग्रंथ वहां देखने को मिलेंगे। हर पुस्तक का कवर लुभावना होगा। तस्वीर रहसयमय और नाम अपने आप में बहुत कुछ समेटे होगा। लेकिन इसमें सच्चे तंत्र साहित्य को कोई सच्चा साधक या गंभीर पाठक ही समझ पाता है। 

तंत्र साहित्य में विभिन्न ग्रंथ शामिल हैं, जैसे कि शैव आगम। भगवान शिव के भक्तों में शैव आगम से सबंधित ये ग्रंथ बहुत महत्वपूर्ण होते हैं। साधक भगवान शिव को सर्वोच्च देवता मानते हैं। ओशो ने भी तंत्र की जिन 112 विधियों का उल्लेख किया है वह बहुत अर्थपूर्ण है। तंत्र पर ओशो के प्रवचनों पर आधारित बहुत सी किताबें भी मार्कीट में हैं। ख़ास बात यह है कि इन 112 विधियों में से कोई न कोई ऐसी विधि सभी को मिल जाती है जो उसकी शरीरक सरंचना, मन की अवस्था, समय की अनुकूलिता और हर मामले में रास आ ही जाती है। 

इसी तरह शाक्त आगम का क्षेत्र भी बहुत अलग और विशाल है। इस क्षेत्र से जुड़े ग्रंथ देवी की पूजा पर आधारित होते हैं। इन ग्रंथों में तंत्र से सबंधित विधियां भी बहुत गहन होती हैं। इन विधियों के लिए अग्रसर होना हो तो साधक को बहुत तैयारी भी करनी पड़ती है। इन विधियों में देवी के रूप को बहुत विधि से ध्याना होता है। देवी को बुलाने और उसके आने पर जो जो करना होता है उसके पूरे नियम भी होते हैं। इसमें क्यूंकि मुख्यता देवी को मां के रूप में पूजा जाता है तो साधक के मन में यह बात पूरी मज़बूती से बनी रहती है कि मैं मां की संतान हूं इसलिए मां मुझे मेरी हर बुराई और पाप के साथ स्वीकार करेगी और मुझे क्षमा करेगी। इस भावना से साधक की आत्मिक प्रगति तेज़ी से होने लगती है। उसका शरीर भी शुद्ध और बलवान होने लगता है और मन भी मज़बूत बन जाता है। 

तंत्र साधना से जुड़े साहित्य और ग्रंथों में वैष्णव आगम  ग्रंथ  महत्वपूर्ण हैं। ये विष्णु और उनके अवतारों की पूजा पर केंद्रित हैं। वर्ष 1972  में आई फिल्म हरी दर्शन एक तरह से इन्हीं ग्रंथों पर आधारित थी। निर्देशक थे चंद्रकांत और मुख्य कलाकारों में थे दारा सिंह। फिल्म की कहानी प्रहलाद भक्त पर आधारित थी और गीत संगीत भी बेहद जादू भरा था। बालक प्रह्लाद की भूमिका निभाई थी सत्यजीत पुरी ने। 

आखिर में यह उल्लेख आवश्यक है कि तंत्र का आधुनिक संदर्भ बहुत प्रदूषित जैसा हो गया है। आजकल तंत्र को अक्सर गलत तरीके से प्रस्तुत किया जाता है, जिससे इसकी वास्तविकता और महत्व धुंधला हो जाता है। तंत्र की सच्ची साधना में नैतिकता, स्व-अनुशासन और गुरु-शिष्य परंपरा का विशेष महत्व है। इसलिए इस तरफ भी ध्यान दिया जाना आवश्यक है। 

कुल मिलकर तंत्र एक समृद्ध और जटिल परंपरा है, जिसका इतिहास और प्रामाणिकता गहन अध्ययन और अनुभव से ही समझा जा सकता है। यह केवल एक साधना पद्धति नहीं है, बल्कि जीवन को देखने और समझने का एक व्यापक दृष्टिकोण है, जो व्यक्ति के मानसिक, शारीरिक और आध्यात्मिक विकास में सहायक होता है। इसकी सच्ची खोज केवल किताबों से कुछ वीडियो चैनल देख कर नहीं हो सकती। अंतर्मन में तंत्र के लिए सवयं की प्यास जागने पर ही रास्ते मिलते हैं और गुरु भी। 

Tuesday, April 16, 2024

तंत्र की हकीकत//प्रमाणिकता और इतिहास

Monday 15th April 2024 at 09:45 AM 

तंत्र का सच तंत्र में आ कर ही समझना सही होगा


हरिद्वार
: 16 अप्रैल 2024: (तंत्र स्क्रीन डेस्क)::

तंत्र की हकीकत कैसी है, कितनी है यह लगातार शोध का विषय रहा है। इसकी प्रमाणिकता को लेकर भी दलीलें मिलती हैं और इसके इतिहास  भी। तंत्र की कथाएं और गाथाएं सदियों पुरानी हैं। तंत्र की उत्पत्ति और इतिहास को लेकर बहुत कुछ कहा, सुना और लिखा जा चुका है। 

लेकन यह एक सत्य है कि तंत्र एक प्राचीन भारतीय आध्यात्मिक परंपरा है, जिसकी जड़ें वैदिक काल में पाई जाती हैं। इसका उल्लेख वेदों, उपनिषदों, पुराणों और अन्य धार्मिक ग्रंथों में मिलता है। तंत्र साधना का विकास मुख्यतः गुप्त काल (4वीं से 6वीं सदी) में हुआ, जब इसे बौद्ध, जैन और हिंदू परंपराओं में अपनाया गया।बौद्ध, जैन और हिन्दू परंपराओं में तंत्र की बहुत जहां चर्चा मिलती है। इस संबंध में मंदिर जैसी विशाल इमारतें भी मिलती हैं। इन्हीं में एक है 64  जो कई अलग अलग जगहों पर बना हुआ है। इसके महत्व और मकसद को लेकर भी बहुत कुछ कहा गया है। तंत्र में आस्था रखने वाले इसे तंत्र की यूनिवर्सिटी कहते भी हैं और मानते भी हैं। कहा जाता है कि संसद के पुराने भवन का डिज़ाईन और आकार इसी मंदिर से प्रेरणा पा कर रचा गया था।  

अब तंत्र के सिद्धांत की बात करें तो वह बहुत उंच और पवित्र है अब यह बात अलग अलग है बहुत से लोगों ने इसे अपने अपने ढंग से लेकर स्वार्थ सिद्धि करनी शुरू कर दी। वास्तव में तंत्र का मुख्य उद्देश्य आत्मा और परमात्मा के मिलन को प्राप्त करना है। यह यथार्थवादी दृष्टिकोण अपनाता है और मानता है कि संसार को त्यागने के बजाय, उसकी वास्तविकता को समझकर और उसमें रहकर आत्मा की उन्नति की जा सकती है। तंत्र साधना में मंत्र, यंत्र, और विभिन्न प्रकार की ध्यान विधियों का प्रयोग होता है। सच्चा तांत्रिक हर मिशन में कामयाब होता है बेशक वह कितना ही कठिन मकसद क्यूं न हो। 

तंत्र और योग का भी बहुत गहरा संबंध है। योग साधना से शरीर की मुश्किलें और व्याधियां दूर होती हैं जिससे तंत्र में सहायता मिलती है।  तंत्र का मिशन जल्दी कामयाब होता है। सिद्धि जल्दी मिलती है। समाधी भी जल्दी लगती है और भगवान से गहन ध्यान जल्दी जुड़ता है। भूख, प्यास, गर्मी सर्दी का अहसास और दुःख-सुख की भावना सब नियंत्रित हो जाते हैं। कई कारणों से तंत्र और योग का गहरा संबंध है। तंत्र साधना में ध्यान, प्राणायाम, मुद्रा और बंध जैसे योग के अंगों का उपयोग किया जाता है। तंत्र साधना का एक महत्वपूर्ण हिस्सा कुंडलिनी योग है, जिसमें शरीर में स्थित ऊर्जा केंद्रों (चक्रों) को जागृत किया जाता है।

तंत्र साधना के इस क्षेत्र में आने से इससे जुड़ा साहित्य पढ़ना लाभदायक रहता है। इस साहित्य का अध्यन मार्ग दिखने में सहायक साबित होता है। मन की शंकाओं का भी निवारण करता है। इस तरह से तंत्र साहित्य के अधिक से अधिक ग्रंथ पढ़ने फायदेमंद रहते हैं। गौरतलब है कि तंत्र साहित्य में विभिन्न ग्रंथ शामिल हैं, जैसे कि:

शैव आगम बहुत ही महत्वपूर्ण गिना गया है। ये ग्रंथ शिव को सर्वोच्च देवता मानते हैं।

इसी तरह शाक्त आगम का भी बहुत महत्व है। ये ग्रंथ देवी की पूजा पर आधारित हैं।

वैष्णव आगम में भी बहुत से रहस्य उजागर किए गए हैं। ये विष्णु और उनके अवतारों की पूजा पर केंद्रित हैं।

तंत्र की प्रामाणिकता को लेकर अभी भी लोग अक्सर बहस में पड़ जाते हैं। तंत्र की प्रामाणिकता को लेकर कई मतभेद हैं। कुछ विद्वान इसे वैदिक परंपरा का ही एक अंग मानते हैं, जबकि कुछ इसे स्वतंत्र परंपरा के रूप में देखते हैं। तंत्र साधना का वैज्ञानिक आधार भी है, जिसमें ध्यान और प्राणायाम की विधियाँ मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के लिए लाभकारी मानी जाती हैं। फिर भी यह एक हकीकत है कि बहुत पढ़े लिखे और उच्च पदों पर नियुक्त लोग तंत्र में गहरी आस्था रखते हैं। तांत्रिकों के पास सलाह लेने के लिए जाने वालों में  विद्वान भी शामिल रहते हैं। 

इस तरह तंत्र का आधुनिक संदर्भ भी बहुत प्रभावशाली है। अब यह बात अलग है कि आजकल तंत्र को अक्सर गलत तरीके से प्रस्तुत किया जाता है, जिससे इसकी वास्तविकता और महत्व धुंधला हो जाता है। तंत्र की सच्ची साधना में नैतिकता, स्व-अनुशासन और गुरु-शिष्य परंपरा का विशेष महत्व है। चादर या चटाई बिछा कर  बिछा कर सड़क पर बैठने वालों ने ज्योतिष और तंत्र दोनों को सस्ता बना दिया है। लोगों की नीर में यह सब अब सड़क छाप बन गया है। 

लेकिन सच में निष्कर्ष यही है कि तंत्र एक समृद्ध और जटिल परंपरा है, जिसका इतिहास और प्रामाणिकता गहन अध्ययन और अनुभव से ही समझा जा सकता है। यह केवल एक साधना पद्धति नहीं है, बल्कि जीवन को देखने और समझने का एक व्यापक दृष्टिकोण है, जो व्यक्ति के मानसिक, शारीरिक और आध्यात्मिक विकास में सहायक होता है।

तंत्र का सच तंत्र में आ कर ही समझना सही होगा। सुनी सुनाई या पढ़ी पढाई बातों से भी वह बात नहीं बनती। सच्च मार्गदर्शक या गुरु बहुत किस्मत से   देखरेख में तंत्र साधना करना ठीक रहता है वरना यह सब खतरनाक भी साबित हो सकता है।  

Friday, March 15, 2024

महिला तांत्रिक बहुत ज़िम्मेदारी से सहेज रही हैं तंत्र की गुप्त विद्या

बहुत सख्त किस्म का अनुशासन होता है तंत्र के लाइफ स्टाईल में 


हरिद्वार
: 15 मार्च 2024: (मीडिया लिंक//तंत्र स्क्रीन डेस्क)::

भारत में महिला तांत्रिकों और महिला अघोरीयों  का जीवन कैसा है और उनकी शक्ति या सिद्धि कैसी है इसे जानने की जिज्ञासा मीडिया से जुड़े हम सभी लोगों को भी थी लेकिन यह सब इतना आसान भी तो नहीं था। बिना उनकी आज्ञा के उनके शिविर, आश्रम या रिहायशी ठिकानों के नीदीक जाना न तो उचित होता है न ही खतरों से खाली। उन्हें किसी भी छोटी सी बात पर नाराज़ करना कई मुश्किलें खड़ी कर सकता है। 

ज़िन्दगी का इत्तफाक कहो या फिर किस्मत की बातें कि मन की इच्छाएँ अगर शिद्दत से भरी हुई हों तो वे पूर्ण भी हो जाती हैं .इसी तरह रूटीन के जीवन में भी कभी कभार कहीं न कहीं किसी न किसी महिला साधवी से भेंट हो भी जाती रही लेकिन वह बहुत संक्षिप्त सी ही रहती। प्रणाम और नमस्कार से ज़्यादा कभी कभी उनकी तप सथली का कुछ प्रसाद भी मिल जाता। उनके इस प्रसाद में कई बार ताज़े फल भी शामिल होता कई बार सूखे फल भी। कई बार जीवन के कुछ गुर भी लेकिन मीडिया मकसद से तन्त्र पर वार्ता या तो शुरू ही न हो पाती या फिर अधूरी छूट जाती। 

इस तरह की भेंट के दौरान साधना की गुप्त बातों की गहन चर्चा तो किसी भी तरह से शायद सम्भव भी नहीं थी। बिना कोई ख़ास चर्चा वाली ऐसी भेंट हरिद्वार के जंगलों में भी हुई, दिल्ली में भी और पंजाब में कुछ स्थानों पर भी। इनका रोमांच और रहस्य बहुत यादगारी भी रहा। 

इन मुलाकातों के दौरान विश्व हिन्दु परिषद के उस समय के सक्रिय नेता मोहन उपाध्याय जी भी साथ रहते रहे। उनकी पहल और मार्गदर्शन से ही यह सम्भव होता रहा। मोहन जी की असमय मृत्यु से यह सारा मिशन और प्रोजेक्ट भी अधर में ही छूट गया। बस इतना ही याद रहा कि दिव्यता की मूर्ती लगने वाली इन महिलाओं का रहन सहन पूरी गहनता से अंतर्मन तक प्रभावित करता रहा। उनकी बातें बहुत देर तक मानसिक जगत में गूंजती भी रहती।  उनके पास बेउठने एक ऊर्जा का अहसास करवाता रहा। 

भारत के हृदय में, जहाँ प्राचीन परंपराएँ और मान्यताएँ बहुत ही गहरी हैं, वहाँ महिलाओं का यह एक छोटा, गुप्त समुदाय लम्बे समय से मौजूद है। हालांकि वे आपकी औसत गृहिणियां या माताएं तो नहीं होती हैं, लेकिन उनके पास एक ऐसी शक्ति ज़रूर है जिसके बारे में अधिकांश कई बार पुरुष साधक भी केवल सपना ही देख सकते हैं। उनके सामीप्य से मुँह से जय माता दी निकलता या फिर कोई और आध्यात्मिक सम्बोधन तो वह हमारे अतीत और रूटीन से बहुत ही अलग होता। तंत्र की उन महिला साधिकाओं से बात करते हुए उनमें से मातृ शक्ति का स्वरूप कई बार पूरी तरह से उभर कर सामने भी आता है। जहां वात्सल्य का अहसास भी होता। यह सब एक आशीर्वाद जैसा अहसास भी होता है। ऐसा बहुत कुछ अनुभव होने लगता जो अलौकिक जैसा होता। तंत्र में महिला तांत्रिकों के योगदान पर तंत्र स्क्रीन की यह विशेष प्रस्तुति उन्हीं अनुभूतियों को अभिव्यक्त करने का प्रयास है। 

तंत्र के कठिन रास्तों पर निकलीं इन महिलाओं को अक्सर महिला तांत्रिक और महिला अघोरी के नाम से भी जाना जाता है। उनका पूरा जीवन और उनका पूरा लाइफ स्टाईल तंत्र और अघोर की साधना के लिए समर्पित हुआ महसूस होता है।

तंत्र और अघोर पथ ये दो ऐसे अलग अलग और गूढ़ आध्यात्मिक मार्ग हैं जो समाज के मानदंडों और पूर्व कल्पित धारणाओं को ज़ोरदार चुनौती भी देते हैं। ईश्वरीय सत्ता के साथ सीधा राब्ता उनका लक्ष्य रहता है।  इसी सर्वोच्च सत्ता के साथ उनका तारतम्य जुड़ा रहता है। वे अकेले में जब बात करती हैं तो लगता है सामने कोई नहीं है लेकिन उनको इसका पूरा सतर्क अहसास रहता है कि वे कहाँ हैं और किस्से बात कर रही हैं। हमारे पास पहुंचने का भी उन्होंने नोटिस लिया और साथ ही हमारे मन की एक दो बातें भी उन्होंने उसी सर्वोच्च सत्ता के सामने उजागर कर दी और कहा लो अब यह भी यहाँ पहुँच गया आपके दरबार में इसका संकट दूर कर दो। इसके साथ ही हमें यह भी बताया कि जीवन की यह समस्या अब इस दिन या तारीख से समाप्त समझो। ऐसी बहुत सी बातें होती रहीं जिनका पता केवल हमें था और जिनकी गहन चिंता भी केवल हमें थी।   

दिलचस्प बात है कि अपने पुरुष समकक्षों के विपरीत, जो अक्सर अधिक ध्यान भी आकर्षित करते हैं, ये महिलाएं अपनी प्रथाओं और ज्ञान को दुनिया की नज़रों से छिपाकर रखने में अधिक कामयाब रही हैं। वे आधुनिक जीवन की हलचल से दूर सुदूर गांवों और आश्रमों में रहती हैं। उनकी साधना पद्धति भी अक्सर पूरी तरह से गुप्त होती है। उनके दिन गहन आध्यात्मिक अभ्यास, ध्यान और अध्ययन में व्यतीत होते हैं। उन्हें कम उम्र में ही तंत्र और अघोर के रहस्यों की शिक्षा दी जाती है, अक्सर उनकी मां या दादी द्वारा, जिन्हें पीढ़ियों से यह ज्ञान विरासत में मिला है। इस साधना की चमक उनकी आँखों में देखी जा सकती है और उनके चेहरों पर भी। उनकी बॉडी  लैंग्वेज साथ साथ इस बात का अहसास करवाती रहती है कि उनके शब्दों, बोलों, उनकी उंगलियों और आशीर्वाद की मुद्रा में उठे हाथों से कोई न कोई शक्ति तो प्रवाहित हो ही रही है। उनकी रहस्य्मय मुस्कान और गुस्सा आने पर आँखों में अपनेपन वाली वो थोड़ी सी घूरने वाली अनुभूति भी बिना बोले बहुत कुछ बताती कि किस किस बात से दूर रहना है। 

आम लोग उन्हें भयानक स्वरूप वाली या ऐसा कुछ भी समझें या कहें लेकिन महिला तांत्रिकों और महिला अघोरियों का स्थानीय आबादी के लोग पूरी तरह से सम्मान भी करते हैं। इस प्रेम और सम्मान के साथ साथ ये लोग उनसे एक तरह से डरते भी हैं। यह ख़ामोशी भरा मूक भय होता है। बिना किसी आवाज़ के अपना असर दिखाता  है। आसपास रहने वाले लोग उन्हें अपना रक्षक ही समझते हैं। ज़िन्दगी की मुश्किलों और संकटों से घबराए हुए बहुत से लोग दूर दराज से भी उनके पास आ कर सिर झुकाते हैं। तंत्र और अध्यात्म में बहुत से लोग बेहद पढ़े लिखे भी हैं। दुनिया की पढाई समाप्त करने के बाद उन्हें लगा इस पढ़ाई में कुछ नहीं रखा अब इस क्षेत्र में कुछ अभ्यास ज़रूरी हैं। 

तंत्र की दुनिया के ज्ञाता इस संबंध में जो बताते हैं वह कई बार हैरान कर देता है। ऐसा कहा जाता है कि तंत्र के इन साधकों के पास तत्वों, आत्माओं और यहाँ तक कि मृत्यु पर विजय जैसी बहुत ही कठिन और अत्यधिक सिद्धि और शक्ति भी होती है। वे अपनी क्षमताओं का उपयोग बीमारों को ठीक करने, जादू-टोना करने और खोई हुई आत्माओं का मार्गदर्शन करने के लिए करते हैं। हालाँकि, उनकी शक्ति की भारी कीमत भी चुकानी पड़ती है।  उनकी साधना और भी कठिन हो जाती है। इस शक्ति का अर्जित करना भी आसान कहां होता है। 

उन्हें एक सख्त आचार संहिता बनाए रखनी होती है। इस अनुशासन का वे सभी लोग पालन भी करते हैं। साधना  के कई पड़ावों में यौन सुख और यहां तक कि दूसरों को छूने से भी बचना होता है। वे कठोर जीवन जीते हैं, अक्सर साधना मार्ग के प्रति अपनी भक्ति के प्रतीक के रूप में केवल मृतकों की राख पहनते हैं। हर सुख सुविधा को पलक झपकते ही अपने पास उपलब्ध करवा लेने की इस क्षमता के बावजूद यह तांत्रिक अघोरी महिलाएं बेहद कठिन जीवन जीती हैं वो भी बिना किसी शिकायत के। महिला तांत्रिक बहुत ज़िम्मेदारी से सहेज कर रख रही हैं तंत्र की गुप्त विद्या को। बेहद कठिन और लम्बे उपवास इनकी शरीरक और मानसिक क्षमता को मज़बूत बना देते हैं। महिला तांत्रिक बहुत ज़िम्मेदारी से सहेज कर रख रही हैं तंत्र की गुप्त विद्या को

अपने एकांतवास के बावजूद, ये महिलाएं दुनिया से अलग-थलग नहीं रहती हैं। वे अक्सर जरूरतमंद लोगों को अपनी सेवाएं देने के लिए दूसरे गांवों और शहरों की यात्रा भी करती हैं। वे आध्यात्मिक और सांसारिक लोगों के बीच मध्यस्थ के रूप में भी कार्य करते हैं। आधुनिक जीवन की हलचल से दूर कहीं बस्ती है इन  महिला तांत्रिकों की दुनिया जहां एक अनाम सा आकर्षण भी पैदा हो जाता है। वहां की हवा में कोई अलौकिक सी सुगंध भी महसूस होने लगती है। 

इसके साथ ही यह तांत्रिक लोग उन लोगों के लिए मार्गदर्शक और संरक्षक के रूप में कार्य करते हैं जो उनकी सलाह चाहते हैं। वे सभाओं और समारोहों की मेजबानी करने के लिए भी जाने जाते हैं जहां वे एक-दूसरे के साथ अपना ज्ञान और बुद्धिमत्ता साझा करते हैं। इस सबके बावजूद उनकी साधना और जीवन शैली तकरीबन गुप्त ही रहती है। ऐसी बहुत सी बातें हम अन्य लेखों में आपके सामने लाने का प्रयास करते रहेंगे। 

Tuesday, June 13, 2023

तंत्र की गहन शिक्षा और साधना ही दे सकती है सिद्धियों की कृपा

Tuesday 13th June 2023 at 05:45 PM

 उचित मार्गदर्शन के बिना न रखें इन रास्तों पर एक भी कदम 

लुधियाना: 13 जून 2023: (तंत्र स्क्रीन डेस्क):: 

*सुयोग्य गुरु का मार्गदर्शन ही दे सकता है पूरा लाभ 

*क्या तंत्र साधना से आयु और स्वास्थ्य के लिए हो सकता है लाभ?

*क्या इस रह पर चल कर मिल सकती है दौलत और शोहरत?

*अगर मन में सच्ची प्यास है तो सच्चा गुरु स्वयं आपको खोज लेगा!

योग, तंत्र और सिद्धि हमारे समय से भी पहले से उपयोग में हैं। यह विज्ञान की एक अलौकिक सी शाखा है जो अधिकतर लोग नहीं जानते हैं और जिसके बारे में शायद बहुत से लोगों की भ्रमित धारणाएं होती हैं। तंत्र और सिद्धि के इस्तेमाल से लोग अपनी आयु और स्वास्थ्य को स्थिर और स्वस्थ रखते हैं। इस ब्लॉग पोस्ट में हम सही तरीके से तंत्र और सिद्धियों का इस्तेमाल करना सीखेंगे जो आपके जीवन के लिए बहुत महत्वपूर्ण हो सकता है। इस ब्लॉग पोस्ट के जरिए हम आपको तंत्र और सिद्धियों के बारे में संपूर्ण जानकारी देंगे जो आपकी आयु और स्वास्थ्य की देखभाल करने में मदद करेगी।

तंत्र और सिद्धि क्या होते हैं? तंत्र साधना से शक्ति भी मिलती है और सिद्धि भी लेकिन रास्ता कम कठिन नहीं होता। तंत्र की साधना के लिए पहले स्वयं में शरीरक बल की भी आवश्कता पड़ती है, बुद्धि बल की भी और मनोबल की भी। तब कहीं जा कर आत्मिक बल सक्रिय होता है और साधना में सफलता मिलने के आसार बनने लगते हैं।  आम और कमज़ोर इन्सान तो आरम्भिक दौर में ही डर कर इस मार्ग पर बढना छोड़ देता है। इस मार्ग पर निरंतर चलने के लिए शक्तियों के भंडार अर्जित करने पड़ते हैं। तंत्र साधना अपने घर में हो, किसी सुनसान जगह पर बने किसी मन्दिर में या फिर श्मशान में-हर जगह पर कदम कदम पर परीक्षा जैसी स्थितियां बनती हैं। तंत्र साधनामें अगर साधक बुरी तरह डर जाए तो हार्ट अटैक जैसी बहुत सी समस्याएं पैदा होने के खतरा बना रहता है इस लिए अपने शरीर की रक्षा के उपाय सबसे पहले कर लिए जाने चाहियें।  

गौरतलब है कि तंत्र और सिद्धि एक वैज्ञानिक प्रक्रिया ही है जो अधिकतर भारतीय धर्म और तंत्र के अनुयायियों द्वारा उपयोग की जाती है। अब यह बात अलग है कि इसका अधिकतर विज्ञान धीरे धीरे लुप्त होता चला गया। तंत्र की ये सभी प्रक्रियाएं धार्मिक उद्देश्यों के लिए उपयोग की जाती रहीं हैं और विभिन्न साधनों व साधकों द्वारा की जाती हैं जो स्वयं में अद्भुत शक्तियों को लाया करते थे। 

तंत्र और सिद्धि का उपयोग व्यक्तिगत उन्नति और शारीरिक आरोग्य के लिए किया जाता है। तन,  आत्मा  शक्तियां बढ़ाना बहुत पहले बहुत ज़रूरी समझा जाता था। इसके अलावा, इन प्रक्रियाओं का उपयोग तनाव से मुक्ति, शांति और अधिक समझदार जीवन जीने में मदद मिलती है। इन प्रक्रियाओं का उपयोग प्राकृतिक तरीकों से अस्थिर मनोवैज्ञानिक समस्याओं से निपटने में भी किया जाता है। 

अब उल्लू के शरीर का कौन सा भाग कब और कहां काम आता है इसका पता तो बाद में किया जा सकता है लेकिन उल्लूक सिद्धि से भी पहले और अन्य सबसे पहले अपने स्वयं के शरीर का हर रहस्य पता लगाना ज़रुरी होता है। मानव शरीर की सरंचना इतनी दुर्लभ है कि विकसित विज्ञान आज भी इसके सामने चकरा जाता है। शरीर के बहुत से रहस्य ऐसे हैं जिनकी सही जानकारी अगर पता चल जाए तो इसे साधना सहज हो जाता है। शरीर और मन को साधने की प्रक्रिया के दौरान ही सिद्धियों जैसा आभास होने लगता है। सर्दी, गर्मी और मौसम की मार बेअसर होने लगती है। बातों में मधुरता के साथ साथ एक दैवी पभाव भी आ जाता है जिससे सद्ध्क की हर बात हर जगह मानी जाने लगती है।

इस शुरूआती साधना के कुछ पड़ाव पूरे करने के बाद ही साधना की कठिनाई और स्तर भी बढ़ने लगते हैं। तन्त्र और सिद्धियों के विभिन्न उपयोग विभिन्न तरह के अनुभव देने लगते हैं। बौद्ध तंत्र और जैन तंत्र साथ मुस्लिम तंत्र भी लोकप्रिय रहा है। 

तंत्र और सिद्धियों का सही उपयोग चिरआयु रहने और पूरी तरह से स्वस्थ रहने के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। इन तंत्रों और सिद्धियों के विभिन्न उपयोग हैं जो आप अपने जीवन में शामिल कर सकते हैं। एक बहुत सामान्य उपयोग है तंत्रों और सिद्धियों का उपयोग मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के लिए। आप अपनी चिंताओं को कम करने के लिए तंत्रों और सिद्धियों का उपयोग कर सकते हैं। इन तंत्रों और सिद्धियों का उपयोग आपको एक अधिक सकारात्मक जीवन जीने में मदद कर सकता है। आप तंत्रों और सिद्धियों का उपयोग अपने परिवार और दोस्तों के साथ संयोजित कर सकते हैं। इन तंत्रों को उपयोग करने की एक और विशेषता है कि आप इन्हें अपने घर में भी उपयोग कर सकते हैं। आप इन तंत्रों का उपयोग घर की सफाई, कुछ विशेष उद्योगों में सफलता, स्वास्थ्य और लंबी आयु के लिए कर सकते हैं। इन तंत्रों का उपयोग आपके जीवन को आसान बना सकता है। आप इन तंत्रों का उपयोग अपनी जरूरत के अनुसार कर सकते हैं। आप अपने दुखों को कम करने के लिए सिद्धियों का उपयोग कर सकते हैं। सिद्धियों का उपयोग आपको बड़े सपने देखने में मदद कर सकता है। तंत्रों और सिद्धियों का उपयोग करने से आप खुशहाल और स्वस्थ जीवन जी सकते हैं। इसका अनुभव थोड़ी सी साधना के बाद ही होने लगता है। निरंतर प्रयास की अपने आप में ही काफी महत्ता होती है। 

इस तरह तंत्र और सिद्धियों के लाभ आयु और स्वास्थ्य के लिए लोकप्रिय भी रहे हैं। ज्योतिष, वास्तु, और तंत्र-मंत्र सिद्धि आदि को दुनिया भर में लोग बहुत शक्तिशाली मानते हैं। वे अपने जीवन की समस्याओं को हल करने के लिए इनका सही इस्तेमाल करते हैं। तंत्र और सिद्धियों के इस्तेमाल से आप अपने जीवन में बदलाव ला सकते हैं और अपनी आयु और स्वास्थ्य को भी सुधार सकते हैं। तंत्र और सिद्धियों का सही इस्तेमाल करने से आप अपने जीवन को और बेहतर बना सकते हैं। बहुत से लोग तंत्र और सिद्धियों का इस्तेमाल सिर्फ अपनी समस्याओं को हल करने के लिए करते हैं। लेकिन इनके इस्तेमाल से आप अपनी आयु और स्वास्थ्य को भी सुधार सकते हैं। तंत्र और सिद्धियों की मदद से आप अपने जीवन में एक नए उलझन से निपट सकते हैं और अपनी स्वास्थ्य को सुधार सकते हैं। तंत्र और सिद्धियों के इस्तेमाल करने से आप अपनी आयु को भी बढ़ा सकते हैं और अपने जीवन की दिशा को निर्देशित कर सकते हैं। इसलिए, तंत्र और सिद्धियों का सही इस्तेमाल करने से आप अपनी आयु, स्वास्थ्य, और जीवन को बेहतर बना सकते हैं। अपनी मुसीबतों को काम कर सकते हैं और अपनी क्षमताओं को बढ़ा  सकते हैं छोटी मोती सीढ़ी सरल साधनाओं से भी बहुत सी सिद्धियां मिलने लगती हैं। 

इस ब्लॉग पोस्ट में, हमने तंत्र और सिद्धियों के सही इस्तेमाल के बारे में जाना। हम जानते हैं कि तंत्र और सिद्धियों का सही इस्तेमाल हमारे आयु और स्वास्थ्य के लिए कितना महत्वपूर्ण है। इनका सही इस्तेमाल हमें आर्थिक समृद्धि, शांति, सम्पूर्णता और स्वस्थ जीवन जीने में मदद करता है। अतः, हमें तंत्र और सिद्धियों का सही इस्तेमाल करना चाहिए। अगर हम तंत्र और सिद्धियों को सही तरीके से इस्तेमाल करते हैं तो हम अपने जीवन को सफल बना सकते हैं। इनका सही इस्तेमाल हमें आध्यात्मिक और शारीरिक रूप से स्वस्थ बनाता है। यह हमें आत्मविश्वास देता है कि हम अपने जीवन में कुछ भी हासिल कर सकते हैं। इसलिए, यदि हम तंत्र और सिद्धियों का सही इस्तेमाल करना सीखते हैं तो हम अपने जीवन को सफल बना सकते हैं। सभी मज़हबों में दैनिक पूजापाठ से जुड़ीं बातें तंत्र का ही बस उतना सा मामूली हिस्सा हैं जो आम जनमानस के लिए ज़रूरी समझा गया। बाकी ज्ञान को छुपा लिया गया था। तंत्र की शक्ति और सिद्धियां सुयोग्य पात्र को ही मिल सकें इसका पूरा ध्यान रखा जाता था। कुछ धार्मिक संगत आज के युग में इस तरह की साधना करवाते हैं लेकिन उनके अपने विशेष नियम भी हैं। उन नियमों का पालन आवश्यक है। 

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