Sunday, January 25, 2026

केतु कमाल भी करता है लेकिन

Media Link on Sunday 25th January 2026 at 2:30 AM  Regarding Ketu in Tantra Screen 

लेकिन केतु के हिसाब किताब भी बहुत बारीकी वाले होते हैं

लुधियाना: 25 जनवरी 2026: (मीडिया लिंक 32//तंत्र स्क्रीन डेस्क)::

साभार तस्वीर 
राहू को शायद आम तौर पर अधिक लोग जानते हैं। हालांकि केतु की शक्तियां भी कम नहीं होती लेकिन राहू की प्रकृति ही ऐसी है कि वह लोगों के दिलों पर राज करने वाली स्थिति में जल्दी पहुँच जाता है। हालांकि केतु महाराज भी कम नहीं हैं। कई बार केतु ही कमाल करता  है। केतु की अपनी क्षमता है जिसकी विशेषता बिलकुल ही अलग है। जो लोग भोग विलास को छोड़ने की कल्पना भी नहीं कर सकते उन्हें केतु ही सदमार्ग दिखाता है। उस समय केतु की बात मान कर ही ज़िंदगी के सही राह नज़र आते हैं। कई बार जीवन तक का संकट केतु की कृपा से ही दूर होता है। ऐसे में चिंतन मनन बहुत बढ़ जाता है। वह भी इतना ज़्यादा  कि कई बार जातक सन्यास लेना ही सही समझता है।  वत्व होता यह सब उन कर्मों का ही फल है जो जातक का मन इस शरीर के ज़रिए करता है। आम तौर पर तब जब केतु शरीर को बहुत से कष्ट देने लगता है।  

केतु के हिसाब किताब भी बहुत बारीकी वाले होते हैं। मीन राशि (Pisces) में पंचम भाव (5th House) में केतु (Ketu) की स्थिति व्यक्ति को आध्यात्मिक, रचनात्मक और अंतर्ज्ञानी बनाती है, लेकिन यह प्रेम, संतान और शिक्षा के मामलों में चुनौतियां दे सकती है। व्यक्ति को मानसिक तनाव, संतान संबंधी देरी या समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है, हालाँकि, यह स्थिति व्यक्ति को गूढ़ विद्याओं और रिसर्च में गहरी रुचि भी दे सकती है जो सभी के नसीब में नहीं होती। इस रूचि के चलते ही करियर में अचानक सफलता मिल सकती है पर साथ ही यह ज़रूरी है कि अहंकार त्याग कर काम किया जाए। इस त्याग के बाद ही होते हैं कमाल। केतु जब कमाल करता है तो वह समय भी हैरानकुन होता है। सचमुच कमाल से भी बड़ा कमाल कर देता है। 

केतु की प्रकृति की चर्चा करें तो इसके बहुत से सकारात्मक पहलू भी हैं जिन्हें अंग्रेज़ी में हम लोग अक्सर Positive Aspects कहते हैं। केतु के प्रभाव में आए व्यक्ति का आध्यात्मिक विकास भी होने;लगता है। कई बार तो आध्यात्मिक विकास बहुत तेज़ी से होने लगता है। यह स्थिति इतनी तेज़ी से बदलती है की व्यक्ति को आध्यात्मिक  बनाती है और किसी दिव्य रंग में रंगती महसूस होने लगती है। इसके साथ ही रहस्यवाद और गूढ़ विद्याओं में भी रुचि बढ़ाती है।जिससे इंसान कुछ का कुछ बन जाता है। उसे दैवी कृपा बरसती महसूस होने लगती है। 

केतु जब अपने ढंग तरीके से अपना प्रभाव डालता है तो रचनात्मकता और बुद्धिमत्ता भी तेज़ी से बढ़ने लगती है।  इसका परिणाम यह होने लगता है कि व्यक्ति बहुत क्रिएटिव होना शुरू हो जाता है। उसमे रिसर्च और विश्लेषण करने की क्षमता का गन भी आने लगता है। सिर्फ आता ही नहीं तेज़ी से विकसित भी होने लगता है। उसकी शख्सियत आकर्षक भी बनने लगती है और वह दूसरों को प्रभावित भी करने लगता है। लोग उसकी बात मानने भी लगते हैं। उसकी लोकप्रियता भी बढ़ने लगती है। इन सब के परिणामस्वरूप उनकी आमदनी में भी वृद्धि होने लगती है। पैसा आने से उसे मिली सफलता की चमक भी पूरी दुनिया की नज़र में भी आने लगती है। देहते ही देखते वह छाने भी लगता है। 

करियर के मामले भी केतु के प्रभाव में आए सबंधित व्यक्ति की तरक्की होने लगती है। सफलता बहुत तेज़ी से उसके कदम चूमने लगती है। अंतर्दृष्टि और सहायता की आवश्यकता वाले करियर जैसे कि ज्योतिष, रिसर्च, हीलिंग इत्यादि में सफलता बहुत तेज़ी से मिल सकती है।  लेकिन यहां यह भी ज़रूरी है कि ऐसी स्थिति में अहंकार का त्याग आवश्यक है। अहंकार त्यागने पर ही करियर में चमक आती है।अहंकार को केतु बाबा भी अच्छा नहीं समझता। 

इसके साथ ही रिश्तों में गहराई भी आने लगती है। रिश्ते में अंतरंगता और गहराई की इच्छा भी बढ़ती है। गहराई बढ़ने से रिश्ते बहुत अच्छे होने लगते हैं। रिश्ते अच्छे होते हैं तो काम भी बनने लगते हैं और जीवन में सफलताएं मिलने लगती हैं। 

सकारत्मक पक्ष की तरह केतु महाराज के भी नकारात्मक पहलू होते हैं। इनकी गंभीरता भी कम नहीं होती। ज़िन्दगी भर इनका भी असर पड़ता है। इनमें संतान संबंधी चिंताएँ प्रमुखता से छै रहती हैं। ऐसे में संतान प्राप्ति में देरी या समस्याएं भी हो सकती हैं या फिर संतान से जुड़ी चिंताएँ भी रह सकती हैं।  अगर संतान की चिंता लग जाए तो पूरी ज़िंदगी पर इसका प्रभाव पड़ता है। ऐसे बहुत से मामले देखे हैं। केतु महाराज की पूजा अर्चना से उन्हें फायदा भी हुआ। 

केतु जी नाराज़गी के सुर में हों तो मानसिक तनाव भी बढ़ने लगता है। लोगों से दूर हो कर एकांतप्रियता का विचार छाने लगता है। धैर्य की कमी होने लगती हैजिसके परिणाम स्वरूप काम बिगड़ने लगते हैं। यह सब देर तक रहे तो मानसिक तनाव या अवसाद का सामना भी करना पड़ सकता है। 

दोस्ती के साथ साथ प्यार और रिश्ते भी केतु से प्रभावित होते हैं। कई बार तो बहुत बुरी तरह से भी प्रभावित होते हैं। केतु जी नाराज़ हैं तो प्रेम संबंधों में उतार-चढ़ाव या कर्मिक बाधाएँ आ सकती हैं। इंसान सोचता ही रह जाता है कि सुबह तक तो सब ठीक ठाक था अब अचानक यह सब क्या हुआ कि सब कुछ उल्टपुल्टा हो गया।  

मोहतरमा अंजुम रहबर साहिबा की पंक्तियाँ याद आ रही हैं : 

मिलना था इत्तिफ़ाक़ बिछड़ना नसीब था

वो उतनी दूर हो गया जितना क़रीब था।  ऐसी बहुत सी बातें सिर्फ शायरी में ही नहीं बल्कि हकीकत में भी सच होती हैं। ऐसा बहुत बार सच होते हुए अपनी आँखों से भी देखा। 

केतु अगर प्रकोप दिखाने लगे तो स्वास्थ्य से सबंधित बहुत सी समस्याएं भी खड़ी होने लगती हैं। कई बार स्वास्थ्य की स्थिति चिंताजनक हद तक बिगड़ने लगती है। स्वास्थ्य में बिगाड़ अत है तो पेट और पाचन संबंधी समस्याएं गंभीर हो कर खड़ी होने लगती हैं। स्वास्थ्य की चिंता को लेकर कई और खतरे भी बढ़ने लगते हैं। इन खतरों में से एक खतरा है ऊँचाई से गिरने का खतरा। इस तरह गिरने से गंभीर चोट भी लग सकती है।  इसलिए केतु जी से बना कर रखो। बना कर रखो का मतलब उनके कहे में रहो। नहीं रहोगे तो वह अपने ढंग से मनवा लेंगें। 

यहां यह भी याद रखने वाली बात है कि मीन राशि में पंचम भाव का केतु एक जटिल स्थिति है, जो आध्यात्मिक और बौद्धिक गहराई के साथ-साथ भावनात्मक और पारिवारिक चुनौतियों को भी जन्म देता है, जिसके लिए ध्यान, धैर्य और अहंकार त्यागने की आवश्यकता होती है ताकि इसके शुभ प्रभावों को बढ़ाया जा सके। केतु का प्रभाव बहुत ही संवेदनशील क्यूँ और कैसे होता है इसकी चर्चा भी की जाएगी लेकिन जल्द ही किसी अलग पोस्ट में।  

Sunday, January 11, 2026

शनि हालात भी बदल देता है और दॄष्टि भी

Media Link on 10th January 2026 Regarding Seven and a half years of Saturn//Tantra Screen

ढैया और साढ़ेसाती रहस्य्मय भी होते हैं और बहुत ही अर्थपूर्ण भी 

लुधियाना: 11 जनवरी 2026: (मीडिया लिंक 32//तंत्र स्क्रीन डेस्क )::

ज़िंदगी के हालात भी और दुनिया के हालात भी
Pinterest से साभार 
काफी लंबे समय से अस्थिरता वाले चल रहे हैं। अगर सोच विचार और चिंतन मनन कर के कुछ किया जाए तो भी बात नहीं बनती क्यूंकि सोचा कुछ और ही जाता है और सामने कुछ और ही आता है। कई दिनों से मन में भी बेचैनी चल रही है। कभी कम हो जाती है और कभी ज़्यादा। कोशिश कर रहा था कि इस बेचैनी के स्रोत  तक पहुंचा जाए। कौन करता है मन में बदलाव? कई पहलू सामने भी आए लेकिन मामला किसी स्पष्ट तस्वीर की तरह सामने नहीं आया। 

शनि का मीन राशि में गोचर (Transit) मीन राशि वालों के लिए साढ़ेसाती का दूसरा चरण शुरू करता है, जो वास्तव में आत्म-मंथन, चुनौतियों और कड़ी मेहनत में एकरस होने का समय होता है, जहां धैर्य और ईमानदारी से काम लेने पर ही सफलता मिलेगी, खासकर करियर और रिश्तों के मामलों में, क्योंकि शनि आपकी राशि में रहकर आपके लग्न, पराक्रम, सप्तम और दशम भाव पर दृष्टि डालेंगे, जिससे भावनात्मक मजबूती और जिम्मेदार निर्णय लेने की सीख भी मिलेगी और क्षमता भी।  

मीन राशि पर शनि गोचर का प्रभाव बहुत गहरा भी है और ज़ोरदार भी। इसकी मुख्य बातें बहुत बारीकी से जीवन को प्रभावित करती हैं। जीवन इनसे प्रभावित होता भी है। इसका यह प्रभाव जातक को तो महसूस होगा ही दुनिया को भी इस बदलाव की चमक महसूस होगी। 

चूंकि यह साढ़ेसाती का दूसरा चरण है इसलिए इसका प्रभाव भी अधिक है। यह चरण आत्म-विश्लेषण का समय है और साथ ही गलतियों से सीखने और जीवन में सुधार का भी समय है।  जीवन में आवश्यक सुधार इतनी तेज़ी से आएगा की दुनिया भी इस प्रभाव को नोय करेगी । इस सब के चलते अधिक मेहनत और धैर्य की आवश्यकता होगी। ऐसी मेहनत ला फायदा भी ज़रूर होगा इसके परिणाम भी सामने आएंगे। ज़िंदगी पहले से बेहतर बनेगी लेकिन कभी कभी मूषकजीलें बढ़ने का अहसास भी होगा।  

इस दौरान सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि आत्म-मंथन का समय एक सुअवसर की तरह मिलेगा। शनि आपके लग्न में होने से यह आत्म-मंथन और आत्म-विश्लेषण का समय है, जहां भावनात्मक रूप से मजबूत होकर जिम्मेदारी से फैसले लेने होंगे। किस किस ने क्यूं आपके साथ धोखा किया इसका स्पष्ट विवरण आप अपने दिल दिमाग में किसी फिल्म की तरह देख सकेंगे। जो लोग आपके अपने बन कर किसी अज्ञात रहस्य की तरह बने हुए थे उनके चेहरे और सोच आपके सामने स्पष्ट रूप से सामने आएगी। 

इसी दौरान कड़ी मेहनत और धैर्य का साथ बनाए रखना। नौकरी और व्यापार में भी चुनौतियां आएंगी। सफलता के लिए आनंद लेकर मेहनत करना और धैर्य बनाए रखना जरूरी है। इसी से बदलेंगें बरसों पुराने हालात। एक नै और चमकदार दुनिया आपके सामने आएगी। यह इस बदलाव का ही हिस्सा होगा। 

रिश्ते और वैवाहिक जीवन में भी काफी तबदीली आएगी। बहुत सी उलझनों भी अहसास हो सकता है लेकिन जीवनसाथी के साथ हर हाल में अनबन से ज़रूर बचें। रिश्तों में प्यार बनाए रखने की कोशिश करें इसके अच्छे परिणाम सामने आएंगे। इस साढ़ेसाती के दौरान भाई-बहनों से संबंध सुधर सकते हैं जिसे आप बहुत अच्छा महसूस करेंगे। इन सुधरे संबंधों का प्रभाव आपके जीवन पर नज़र भी आएगा। 

इसी दौरान करियर और धन की स्थिति में भी बेहतरी आएगी। करियर में स्थिति अनुकूल रहेगी, धन को संतुलित रहते हुए बहुत सोच समझ कर ही खर्च करें। हालांकि भविष्य में अच्छे धन लाभ के योग हैं फिर भी खर्च सोच समझ कर ही किया जाना चाहिए। इस बेहतरी के चलते विदेश यात्रा के भी अवसर बन सकते हैं। 

इसी बेहतरी के चलते स्वास्थ्य की सावधानी भी ज़रूरी रहेगी। लाइफस्टाईल और खान पान के चलते वायु तत्व असंतुलित हो सकता है जिसकी मुश्किलें कई बार ज़्यादा बिगड़ जाती हैं। एसिडिटी की समस्या भी गंभीर हो सकती है। इसी बदलाव के चलते कुछ बातों का विशेष ध्यान रखें । छोटी बातों को बड़ा न बनाएं और जोखिम से बचें।  वैसे तो दान दक्षिणा का स्वभाव संवेदना को बढ़ता है कर कई अच्छेपरनाम देता है। शनि की साढ़ेसाती में भी दान के उपाय बताए जाते हैं।

चलते चलते आपको यह जानकारी भी दे दें कि इस साढ़ेसाती के चलते क्या करें उपाय। शनिवार को काले तिल और साबुत उड़द दाल का दान करें। ऐसे में स्वास्थ्य लाभ मिलेगा। इसके आलावा भी खानपान और लाइफस्टाइल में सात्विक खानपान बेहतरी देगा। 

सात्विक खानपान के साथ साथ पूजापाठ की तरफ ध्यान देना भी अच्छा रहेगा। मानसिक एकाग्रता और मानसिक शांति बढ़ जाती है। भगवान लक्ष्मीनारायण और हनुमान जी की पूजा करें, हनुमान चालीसा का पाठ करें। इससे तन मन को लाभ मिलेगा और  और मानसिक शांति बढ़ेगी।  

शनि की साढ़ेसाती के उपायों में पीपल के वृक्ष के नीचे तेल का दीपक जलाने को अच्छा कहा जाता है। इसमें काला तिल डालकर जलाना इसे और भी बेहतर बना देता है। कई लोग तो इसे नियमित तौर पर अपने रखते हैं। पीपल के पेड़ के नीचे दीपक जलाने से विशेष तरंगें उठती हैं। 

गरीबों को अन्न दान करें और गाय को हरा चारा खिलाएं। इससे से लाभ उठाने वाले के दिल दिमाग से जो तरंगें उठती हैं वे आपकी बेहतरी के सुअवसरों को चुंबक की तरह खींच लाती हैं। संवेदनशील जातकों को इन तरंगों की अनुभूति भी होने लगती है। इन न ुभूतियों से ही जातक अपनी अभिव्यक्ति भी बहुत मधुर होने लगती है।  

इसी सिलसिले में संक्षेप में कहा जा सकता है कि यह समय चुनौतियों से भी भरा है और सुअवसरों से भी भरा है।  चुनौतियाँ स्वीकार करके ही हालात को अपने पक्ष में बदला जा सकेगा। लेकिन मानसिक शांति और एकाग्रता सही दिशा में मेहनत के तरीके और मार्ग बताएगी। धार्मिक उपायों से शनिदेव की कृपा भी प्राप्त की जा सकती है।

यह  कृपा शरीरक और मानसिक दोनों तरफ से आएगी और आत्मा की चमक चेहरे पर भी सपष्ट दिखने लगेगी। इन्हीं तब्दीलियों के चलते जीवन में सकारात्मक बदलाव लाए जा सकते हैं।  इन तब्दीलियों को आप ही नहीं आपके आसपास के माहौल में रहने वाले भी महसूस कर पाएंगे। 

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Monday, November 17, 2025

स्वप्न विजय साधना सिद्ध हो जाए तो बहुत काम देती है...!

स्वप्न विजय साधना सिद्ध हो जाए तो बहुत काम देती है...!

यादों की दुनिया से कुछ अनुभूतियां 16 नवंबर 2025: (रेक्टर कथूरिया/ /तंत्र स्क्रीन डेस्क )::


बहुत पहले की बात है।
ज़िंदगी की गर्दिश ने परेशान कर रखा था।  कोई रास्ता नहीं सूझता था। आत्म हत्या तो हमेशां ही बुरी ही लगी बिलकुल उसी तरह जैसे जीवन की जंग को हार जाना। कमज़ोर से कमज़ोर और बुरे से बुरे व्यक्ति को भी कभी हार अच्छी नहीं लगती ।  ऐसे में बहुत बार ख्याल आता बस भगवान् ही सहारा है। लेकिन ख्याल तो ख्याल ही होता है। उसे एक्शन में साकार किए बिना बात नहीं बनती और इसे एक्शन में साकार करना आसान नहीं होता। फिर भी इसका स्पष्ट इशारा मिला मुझे हरिद्वार की अनौपचारिक यात्रा में।   मैं उस समय ऊँगली पकड़ कर तो नहीं चलता था लेकिन स्वतंत्र भागदौड़ की समझ भी नहीं आई थी। मेले में खोने का डर मुझे खुद भी बना रहता और साथ वालों को भी।  हरिद्वार में हर की पौड़ी,  बड़े बड़े पहाड़, मंदिर,  मूर्तियां और कल कल बेहटा गंगा जी का जल बहुत अच्छा लगता।  मेरे सबसे बड़े मामा के घर लखनऊ में उनकी बेटी या बेटे की की शादी थी। वहां से लौटते हम लोग हरिद्धार के दर्शनों के लिए चल पड़े।  मेरे बाकी के तीन मामा परिवार सहित साथ थे। हम लोग ट्रेन से हरिद्वार पहुंचे थे ,स्टेशन पर गाड़ी पहुँचने से पहले ही माहौल बहुत सुंदर और अध्यतमियक होता चला गया। मेरी उम्र दस बरस से भी बहुत कम थी लेकिन मैं रेलवे स्टेशनों के बोर्डों पर लिखे नाम पढ़ने के प्रयास करने लगा था। 

स्टेशन से बाहर निकले तो मेरे मामा हमें उस आश्रम/कम धर्मशाला की तरफ लेजाने लगे जिसे उन्होंने अपने हाथों अपनी देखरेख में बनवाया था। उस समय वह ठेके दारी का काम करते थे। इस प्रोजेक्ट को पूरा करवाए शायद उन्हें कुछ देर हो गई थी या फिर आसपास बहुत से बदलाव आ गए थे कि उन्हें बार बार रस्ते भू ;  रहे थे। कभी एक सड़क पर  बढ़ते और हूँ फिर का फिर वहीँ चौराहे पर आ जाते। यह जगह हर की पौड़ी के नज़दीक ही थी। अगर हर की पौड़ी की तरफ मुँहकरो तो पीठ के पीछे बाजार था। उसी बाजार में चल कर आगे से आश्रम की तरफ रास्ता निकलता था। 

मैं उस समय हरिद्वार में पहली बार गया था पर न जाने मुझे क्या हुआ। मुझे ऐसा लगने लगा कि मैं यहाँ पहले भी आ चुका हूँ। मैंने मां जी से पूछा आप मुझे उस आश्रम का नाम बताएं। वे मेरी बात पर हँसे भी लेकिन उन्हीने नाम बताया और उस रस्ते पर बढ़ने तो राह में आने वाले कुछ पॉइंट भी बताए ,सब सुन कर मेरे मुँह से निकला अब समझ गया ,मैं उन्हें रास्ता बताता गया हम सब आगे बढ़ते गए और कुछ मिनटों बाद ही मां कहने लगे आ गए हम सही राह पर। मैंने उन्हें मोड़ मुद कर आने वाली दुकानों और अन्य इमारतों के नाम और निशानियां भी बताईं। 

आश्रम पहुँचने पर हमने भोजन भी किया और आराम भी। सभी ने मुझे बहुत पूछा तुम तो कहते थे तुम यहाँ पहली बार आए हो। फिर यह सारा रास्ता कैसे जानते हो ?  मैंने उन्हें लाख समझाया कि यह सब मैंने अपने स्वप्नों में कई बाद देखा हुआ है। मैं खुद हैरान था कि स्वप्न में देखे स्थल और नाम इतने साकार हो कर सामने कैसे आ रहे हैं? किसी ने मेरी बात पर यकीन नहीं किया। मुझे खुद भी अपने बारे में भरम जैसी स्थिति लगने लगी थी लेकिन यह सब सच था। यह सपनों का वह सच सामने आया था जी हकीकत से भी बड़ा सत्य बन कर दिखाई दे रहा था। मेरे लिए यह सचमुच बहुत बड़ी अनुभूति थी। इस सच की चमक मेरी तन मन की आंखों को चुंधिया रही थी। मन में की सवाल खड़े हो रहे थे जिनका जवाब मुझे नहीं मिल रहा था। शायद अध्यात्म और तंत्र साधना की तरफ मेरी उत्सुकता जन्म ले चुकी थी। 

वहां आश्रम में मौजूद कुछ साधू बाबाओं से भी इस पर पूछा। बहुतों ने तो मेरी बात हंसी में उड़ा दी लेकिन कुछ गंभीर लोग भी मिले। कहने लगे इस ज्योति को जलाए रखना। जिस दिन यह बड़ी जवका बनेगी उस दिन सही यात्रा पर निकल जाओगे। यही ज्योति रस्ते भी बटेगी और संसाधन भी सहायता भी यही करेगी पर इस ध्यान केंद्रित रखना। फिर एक बाबा ने स्वप्नों के विज्ञानं की चर्चा भी की। साथ ही सावधान भी किया की इस रस्ते पर बढ़े तो दुनियादारी की पढ़ाईलिखि बहुत पीछे छूट जाएगी। 

क्या होती है स्वपन विजय साधना यह सवाल मेरे सामने गंभीर होता जा रहा था। हरिद्वार में बहुत कुछ दर्शनीय और बेहद सुंदर है लेकिन मेरे सामने बस यही सवाल मुंह बाएं खड़ा  था। उम्र भी छोटी थी और समझ भी बहुत छोटी। उस अल्पबुद्धि में इस सवाल को समझ पाने की क्षमता भी शायद नहीं थी। इसी बीच परिवार के लोगों के सवाल और बातें मुझे सब डिस्टर्ब कर रहे थे। शांत बैठ कर सोच भी नहीं पा रहा था। पता नहीं कब मैं लेते लेते उठा और फिर सीधा बैठ गया। दीवार के साथबड़ा सा सिरहाना भी मिला। लेकिन सिरहाने के बावजूद रीढ़ सीढ़ी हो गई पदम् आसन भी लग गया। आँखें भी बंद हो गई। कुछ ही मिंट गुज़रे थे। स्वप्न विजय साधना का अण्वस्स्ड मन ही ही मन चलने लगा। 

उन बंद आँखों से मन देख भी रहा है,  कुछ पूछ भी रहा है और कुछ सुन भी रहा है। अनकही बातें बिना कहे कही जा रही थी। इन बातों को बिना कानों के सुने सुना भी जा रहा था। उन बंद आँखों से भी बहुत कुछ देखा रहा था। एक फ़िल्मी गीत याद है शायद फिल्म अनुराग का। जिसमें नायक बिना आँख वाली उस नायिका से पूछता है अरे तूने कैसे जान लिया?  जवाब मिलता है - -मन से आँखों का काम लिया  का काम लिया। 

बाद में इस लोकप्रिय फिल्म की बेहद खूबसूरत नायिका की ऑंखें ठीक हो जाती हैं। उसे फिल्म वाली कहानी के ही एक बच्चे की ऑंखें लगाई जाती हैं। बच्चे का देहांत हो चुका होता है।  ठीक होने के बाद वह नायिका उस बच्चे को देखना चाहती है - -उसे ढूंढ़ने की कोशिश करती है लेकिन वह तो जा चुका होता है। अनुमान लगाएं उसे रौशनी देने वाली ज़िंदगी जा चुकी होती है तो उस पर क्या गुज़री होगी? हमारी ज़िंदगी भी कुछ ऐसी ही रहती है। हम बहुत कुछ खो बैठते हैं। पाना - खोना - -खोना पाना बस यही एक सिलसिला है ज़िंदगी। खैर बात तो चल रही थी हरिद्वार के एक आश्रम की। वहां पर मेडिटेशन जैस स्थिति में चल रहे एक स्वप्न की। चलो लौटते हैं उसी मुद्दे पर। 

उस समय आश्रम में बैठे हुए जो मनोस्थिति थी उस समय स्वप्न जैसे कुछ दृश्य भी चल रहे हैं। अधखुली आलखों जैसी सी स्तिति भी कह सकते हैं। कुछ दृश्य कभी धुंधले से और कभी कुछ स्पष्ट भी। कभी आमने सामने होती बात भी लगती। स्पष्ट सी परिभाषा शाद मेरी समझ से परे  है। 

वास्तव में कई लोगों को स्वप्न विजय की सिद्धि भी हो चुकी होती है।  ऐसे स्वपन की विजय साधना एक धार्मिक संकल्प का प्रयास हो सकता है जिसमें  स्वप्नों के माध्यम से सफलता और उपलब्धि प्राप्त करने का प्रयास और चाहत दोनों मिल कर सक्रिय हो जाते हों। ज़िंदगी की मुश्किलें और मुसीबतों से छुटकारा पाने के रस्ते और समाधान नज़र आने लगते हैं। ज़िंदगी के अंधेरों में रौशनी दिखाते हैं ऐसे स्वप्न।  

ऐसा भी लगने लगा कि यह कोई विशेष आध्यात्मिक इशारा भी है। आगे बढ़ना होगा लेकिन कैसे?  जवाब मिला स्वपन विजय साधना के माध्यम से ही पता लगाना होगा क्यूं आए हो इस दुनिया में? अब समझ आने लगा कि बचपन में ही बहुत पहले खेलने की तरफ भी मन क्यूं नहीं लगा रहा था। न गिल्ली डंडा न ही पतंगबाज़ी - -किसी में रस नहीं जग रहा था।  खाने पीने और सुंदर वस्त्र पहनने की तरफ भी रुचि क्यूं नहीं थी। बस गीत संगीत सुन्ना और पेन्सिल से स्केच बनाना। पीला रंग भी बहुत अच्छा लगता फिर भी सफेद वस्त्र मुझे अच्छे लगते। वस्त्रों में बस एक लंबी चादर सी मुझे बहुत पसंद रही। सिर से लेकर पाँव तक यही थी मेरा वस्त्र। लेटता तो ऊपर ओढ़ लेता और बैठता तो लोई की तरह ओढ़ ओट लेता। ऐसा भी लगा कि इस चादर के साथ में साधना आगे बढ़ाना सुविधाजनक है।  ऐसा ही लगता कि अपने स्वप्नों, इच्छाओं, और लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए उपलब्ध तकनीकों और साधनों का उपयोग भी इस के साथ किया जा सकता है। 

स्वपन विजय साधना के लिए कुछ महत्वपूर्ण तत्व ज़रूरी भी होते हैं। एकांत भी.  स्वछता भी थोड़ा सा अँधेरा करके आँखों को अधखुला रखना भी। उस चादर को लपेटना और ऊपर ओढ़ना अच्छा अच्छा लगता। सिर से पाँव तक उसे ओढ़ कर लेटने से अच्छा लगता। रेलगाड़ी , रेलवे स्टेशन या सुनसान स्थानों पर तो और भी अच्छा महसूस होता। कभी कभी स्वच्छ ताज़ी हवा के लिए नाक और मुँह से थोड़ी सी चादर हटा कर कुछ लंबे सांस लेना और फिर मेडिटेशन में उतरने के प्रयास करना। उसी चादर से मूंह को ढके हुए ही दिन के समय भी कभी आसमान देख लेना और कभी सितारे,  चन्द्रमा और सूर्य इत्यादि भी। ऐसे दृश्य बहुत बार देखे। अलौकिक आनंद भी देते ।  ऐसी यात्रियों की कृपा उस भगवान् ने बहुत बार की। दूर दराज के कई स्थान उन्हीं स्वप्नों में देखे जहां वास्तव में बहुत बाद में ही जाया जा सका। इनके बारे में पहले कभी कुछ पढ़ा या सुना भी नहीं था। फिर भी यूं लगा जैसे पूरा दृश्य सामने नज़र आ रहा हो। सचमुच बहुत विशेष अनुभव रहा। 

मन को शांत करने की भी ज़रूरत नहीं पड़ती थी। यह खुद-ब-खुद शांत होना शुरू हो गया था। बस बैठना और इच्छा करना। मन और स्वप्न की इस यात्रा के साथ साथ तन को भी यात्रा की अनुभूतियां होने लगीं थी। फिर इन अनुभवों और दृश्यों को कागज़ पर उतारने का भी मन होता लेकिन मुझे उस समय ताल लिखने में मुहारत नहीं हुई थी। स्वपन विजय साधना के लिए मन को शांत और स्थिर रखना महत्वपूर्ण भी होता है लेकिन यह सब स्वयंमेव होने लगा था। ध्यान भी लगने लगा और प्राणायाम की इच्छा भी बढ़ने लगी। मेडिटेशन में रहने की इच्छा तो हर पल रहने लगी। अपने मन को शांत करने की इच्छा और साधना की एक अलग सी चमक भी चिहरे पर दिखाई देने लगी। मन और विचारों की स्थिरता भी बढ़ने लगी। मन अध्यात्म की जानकारी की तरफ दौड़ता। 

घर परिवार से बिना पूछे कहीं जाना मुमकिन नहीं था। उस उम्र मैं ऐसा रिवाज ही नहीं था। केवल कल्पना ही एक जरिया था जहां मैं अपनी मर्ज़ी से जा सकता था। इसके इलावा कोई रास्ता था तो बस स्वप्न का ही था। जब जागता रहता तब भी मैं इस मकसद के संकल्प को मज़बूत बनाता।  सचमुच संकल्प शक्ति में बहुत सी क्षमता छुपी होती है। मैंने अपने उद्देश्यों और मकसद पर अपने स्वप्न बुनने शुरू किए। साहिर लुधियानवी साहिब की पंक्तियाँ प्रेरणा भी देती - -ज़रा देखें एक नज़र:

तुम ने कितने सपने देखे मैं ने कितने गीत बुने

इस दुनिया के शोर में लेकिन दिल की धड़कन कौन सुने


सरगम की आवाज़ पे सर को धुनने वाले लाखों पाए

नग़्मों की खिलती कलियों को चुनने वाले लाखों पाए


राख हुए जो दिल में जल कर वो अंगारे कौन चुने

तुम ने कितने सपने देखे मैं ने कितने गीत बुने


अरमानों के सूने घर में हर आहट बेगानी निकली

दिल ने जब नज़दीक से देखा हर सूरत अन-जानी निकली


बोझल घड़ियाँ गिनते गिनते सदमे हो गए लाख गुने

तुम ने कितने सपने देखे मैं ने कितने गीत बुने। ..!

यह गीत और साहिर लुधियानवी साहिब की अन्य रचनाएं। मन को किसी दूसरी दुनिया में जाने में काफी सहायक रहे। बहुत बार लगने लगता यह दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है! साहिर लुधियानवी साहिब के गीतों ने मुझे जहाँ समाजवाद के नज़दीक किया वहां शायरी की दुनिया के काफी नज़दीक भी किया। दुनिया में रहते हुए दुनिया से अलग ह कर सोचने के अनुभव इस शायरी ने भी बहुत दिए। उन दिनों रेडियो में ऐसे गीत संगीत आते भी बहुत थे। 

साहिर साहिब भी मुझे इस बात की प्रेरणा देते रहे कि सपने भी कैसे बुने जाते हैं गीत भी कैसे बुने जाते हैं। इस गीत साधना के रास्ते भी मुझे अपने लक्ष्यों को स्पष्ट करेने में सहायता मिलती रही। फिर उनसे अपने संकल्पों को देखने समझने और मज़बूत बनाने की कला भी आती गई।  सोते जागते वे गीत,  उनके बोल मेरे दिन रात के रूटीन में शामिल हो गए। मेरा सोने जागने रूटीन भी सुधरने लगा।  सुबह ढाई तीन बजे जग जाना ,  प्राणायाम करना और पांच छह बजे तक तैयार हो जाना इसी रूटीन से समझा और सीखा। धीरे धीरे इस तरफ रुचि विकसित हुई तो इसी क्षेत्र से जुड़े अच्छे अनुभवी लोग भी मिलते रहे। 

दिल्ली में जब डाक्टर मुखर्जीनगर में रहना हुआ तो यमुना किनारे जा कर मेडिटेशन में बैठना भी रोज़ की बात हो गई। मेरे साथ कभी कभार दो चार लोगों की मित्र मंडली भी होती थी। उस उम्र में गिने चुने मित्रों की यह मंडली शायद ज़रूरी भी थी। उनको मालुम था उस बांध के नज़दीक किस जगह मैं समाधि में बैठता था। एक बार घर लौटने में अँधेरा हुआ तो उन्होंने मेरे परिवा और मोहल्ले को बता दिया। कहीं बाढ़ न आ गई हो कहीं बाँध से पानी न छोड़ा गया हो ,  कहीं उधर कोई खूंखार जानवर न आ निकला हो . ..!परिवार के लोग और अड़ोस पड़ोस वाले ढूंढ़ने पहुंचे। जिन मित्रों को जगह मालूम थे वे ही साथ लेकर वहां गए थे। 

योगाभ्यास भी इसी रूटीन से ज़िंदगी में शामिल हुआ। योग से जहाँ शरीरक तंदरुस्ती मिलती वहीँ मानसिक शक्ति, भी मिलती। शरीरिक स्वास्थ्य और उच्च स्तरीय ध्यान प्राप्त करने  की इच्छा और मार्गदर्शन भी मिलता गया। यह मार्गदर्शन ज़िंदगी की अधयत्मिक यात्रा में भी मदद कर सकता है। नियमित योगाभ्यास करने से मनोदशा भी सुधरती है और दिशा भी सही मिलती है। ऐसा होने से स्वप्नों को साकार करने में भी सहायता मिलती है।

इसी संबंध में पुराणों और शास्त्रों का अध्ययन करें तो हिंदू धर्म में, स्वप्न विजय साधना के बारे में कैफीकुछ मिलता है। विविध पुराणों और ग्रंथों में इस तरह की बहुत सी अर्थपूर्ण बात की गई है। जिनको यह सब कठिन लगता हो वे लोग ओशो के ज़रिये इनका अधीन कर सकते हैं समझ जल्दी आ जाएगी।  इन पुराणों और ग्रंथों का अध्ययन करने से आपको स्वप्नों के विजय पर विस्तारित ज्ञान मिल सकता है। स्वप्न में क्या देखना चाहते हैं आप इस का भी ज्ञान है। इसका पता चलते ही उस अलौकिक ज्ञान की झलक मिलनी शुर होती है। 

हाँ इस संबंध में नियमित और ईमानदार रूप से साधना करना आवश्यक है। जो लोग खुद के प्रति ईमानदार नहीं होते वे साधना व संसार के प्रति भी ईमानदार नहीं हो सकते।  स्वप्न विजय साधना के लिए नियमितता और निष्ठा महत्वपूर्ण हैं। संकल्प तभी मज़बूत बन पाएंगे। आपको अपने विशिष्ट साधनाओं को निरंतरता के साथ करना चाहिए और उन्हें पूरा करने के बाद निष्ठा के साथ प्रतिक्रिया करनी चाहिए। इसी क्रिया प्रतिक्रिया से ही नया नया ज्ञान भी मिलेगा। 

यदि आप स्वप्न विजय साधना करना चाहते हैं, तो यह आपके धार्मिक अनुयायियों या आपके गुरु या धार्मिक मार्गदर्शक के संपर्क में रहने से मदद मिलतिओ ही है। इसी दिशा में यात्रा करने वाले मित्रों, सहयोगियों या साथियों की नज़दीकी भी आमतौर पर सहायक रहती है वैसे इस दिशा की यात्रा कई बार बिलकुल अकेले में अधिक मज़ेदार भी रहती है। 

इस आश्रम में मेरे आसपास परिवार के भी काफी लोग थे। इस से ध्यान साधना बार बार भंग हो रही थी। उस छोटी आयु में वहां से निकल कर मैं कहाँ गया यह एक अलग कहानी है जिसकी चर्चा मैं हकड़ ही करूंगा। तब के लिए आज्ञा चाहता हूँ कि यह पोस्ट पहले ही काफी लंबी हो गई है। इस आश्रम की जानकारी भी जल्द ही किसी अलग पोस्ट में सांझी करूंगा कि कैसे पंजाब के एक बहुत बड़े कारोबारी ने अपनी श्रद्धा से इसे बनाया। इसकी सेवा उन्होंने उन महापुरुषों के चरणों में की जिन्हें वह अपना गुरु मानते थे उनकी मान्यता भी बहुत है।  हमें यहाँ जाने का सुअवसर मिला इसी आश्रम का निर्माण करवाने वाले ठेकेदार गुरुचरण सिंह छाबड़ा के स्नेह और सहयोग से। 

                              --रेक्टर कथूरिया/ /तंत्र स्क्रीन डेस्क

Wednesday, November 12, 2025

बहुत जल्दी सुन लेते हैं काल भैरव भक्तों की पुकार

Wednesday 11th November 2025 Regarding Kaal Bhairav Jayanti 2025 Details Kaal Bhairav//Tantra Screen 

चंडीगढ़:11 नवंबर 2025: (मीडिया लिंक रविंद्र/ /तंत्र स्क्रीन-अध्यात्म डेस्क)::

सिसवा डैम के नज़दीक स्थित भगवान काल भैरव मंदिर को बिलकुल ही निकट महसूस करते हुए थोड़ा सा ही सोचा तो कई अनुभव होने लगे। काल भैरव से मेरा स्नेह और इनमें मेरी आस्था बहुत पुरानी है।  इसकी शुरुआत का सही समय भूल गया है लेकिन मैं अभी 9 बरस का भी नहीं हुआ था। 

                      काठमांडू नेपाल में स्थित इस प्रतिमा की तस्स्वीर क्लिक की रुपेशाग्राफी ने 
उन दिनों के ज्योतिषी लोग यूट्यूब के साथ सुसज्जित नहीं हुआ करते थे।
ऐसा कुछ उन दिनों था भी नहीं। बड़ा सा कुरता पहना होता उसके साथ पायजामा कभी कभार ही होता आम तौर पर धोती जैसी पौशाक होती। ।  कंधे पर तीन झोले लटकते होते। एक में वह सामान डालते जों जयोतिष लगवाने वाले उपाय के लिए ला कर देते। सरसों के तेल का बर्तन भी होता। एक झोले में उपाय के रत्न इत्यादि भी होते। हाथ में जंत्रियां हुआ करती थीं और हाथों की उँगलियों में पांसे जैसी चौकौर से कुछ डिज़ाइन जो एक माला जैसी चीज़ से लटके होते। हर सवाल पर वह इन्हीं चौकौर खानों को नीची बिछाई छड्ड पर फेंकते। फिर कई बार जंत्री भी खंगालते। कई बार हाथों की लकीरें भी गहराई से देखते। यही थे उस दौर के ज्योतिषी। हर गली में चक्क्र लगा कर आवाज़ भी देते कि कौन सा दिन त्यौहार है ?  

बस यही याद करते करते विचार आया कि कल अर्थात बुधवार को 12 नवंबर 2025 है। लगा निश्चय ही कल का यह दिन त्यौहार भी ख़ास ही होगा क्यूंकि कल को काल भैरव जयंती है। इसका पक्का होने पर काल भैरव जी का समरण भी हुआ। बहुत छोटी सी उम्र में हुआ था परिचय। भगवान शिव के इस अवतार का पता चलते ही मुझे लगा जैसे पाने किसी पारिवारिक पुरखे से बात हो गई ही। भगवान् से शिव के साथ इस अनन्य प्रेम की कहानी भी अलग है जिसकी चर्चा फिर कभी सही।  

वास्तव में मुख्य हिन्दू दिन त्योहारों में कालभैरव जयंती का अपना ही महत्व है। इस त्यौहार को जिसे कालाष्टमी भी कहते हैं) है। वास्तव में यह दिन भगवान शिव के रौद्र रूप, भगवान कालभैरव के अवतरण दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस रौद्र रूप को देखने ,  दिखने और अपनाने की ज़रूरत ज़िन्दगी में कई बार महसूस होती है। भक्त इस दिन व्रत रखते हैं और भय, पाप व संकटों से मुक्ति पाने के लिए उनकी विशेष पूजा-अर्चना करते हैं। इस रूप के स्मरण मात्र से ही एक शक्ति का अहसास होता है। एक आत्म विश्वास जागने लगता है। 

अब जबकि 12 नवंबर 2025 को कालभैरव जयंती है तो थोड़ी सी आस्था होते ही आप महसूस कर सकते हैं कि तन मन में बहुत से बदलाव आते हैं। बहुत ही अदभुत अहसास-शक्ति के,  क्षमता के,  आत्म विश्वास के विजय के और भगवान काल बी भैरव के दर्शनों के। साथ ही इस तरह के योग भी बनने लगते हैं। भगवान काल भैरव के स्वरूप को ध्यान से देखने का मन भी होता है। आसपास स्थित भगवान् काल भैरव मंदिर के दर्शनों की अभिलाषा भी होने लगती है। 

काल भैरव जयंती पर यह उल्लेख भी ज़रूरी है कि काशी के कोतवाल, जिनसे काल भी डरता है वह बहुत बड़ी शक्ति हैं। जानिए क्यों कहलाते हैं कालभैरव 'काशी के कोतवाल' वैसे यह कहानी भी जल्द ही अलग से राख्नेगे आप के सामने। 

गौरतलब यह भी कि हर साल कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को भगवान कालभैरव की जयंती भक्ति और श्रद्धा से मनाई जाती है। 

वैसे तो मोहाली-चंडीगढ़ क्षेत्र में कई भैरव मंदिर हैं, लेकिन श्री काल भैरव का सबसे प्रसिद्ध मंदिर सिसवां डैम, नया चंडीगढ़ के पास स्थित है। 

श्री भैरव जाति मंदिर की भी बहुत गहरी मान्यता है यह मंदिर चंडीगढ़-बद्दी रोड पर स्थित है। यह स्थान प्रकृति से घिरा हुआ है और सिसवां डैम के पास होने के कारण बहुत शांत और सुंदर है। यह विशेष रूप से काल भैरव की पूजा के लिए जाना जाता है। तंत्र साधना करने वाले भी अक्सर यहाँ हाज़री लगवाते हैं। 

अन्य भैरव मंदिर भी आसपास हैं। इसी क्षेत्र में कई अन्य भैरव मंदिर भी हैं। भैरव मंदिर, मनसा देवी परिसर: यह मंदिर पंचकूला में मनसा देवी परिसर के भीतर स्थित है। श्री भैरव मंदिर, ढकौली: यह मंदिर जीरकपुर में स्थित है। 

भैरव जाति मंदिर, सिसवां, न्यू चंडीगढ़ सचमुच चंडीगढ़ क्षेत्र में एक अवश्य देखने योग्य स्थान है फिर भी दर्शन तो किस्मत से ही होते हैं।

कुछ लोग नॉनवेज और शराब के सेवन को इस मौके पर अच्छा समझते हैं। लेकिन है यह व्यक्तिगत मान्यता। अंडा मांसाहार और शराब का सेवन आपकी व्यक्तिगत मान्यताओं और परंपराओं पर निर्भर करता है, लेकिन सामान्य धार्मिक मान्यताओं के अनुसार धार्मिक त्योहारों, विशेषकर कालभैरव जयंती जैसे शुभ और पवित्र दिनों पर, अधिकांश लोग अंडा, मांस और शराब के सेवन से परहेज करते हैं।

कुछ लोग इसे लेकर धार्मिक कारण बताते हैं और इनकी पालना सही समझते हैं। यह बात भी सभी जानते समझते हैं कि हिन्दू धर्म में त्योहारों और उपवास के दिनों को सात्विक (शुद्ध) रहने और मन व शरीर को पवित्र रखने का समय माना जाता है। तामसिक (मांस, शराब, आदि) भोजन का सेवन इस दिन वर्जित माना जाता है, क्योंकि यह पूजा-पाठ के माहौल के विपरीत होता है। पूजा पता का माहौल सात्विक रखा जाना ज़रूरी भी है। इसलिए तामसिक सोच और खानपान से परहेज़ ही रखना उचित होता है। 

इसके चलते एक सच और भी है कि क्षेत्रीय और व्यक्तिगत प्रथाएं कुछ विशिष्ट तांत्रिक या क्षेत्रीय प्रथाओं में, भैरव पूजा के हिस्से के रूप में कुछ विशेष प्रकार के प्रसाद (जिन्हें महाप्रसाद कहते हैं) का उपयोग किया जाता है, लेकिन यह आम जनता के बीच प्रचलित नहीं है। सभी मंदिरों और सभी स्थानों पर यह होता भी नहीं। इसलिए मान कर चलिए कि यदि आप धार्मिक मान्यताओं का पालन करते हुए कालभैरव जयंती मना रहे हैं, तो इन चीजों का सेवन करने से बचना ही सबसे अच्छा माना जाता है।

फिर भी कुछ हद तक यह बात सच है कि कुछ लोग भैरव मंदिरों में शराब और कुछ मामलों में मांसाहारी प्रसाद भी चढ़ाते हैं। यह प्रथा मुख्य रूप से तांत्रिक परंपराओं और कुछ विशिष्ट मान्यताओं से जुड़ी हुई है, जिसके पीछे कई कारण बताए जाते हैं। 

वैसे इस मुद्दे पर बात करते हुए शराब और नॉन-वेज प्रसाद चढ़ाने के जो कारण उनका भी कुछ न कुछ आधार तो होता ही है। काम ही सही पर इसका प्रचलन तो है ही। 

इस सब के साथ ही तांत्रिक परंपरा भी प्रचल्लित है। भैरव को तंत्र विद्या का देवता माना जाता है। तांत्रिक साधना में तामसिक चीजों का महत्व होता है, और शराब को भी इसी का हिस्सा माना जाता है। साधक और सेवक तरह केसवन से मिलने वाली ऊर्जा को अपनी साधना में उन्नति के लिए इस्तेमाल करते हैं। 

शायद सभी लोग न जानते हों लेकिन शिव के इस स्वरूप को तामसिक देवता मान कर भी पूजन किया जाता है।  काल भैरव को शिव का एक उग्र या तामसिक रूप माना जाता है। भक्तों का मानना ​​है कि ऐसी चीजें अर्पित करने से वह प्रसन्न होते हैं। इस लिए इस प्रसन्नता को हासिल करने के लिए ऐसी चीज़ें चढ़ाई भी जटरी हैं ,  इनका सेवन भी होता है इसका प्रसाद भी वितरित होता है। 

मनोवैज्ञानिक कारण:  यह सब एक और रहस्य के चलते भी किया जाता है। दुर्गुणों का समर्पण इस देवता के सामने बहुत श्रद्धा से किया जाता है। एक मान्यता यह भी है कि शराब जैसी बुरी आदतों को भगवान को समर्पित करके भक्त अपने अंदर के दुर्गुणों से मुक्ति पाने की प्रार्थना करते हैं। यह आत्म-नियंत्रण और सांसारिक मोह-माया से मुक्त होने का प्रतीक है। ऐसी साधना से धीरे धीरे ऐसे व्यसन छूट जाते हैं। 

बहुत पुरानी क्षेत्रीय और विशिष्ट परंपराएं हैं यह सब। भारत के कुछ विशेष मंदिरों में यह परंपरा सदियों से चली आ रही है। उदाहरण के लिए, उज्जैन के काल भैरव मंदिर में शराब चढ़ाने की प्रथा बहुत प्रसिद्ध है, जहां भक्त भगवान को शराब चढ़ाते हैं और उसे प्रसाद के रूप में भी ग्रहण करते हैं। ऐसा करके यदि आप ऐसे दुर्गुण छोड़ने में कामयाब हो जाते है तो यह सौदा भी महंगा नहीं है।  

मोहाली और चंडीगढ़ क्षेत्र में, श्री भैरव जाति मंदिर बहुत प्रसिद्ध है। यह मंदिर सिसवां डैम के पास नया चंडीगढ़ में स्थित है। पब्लिक ट्रांसपोर्ट आम तौर पर न मात्र जैसी ही है। अपने व्यक्तिगत या कराये के वाहन से ही पहुंचा जा सकता है। यह एक ऐसा मंदिर है जहाँ कुछ भक्त शराब का प्रसाद चढ़ाते हैं। इस आस्था को वहां पांच कर देखा भी जा सकता है और महसूस भी किया जा सकता है। यह मंदिर अपनी अनूठी परंपरा के लिए जाना जाता है, जहाँ भक्तों का मानना है कि भगवान काल भैरव को शराब चढ़ाने से उनकी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। हालांकि, यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि:यह परंपरा मुख्य रूप से कुछ विशेष मंदिरों की है, न कि क्षेत्र के सभी भैरव मंदिरों की। साथ ही भैरव बाबा के सात्विक रूप भी तो हैं आप चाहें तो उस सवरूप की पूजा अर्चना कर सकते हैं। अन्य मंदिरों में, जैसे कि मनसा देवी परिसर के मंदिर में, आमतौर पर सात्विक प्रसाद ही चढ़ाया जाता है। कुल मिला कर मन की आस्था को पहल देना सब से ज़रूरी है। 

इसे विचार में रखना आवश्यक है कि मांसाहारी (नॉन-वेज) प्रसाद चढ़ाने के बारे में यह प्रथा भारत के कुछ बहुत ही विशिष्ट तांत्रिक मंदिरों तक ही सीमित है (जैसे कि कुछ काली मंदिर, जहां बकरी की बलि दी जाती है)। वास्तव में ऐसी प्रथाएं भी किसी गहरे रहसयमय कारणों से शुरू हुई होती हैं। कथाओं के आयोजन में इनकी चर्चा भो होती है। ऐसी किसी प्रथा में कोई स्वयं मांस मदिरा का सेवन करना छाए तो अलग बात है।  . 

Tuesday, September 17, 2024

तंत्र मन्त्र से जीवन में सफलता कितनी सम्भव है

Tuesday 16th September 2024 at 6:45 PM

 यह आस्था और साधना की शिद्दत पर ही निर्भर करेगा 


लुधियाना: एक तपोबन और मंदिर भूमि:17 सितंबर 2024:( मीडिया लिंक//तंत्र स्क्रीन डेस्क)::

बहुत से मामले और बहुत सी बातें बिलकुल सच होते हैं लेकिन उनका सच दिखाई नहीं देता। उनका कोई सबूत भी नहीं होता। उन्हें साबित करना संभव नहीं होता। बहुत से मामलों में सच जैसा कुछ दिखाई तो देता है लेकिन होता वह झूठ ही है। विज्ञान की प्रयोगशाला में सब कुछ साबित करना संभव भी नहीं होता। यही सच्चाई तंत्र मंत्र और यंत्र के प्रयोग पर भी लागू होती है। इसे विश्वास  नहीं  सवालों के चश्मे से देखना उचित भी नहीं क्यूंकि तंत्र मंत्र उन लोगों के बिगड़े हुए काम ज़रूर बना देते हैं जिनका आत्म विश्वास डगमगा चुका होता है। जिन्हें खुद पर विश्वास नहीं रहा होता। तंत्र मंत्र उन्हें फायदा पहुंचाते हैं। 

इसी तरह के ढंग तरीकों से उनके मन की एकाग्रता भी बढ़ती है और दिमाग की भी। तंत्र-मंत्र-यंत्र और साथ में  सामूहिक जाप उनमें शक्ति जगाता है। यह जाएगी हुई शक्ति ही उनमें एक नए जोश का संचार करती है। आप इस शक्ति को कोई भी नाम दे सकते हैं। वैसे जिस शक्ति के नाम से जाप हो रहा होता उस समय साधक के सामने वही शक्ति साकार  हुई होती है।  अल्पकाल की सिद्धि भी कह सकते हैं। जाप रोज़ हो रहा हो तो यही स्थाई सिद्धि भी बन जाती है। 

तंत्र मन्त्र और यंत्र का प्रयोग यूं तो व्यक्तिगत और आध्यात्मिक उद्देश्यों के लिए किया जाता है। लेकिन आजकल हर रोज़ की ज़िन्दगी में आने वाली छोटी मोती ज़रूरतों के लिए भी इस तरह के प्रयोग होने लगे हैं। वास्तव में यह एक प्राचीन पद्धति है जो विभिन्न उद्देश्यों की प्राप्ति और अभिप्रेत शक्तियों के प्रकटीकरण के लिए उपयोगी मानी जाती है। इसके वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक आधार होते हैं। अगर कोई व्यक्ति आध्यात्मिक तौर पर जाग जाता है तो उसके काम खुद-ब-खुद बनने लगते हैं। उसके सामने कोई गलत व्यक्ति आने से घबराने लगता है। शक्ति का जागना यही होता है। 

तंत्र मन्त्र का प्रभाव व्यक्ति के निश्चित उद्देश्यों और उपास्य देवता/शक्ति के संबंध में भी निर्भर करता है। कुछ लोग इसे अपने साधना और स्वयं सुधार के लिए उपयोग करते हैं, जबकि दूसरे लोग यह उपयोग विशेष प्रभावों, जैसे धन, स्वास्थ्य, संघर्ष, प्रेम आदि की प्राप्ति के लिए करते हैं। इस तरह के दुनियावी काम तो अपने आप बनने लगते हैं। उनका प्रभामंडल भी सुधरने लगता है। चेहरे की चमक भी बढ़ जाती है। 

तंत्र मन्त्र के प्रभाव को व्यक्ति के श्रद्धा, विश्वास, साधना की क्षमता, उचित नियमों का पालन और निरंतरता प्रभावित कर सकते हैं। तंत्र मन्त्र की सफलता परिणाम व्यक्ति की अन्तरंग स्थिति, कर्म, दैवीय अनुमति आदि पर भी निर्भर करते हैं। साधक अंदर से जितना शुद्ध और सच्चा होगा उसे फायदा भी उतना बड़ा और जल्दी होने लगेगा। जो साधक साधना में ईमानदार नहीं होते उनकी साधना फलित नहीं होती।  मामला उल्टा भी पढ़ जाता है। 

हालांकि, तंत्र मन्त्र का उपयोग करने के दौरान सभी सावधानियां और सम्पूर्णता के साथ कार्य किया जाना चाहिए। यह मान्यता है कि तंत्र मन्त्र का दुरूपयोग अनुकरणीय प्रभावों के साथ आएगा और इससे दुष्प्रभाव भी हो सकता है। यह सब साधक की नीयत पर निर्भर करता है।  साफ़ है तो आपके  परिणाम भी जल्द आने लगेंगे। 

सफलता व्यक्ति की साधना, अध्ययन, कर्म और परिश्रम पर निर्भर करती है। तंत्र मन्त्र का प्रयोग उन लोगों द्वारा किया जाता है जो निरंतर अभ्यास करते हैं, शिक्षा प्राप्त करते हैं, आदर्शों का पालन करते हैं और नियमित रूप से अपनी साधना को जारी रखते हैं। निरंतरता और शुद्धता इस मामले में बहुत महत्व रखती है। 

च्छी गुरुभक्ति, निष्ठा, निरंतरता और सम्पूर्णता के साथ तंत्र मन्त्र के प्रयोग से सफलता की संभावना बढ़ सकती है, लेकिन इसका प्रयोग समय-समय पर अनुभवित और निश्चित गतिविधियों के साथ ही करना चाहिए। परंतु एकदिवसीय प्रयासों से मानसिक, शारीरिक या आर्थिक अभिवृद्धि की प्राप्ति निश्चित नहीं होती है। यह एक संशोधित प्रकृति और प्रयोग के लिए अवधारित कार्य है जो समय, तत्परता और समर्पण की मांग करता है। शिद्दत के साथ पूरा समर्पण, पूरी भक्ति, पूरी शुद्धता अगर हैं तो आप का मकसद सफल रहेगा। 

आप अगर ईमानदारी से समर्पित हो कर साधना करते हैं तो यकीन रखिए फायदे भी ज़रूर होंगें। शक्ति जागेगी तो आपको इसका अहसास भी कराएगी। 

Monday, September 16, 2024

ग्युतो तांत्रिक कॉलेज:तिब्बती बौद्ध ज्ञान का गढ़

Monday:16th September 2024 at 11:21 AM

एक पूर्ण और सफल इंसान बना  देते हैं इस कठिन परीक्षण से 


धर्मशाला
: (हिमाचल प्रदेश): 16 सितंबर 2024: (मीडिया लिंक//तंत्र स्क्रीन डेस्क)::

भारत में हिमाचल प्रदेश  स्थित धर्मशाला के सुरम्य शहर में स्थित, ग्युतो तांत्रिक कॉलेज तिब्बती बौद्ध धर्म की समृद्ध परंपराओं को संरक्षित करने और प्रचारित करने के लिए समर्पित एक प्रसिद्ध संस्थान है। 1474 में जेत्सुन कुंगा धोंडुप द्वारा स्थापित, जो कि प्रख्यात जे त्सोंगखापा के एक समर्पित शिष्य थे, यह प्रतिष्ठित कॉलेज सदियों से आध्यात्मिक उत्कृष्टता का प्रतीक रहा है।

बिना कोई शोर मचाए ये लोग अपने मिशन और मकसद में लगे रहते हैं। इनका उद्देश्य और इनके कार्य  भी सचमुच महान हैं। ग्युतो तांत्रिक कॉलेज वज्रयान बौद्ध धर्म की उन्नत और गूढ़ शिक्षाओं में मुहारत हासिल करने के इच्छुक भिक्षुओं के लिए प्रमुख गंतव्य है। यह विशेष कॉलेज तांत्रिक ज्ञान के उच्चतम स्तर को प्रदान करने में माहिर है, जिसमें ज़ोर दिया जाता है  बातों पर जो संक्षेप में इस तरह हैं। 

इस प्रशिक्षण के अनुष्ठान अभ्यास बहुत गहरे हैं। जटिल समारोह, पवित्र मंत्रोच्चार और तोरमा (मक्खन की मूर्ति) निर्माण पर यहां काफी ध्यान दिया जाता है। 

इसके साथ ही ध्यान और माइंडफुलनेस को बहुत परिपक्व किया जाता है।  गहन विज़ुअलाइज़ेशन तकनीक, मंत्रोच्चार और एकाग्रता के अभ्यास से  को बहुत गहराई से शिष्यों और छात्रों के मन  बैठाया जाता है। 

इस तरह की गहरी तैयारियों के बाद ही बारी आ पाती है तंत्र के प्रशिक्षण की। तांत्रिक अध्ययन के दौरान बौद्ध धर्मग्रंथों, दर्शन और प्रतीकवाद की गहन खोज करवाई जाती है। 

इस तंत्र कालेज का शैक्षणिक प्रभाव बहुत ही सूक्ष्मता से तन और मन पर प्रभाव डालता है। ग्युटो तांत्रिक कॉलेज एक परिवर्तनकारी शिक्षा प्रदान करता है, जिसके ज़रिए निम्नलिखित को पूरी तरह से विकसित किया जाता है। 

आध्यात्मिक विकास के लिए भिक्षु कठोर आध्यात्मिक अभ्यासों के माध्यम से गहन अंतर्दृष्टि, करुणा और ज्ञान विकसित करते हैं। उन्हें अभ्यास की सख्ती बहुत निपुण बना देती है। हर तरह से विकसित मानव भी और तांत्रिक भी। 

कौशल निपुणता में ट्रेनिंग के दौरान  को जप, अनुष्ठान प्रदर्शन, वाद-विवाद और कलात्मक अभिव्यक्ति (मंडल, तोरमा) में पूरी विशेषज्ञता दी जाती  है। हर तरह से पूरी तरह निपुण बना दिया जाता है। 

यहां का प्रशिक्षण पूरा करने के बाद इनके छात्र सफल व्यक्ति बन जाते हैं। तरक्की के साथ साथ नेतृत्व और शिक्षण में,इनके स्नातक दुनिया भर में तिब्बती बौद्ध धर्म के सम्मानित शिक्षक, नेता और राजदूत बन जाते हैं। हर क्षेत्र में इनका डंका  बोलता है। 

यहां का पाठ्यक्रम भी बेहद महत्वपूर्ण है। कॉलेज के व्यापक पाठ्यक्रम में बहुत कुछ शामिल है नींव मज़बूत करने से लेकर जीवन के हर पहलु का निर्माण मज़बूत किया जाता है। आप कह सकते हैं कि यहाँ के  किसी भी तरह किसी सुपरमैन  नहीं होते।  संकट का सामना करना सिखाया जाता है। यहां के सिलेबस में जिन बातों पर ज़ोर दिया जाता है उनमें हैं- सूत्रयान अध्ययन: बौद्ध धर्मग्रंथों, दर्शन और नैतिकता की खोज। इसमें जीवन  पहलू नहीं छोड़ा जाता। हर विद्या सिखा दी जाती है। 

इसके बाद तंत्रयान अध्ययन गहराई से कराया जाता है। तांत्रिक अनुष्ठानों, ध्यान और विज़ुअलाइज़ेशन पर उन्नत शिक्षाएँ दी जाती हैं। जप योग और तंत्र हर मामले ये भिक्षु पूरी तरह से निपुण बन जाते हैं। 

फिर बारी आती है अनुष्ठान और समारोह अभ्यास की। इसके अंतर्गत पवित्र जप, तोरमा निर्माण और समारोह प्रक्रियाओं में पूरी गहराई से प्रशिक्षण दिया जाता है। 

यह सब सिखाने के बाद बारी आती है समुदाय और आउटरीच की। ग्युटो तांत्रिक कॉलेज भिक्षुओं, विद्वानों और आध्यात्मिक साधकों का एक जीवंत समुदाय है। इस कालेज में ट्रेनिंग देते वक्त किसी भी तरह की कोई कसर नहीं छोड़ी जाती।  वाले हर  सक्षम बन जाते हैं। 

अपने छात्रों और शिष्यों की सफलता का पता लगाने के लिए  प्रबंधन  सार्वजनिक प्रदर्शन भी आयोजित करता है।  मंत्रोच्चार समारोह, अनुष्ठान प्रदर्शन और सांस्कृतिक कार्यक्रम देखने वाले होते हैं। यहाँ से पढ़ने वाले छात्रों को भी अपना हुनर दिखने का मौका मिलता है। 

यह कालेज अंतर्राष्ट्रीय आगंतुकों का भी पूरी  गर्मजोशी के साथ स्वागत करता है। आध्यात्मिक साधक, पर्यटक और शोधकर्ता यहाँ आते ही रहते हैं। उन्हें बहुत प्रेम  कहा  जाता है। 

अंतरधार्मिक संवाद का भी यह संस्थान समर्थन करता है। अन्य आध्यात्मिक परंपराओं के साथ सहयोग, आपसी समझ को बढ़ावा देना इनके लिए  प्राथमिक स्थान पर रहता है। 

कालेज का स्थान और संक्षिप्त इतिहास यहाँ फिर दोहराया जा रहा है। मूल रूप से यह संस्थान ल्हासा, तिब्बत में स्थापित रहा लेकिन ग्युटो तांत्रिक कॉलेज 1959 में चीनी आक्रमण के बाद धर्मशाला, भारत में स्थानांतरित हो गया। उस समय  नज़ाकत यही थी। आज, कॉलेज परम पावन दलाई लामा के निवास के पास फल-फूल रहा है, जो तिब्बती बौद्ध समुदाय के लचीलेपन और दृढ़ संकल्प का प्रतीक भी है।  नज़दीक  गुज़रो तो सुगंधित तरंगे मन ओके मोह लेती हैं। विरासत और प्रभाव भी ी इन तरंगों  रहते हैं। 

ग्युटो तांत्रिक कॉलेज ने तिब्बती संस्कृति को संरक्षित किया।  बौद्ध सम्पदा को  संभाला। प्राचीन परंपराओं, अनुष्ठानों और कलात्मक प्रथाओं की भी रक्षा की।जलावतनी के जीवन में यह सब आसान नहीं होता लेकिन इन लोगों ने यह सब कर दिखाया। 

इसके साथ ही आध्यात्मिक विकास को विकसित और प्रेरित किया। आध्यात्मिक नेताओं, विद्वानों और चिकित्सकों की पीढ़ियों का भी यहाँ पोषण किया।

चीन जैसी महाशक्ति का तीव्र विरोध सामने होने के बावजूद इनके तन, मन और चेहरों की शांति कभी  कम नहीं हुई। तिब्बती समुदाय के इन बुद्धिजीवियों ने वैश्विक समझ को बढ़ावा देना भी  प्राथमिक महत्व पर समझा।  तिब्बती बौद्ध धर्म के ज्ञान, करुणा और शांति को दुनिया के साथ साझा करना। यह सब इनकी दूरअंदेशी का भी  परिचायक है। 

हम अन्य पोस्टों में भी इस संस्थान के संबंध में चर्चा करते रहेंगे।  

Sunday, July 14, 2024

कैसे मिलते हैं तंत्र मार्ग पर सही रास्ते और सच्चे गुरु

तंत्र की हकीकत--प्रमाणिकता और इतिहास....! 

लुधियाना: 13 जुलाई 2024: (के. के.सिंह//तंत्र स्क्रीन डेस्क)

तंत्र को मानने वालों की संख्या न मानने वालों से आज भी ज़्यादा है। केवल गांवों में ही नहीं बल्कि शहरों में भी। देश में ही नहीं विदेशों में भी।  बस अलग अलग जगहों पर इसका रंग रूप अलग हो सकता है। अफ्रीका के तंत्र की बहुत सी कहानियों पर तो बहुत दिलचस्प नावल भी लिखे गए थे। किसी भी इंसान का पुतला बना कर उसे सुईयां चुभो चुभो कर और मंत्र पढ़ कर उसे बिमार करना और धीरे धीरे मौत के घात उतार देना अफ्रीकी तंत्र में आम रहा है। हालांकि विज्ञानं और तर्कशील सोच वालों ने इसे कभी सच नहीं माना लेकिन फिर भी बहुत बड़ी संख्या में लोगों की इस में आस्था और मान्यता निरंतर बनी हुई है। 

अगर हम तंत्र की हकीकत--प्रमाणिकता और इतिहास पर चर्चा करें तो बहुत सी बातें इसके हक़ में भी मिलेंगी और विरोध में भी। जो लोग इसके हक़ में हैं वो बहुत सी बातें बताएंगे जो सबूत जैसी ही लगेंगी। इनमें पढ़े लिखे लोग भी अक्सर शामिल होते हैं। 

जो लोग तंत्र के हक़ में नहीं हैं वे भी बंटे हुए हैं। उनमें से अधिकतर लोग ऐसे हैं जो दबे दबे से स्वर में इसका विरोध करते हैं खुल कर नहीं। उनके स्वर में भय मिश्रित सुर को भी महसूस किया जा सकता है। उन्को खुद चाहे तंत्र प्रयोग का कोई भी अच्छा या बुरा अनुभव न रहा हो लेकिन किसे से सुना सुनाया कोई भयानक अनुभव ज़रूर याद रहता है और उसका भय उनकी आंखों में महसूस कीजै जा सकता है। कई लोग ऐसे में घबरा कर ऐसा भी कहते हैं हमें इस पर कुछ नहीं कहना। आपको पता नहीं यह चीज़ें बहुत भरी होती हैं। 

तंत्र की उत्पत्ति और इतिहास

तंत्र एक प्राचीन भारतीय आध्यात्मिक परंपरा है, जिसकी जड़ें वैदिक काल में पाई जाती हैं। इसका उल्लेख वेदों, उपनिषदों, पुराणों और अन्य धार्मिक ग्रंथों में मिलता है। तंत्र साधना का विकास मुख्यतः गुप्त काल (4वीं से 6वीं सदी) में हुआ, जब इसे बौद्ध, जैन और हिंदू परंपराओं में अपनाया गया। बहुत से समुदायों और संगठनों ने इसे धीरे धीरे पूरी तरह से अपना लिया। अब अलग अलग नामों से तंत्र हर क्षेत्र और सम्प्रदाय में मौजूद है। 

केवल इतना ही नहीं छोटे छोटे डेरों और मज़ारों पर भी अक्सर तंत्र के क्रियाकलाप किए जाते हैं। लोग झाड़ा करवाने वहां जाते हैं और उसके बाद वे पूरी तरह से ठीक होने का दावा भी करते हैं। ीा मामले में क्या क्या संभव है इसकी चर्चा भी हम अलग से किसी पोस्ट में करेंगे ही। 

तंत्र के सिद्धांत गहरी बातें करते हैं

तंत्र का मुख्य उद्देश्य आत्मा और परमात्मा के मिलन को प्राप्त करना है। यह यथार्थवादी दृष्टिकोण अपनाता है और मानता है कि संसार को त्यागने के बजाय, उसकी वास्तविकता को समझकर और उसमें रहकर आत्मा की उन्नति की जा सकती है। तंत्र साधना में मंत्र, यंत्र, और विभिन्न प्रकार की ध्यान विधियों का प्रयोग होता है। इन विधियों को समझना और करना सहज नहीं होता लेकिन फिर भी बहुत से लोग ऐसा करते हैं। 

तंत्र और योग का संबंध 

शरीर शुद्ध और निरोग न हो तो तंत्र की बात तो दूर साधारण मेडिटेशन भी संभव नहीं रहती। शरीर की निरोगता और उसका बलवान होना आवश्यक है। शरीर की शक्ति अर्जित करने के बाद ही मन को बलवान बनाना सिखाया जाता है। इसके बाद आत्मा की शक्ति को जगाने और उसे बढाने की विधियां आती हैं। वास्तव में तंत्र और योग का गहरा संबंध है। तंत्र साधना में ध्यान, प्राणायाम, मुद्रा और बंध जैसे योग के अंगों का उपयोग किया जाता है। तंत्र साधना का एक महत्वपूर्ण हिस्सा कुंडलिनी योग है, जिसमें शरीर में स्थित ऊर्जा केंद्रों (चक्रों) को जागृत किया जाता है। जो साधक इन रहस्यों को समझ जाता है उसके लिए तंत्र साधना के मर्म तक पहुंचना भी संभव हो जाता है। 

तंत्र साहित्य के क्षेत्र 

यूं तो तंत्र में बहुत सा साहित्य शामिल है जिसे गिना भी नहीं जा सकता। किसी बड़े पुस्तकालय या पुस्तक बिक्री केंद्र में जाएं तो तंत्र पर बहुत सी पुस्तकें और ग्रंथ वहां देखने को मिलेंगे। हर पुस्तक का कवर लुभावना होगा। तस्वीर रहसयमय और नाम अपने आप में बहुत कुछ समेटे होगा। लेकिन इसमें सच्चे तंत्र साहित्य को कोई सच्चा साधक या गंभीर पाठक ही समझ पाता है। 

तंत्र साहित्य में विभिन्न ग्रंथ शामिल हैं, जैसे कि शैव आगम। भगवान शिव के भक्तों में शैव आगम से सबंधित ये ग्रंथ बहुत महत्वपूर्ण होते हैं। साधक भगवान शिव को सर्वोच्च देवता मानते हैं। ओशो ने भी तंत्र की जिन 112 विधियों का उल्लेख किया है वह बहुत अर्थपूर्ण है। तंत्र पर ओशो के प्रवचनों पर आधारित बहुत सी किताबें भी मार्कीट में हैं। ख़ास बात यह है कि इन 112 विधियों में से कोई न कोई ऐसी विधि सभी को मिल जाती है जो उसकी शरीरक सरंचना, मन की अवस्था, समय की अनुकूलिता और हर मामले में रास आ ही जाती है। 

इसी तरह शाक्त आगम का क्षेत्र भी बहुत अलग और विशाल है। इस क्षेत्र से जुड़े ग्रंथ देवी की पूजा पर आधारित होते हैं। इन ग्रंथों में तंत्र से सबंधित विधियां भी बहुत गहन होती हैं। इन विधियों के लिए अग्रसर होना हो तो साधक को बहुत तैयारी भी करनी पड़ती है। इन विधियों में देवी के रूप को बहुत विधि से ध्याना होता है। देवी को बुलाने और उसके आने पर जो जो करना होता है उसके पूरे नियम भी होते हैं। इसमें क्यूंकि मुख्यता देवी को मां के रूप में पूजा जाता है तो साधक के मन में यह बात पूरी मज़बूती से बनी रहती है कि मैं मां की संतान हूं इसलिए मां मुझे मेरी हर बुराई और पाप के साथ स्वीकार करेगी और मुझे क्षमा करेगी। इस भावना से साधक की आत्मिक प्रगति तेज़ी से होने लगती है। उसका शरीर भी शुद्ध और बलवान होने लगता है और मन भी मज़बूत बन जाता है। 

तंत्र साधना से जुड़े साहित्य और ग्रंथों में वैष्णव आगम  ग्रंथ  महत्वपूर्ण हैं। ये विष्णु और उनके अवतारों की पूजा पर केंद्रित हैं। वर्ष 1972  में आई फिल्म हरी दर्शन एक तरह से इन्हीं ग्रंथों पर आधारित थी। निर्देशक थे चंद्रकांत और मुख्य कलाकारों में थे दारा सिंह। फिल्म की कहानी प्रहलाद भक्त पर आधारित थी और गीत संगीत भी बेहद जादू भरा था। बालक प्रह्लाद की भूमिका निभाई थी सत्यजीत पुरी ने। 

आखिर में यह उल्लेख आवश्यक है कि तंत्र का आधुनिक संदर्भ बहुत प्रदूषित जैसा हो गया है। आजकल तंत्र को अक्सर गलत तरीके से प्रस्तुत किया जाता है, जिससे इसकी वास्तविकता और महत्व धुंधला हो जाता है। तंत्र की सच्ची साधना में नैतिकता, स्व-अनुशासन और गुरु-शिष्य परंपरा का विशेष महत्व है। इसलिए इस तरफ भी ध्यान दिया जाना आवश्यक है। 

कुल मिलकर तंत्र एक समृद्ध और जटिल परंपरा है, जिसका इतिहास और प्रामाणिकता गहन अध्ययन और अनुभव से ही समझा जा सकता है। यह केवल एक साधना पद्धति नहीं है, बल्कि जीवन को देखने और समझने का एक व्यापक दृष्टिकोण है, जो व्यक्ति के मानसिक, शारीरिक और आध्यात्मिक विकास में सहायक होता है। इसकी सच्ची खोज केवल किताबों से कुछ वीडियो चैनल देख कर नहीं हो सकती। अंतर्मन में तंत्र के लिए सवयं की प्यास जागने पर ही रास्ते मिलते हैं और गुरु भी।