Tuesday, January 5, 2021

तंत्र कितना सच-कितना झूठ

तंत्र और चमत्कारों की परतों को खोलती विशेष पोस्ट


लुधियाना
: 5 जनवरी 2021(मीडिया लिंक रविंद्र//तंत्र स्क्रीन)::

तंत्र के नाम पर आम जनता के साथ जितना न्याय हुआ वह भी कम नहीं है लेकिन अज्ञानता और अंधविश्वास के चलते जितना अन्याय तंत्र विद्या के साथ हुआ वह भी कम नहीं हैं।  तंत्र को जानने और समझने के प्रयास धूमिल पड़ते गए और इसे अन्धविश्वास प्रचारित करने वाले अभियान तेज़ होते गए। ऐसी हालत में उन लोगों की तूती बोलती चली गई जो केवल रोज़ी रोटी और कमाई के चक्र में ही इस तरफ आए थे। तंत्र के सही ज्ञाता इस भीड़ से बिलकुल अलग हट कर अपने आप में मग्न रह कर अपना काम करते रहे। कभी हिन्दू धर्म और बौद्ध धर्म में भी तंत्र का बोलबाला था लेकिन बाद में सब मंद पड़ता गया। 

फिर लम्बे अंतराल के बाद ओशो ने तंत्र के गहन रहस्यों को सादगी भरे शब्दों में बिना किसी आडंबर के व्यक्त किया तो लोग उसी तरफ खिंचते चले गए। बहुत से लोगों को ओशो के सन्यास आश्रम में  जा कर आरम्भिक साधनायों से ही कुण्डिलिनी जागरण जैसे आभास होने लगे। उनका स्वास्थ्य ठीक होने लगा और उनका आत्म विश्वास लौटने लगा। इसके साथ आवाज़ की सुंदरता और सुरीलापन बढ़ गया और साथ ही तन मन में छुपे भय, झिझक और अनावश्यक लज्जा भी दूर होने लगी। वे लोग इन साधना पद्धतियों के थोड़े से आरम्भिक अभ्यास के बाद ही खुल कर बात करने लगे। उनका दब्बू स्वभाव ठीक हो गया। 

आज ओशो के निर्वाण के बाद भी अगर बहुत बड़ी संख्या में लोग ओशो के दीवाने हैं तो इसके पीछे एक विशेष कारण तंत्र की साधनाओं का भी है। ओशो ने तंत्र के बारे में फैली भ्रांतियों को दूर करके इसका केवल थोड़ा सा संक्षिप्त रूप अपने अंदाज़ में संशोधित करके अपने आश्रमों में रखा जिससे लोगों को ज़िंदगी में सफलता के फायदे उपलब्ध सकें। सिद्धिओं की बात में किसी ने रुचि भी ली तो आम तौर पर ओशो उसे निरुत्साहित करते और पूछते क्या करोगे इन सिद्धिओं का? जो जन्म हाथ में है उसे सम्भालो आने वाले जन्मों की चिंता मत करो। ओशो के नज़दीक आने वाले साधक कभी सिद्धियों की तरफ आकर्षित नहुँ हुए। इसके बावजूद बहुत से वशिष्ठ लोगों ने पूर्व जन्म की स्मृति के प्रयास ओशो की सलाह पर किए। इनमें महिलाएं भी शामिल रहीं। अतीत में जा कर पूर्व जन्म की कईयों को सुख भी मिला होगा लेकिन जिन्हें सदमा और झटका लगा उनकी गिनती ज़्यादा थी।  लिए ओशो इस बात पर ज़ोर कि पूर्व जन्म देखा  दिखाया जा सकता है लेकिन उस अप्रत्यशित ज़िंदगी को देखने के लिए गहरी मेडिटेशन आवश्यक तांकि देखने  दृष्टा बना रह सके और खुद को उस अतीत से जोड़ कर मौजूदा ज़िंदगी को डिस्टर्ब न कर ले। एक बार एक महिला  गई तो लौट  हाल था। वह अपनी पिछली ज़िंदगी में कोई वेश्या थी और इस ज़िंदगी बहुत  रही थी। वह इस सत्य को  रही थी। फिर उसे अतीत के दर्शन दोबारा  प्रयास भी करने पड़े  तब कहीं जा कर उसकी ज़िंदगी नार्मल हो सकी।  

तंत्र पर चर्चा करते हुए ओशो बहुत सी जादूई लगने वाली घटनाओं का भी ज़िक्र करते हैं। वह बताते हैं कि सीलोन में बौद्ध भिक्षु आग पर चलते है। भारत में भी चलते है, लेकिन सीलोन की घटना अद्भुत है। वे घंटों आग पर चलते है। और जलते नहीं है। आम जनता के लिए यह कोतुहल का विषय है। बहुत ही हैरानीजनक बात लेकिन ओशो के अनुभवी साधक इस को ही पुरी तरह नज़रअंदाज़ कर देते हैं। 

    आग पर चलने या अग्नि स्नान करने जैसी बातों का विश्लेषण करते हुए ओशो पूरो गहराई में जाते हैं। इस पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा:कुछ वर्ष पहले ऐसा हुआ की एक ईसाई मिशनरी या फायर-वॉक देखने गया। यह वे पूर्णिमा की उस रात करते है जब बुद्ध ज्ञान को उपलब्‍ध हुए। क्‍योंकि उनका कहना है कि उस रात जगत को पता चला कि शरीर कुछ भी नहीं है। पदार्थ कुछ भी नहीं है कि अंतरात्‍मा सर्वव्‍यापक है और आग उसे जला नहीं सकती। सिद्धांत की बात वास्तविकता की कसौटी पर परखी गइंऔर खरी उतरी। 

      बात सिद्ध हुई लेकिन यह सब आसान तो नहीं था। इसके लिया कड़ी साधना होती है और परीक्षा भी कदम कदम पर। लेकिन जिन भिक्षुओं को आग पर चलना होता है वे उससे पहले एक वर्ष तक प्राणायाम और उपवास द्वारा अपने शरीर को शुद्ध करते हे। इसके साथ ही अपने मन को शुद्ध करने के लिए इसे पूरी तरह से खाली करने के लिए वे ध्‍यान करते हैं कि वे शरीर नहीं है। एक वर्ष वे लगातार तैयारी करते है। एक वर्ष तक पचास-साठ भिक्षुओं का समूह यह भाव करता रहता है, कि वे अपने शरीरों में नहीं है। इस लम्बे अभ्यास के बाद बात उनके दिल और दिमाग में घर करने लगती है की वे शरीर नहीं हैं। वे केवल आत्मा हैं और आत्मा को जलाया नहीं जा सकता। 

    गौरतलब है कि एक वर्ष लंबा समय होता है। हर क्षण केवल एक ही बात सोचते हुए कि वे अपने शरीरों में नहीं है। लगातार एक ही बात दोहराते हुए कि शरीर एक भ्रम है। वे ऐसा ही मानने लगते है। तब भी उन्‍हें आग पर चलने के लिए बाध्य नहीं किया जाता। परम्परा और नियमों के मुताबिक उन्‍हें आग के पास लाया जाता है। और जो भी सोचता है कि वह नहीं जलेगा, वह आग में कूद पड़ता है। कुछ ही क्षणों में लगने वाली इस छलांग का आधार केवल यही विश्वास होता है कि वह नहीं जलेगा।  होगा और उसे सचमुच कुछ नहीं होगा। जो कुछ दुसरे लोग संदेह करते रह जाते है झिझकते है। उन्‍हें आग में नहीं कूदने दिया जाता;क्‍योंकि यह सवाल आग के जलाने या जलने का नहीं है। यह उनके संदेह का सवाल है। अगर वे जरा सा भी झिझकते है तो उन्‍हें रोक दिया जाता है। तो साठ लोग तैयार किए जाते है। और कभी बीस, कभी तीस लोग आग में कूदते है। और बिना जले घंटो-घंटों उसमें नाचते रहते है। तंत्र और विश्वास का यह एक ऐसा अदभुत प्रस्तुतिकरण है जो एक खेल की तरह सामने आता है। 

इस संबंध में चर्चा करते हुए ओशो आगे चल कर तर्क और विश्वास की बातें भी करते हैं। मैं तुम्‍हें एक कहानी कहता हूं। जीसस ने अपने शिष्‍यों को कहा कि वे नाव से उस झील के दूसरे किनारे चले जाएं जहां वे सब ठहरे हुए थे। और वे बोले,’मैं बाद में आऊँगा।’ वे लोग चले गये। और दूसरे किनारे की और जा रहे थे तो बड़ा तेज तूफान आया। उथल-पुथल मच गई और लोग भय के मारे घबरा गये। नाव थपेड़े खा रही थी और वे सब रो रहे थे, चीखने-पुकारने लगे, चिल्‍लाने लगे। ‘जीसस हमें बचाओ।’ ऐसा सम्भव ही था और ऐसा ही हुआ भी। 

    वह किनारा जहां जीसस खड़े थे सचमुच में काफी दूर था। लेकिन जीसस आए। कहते है कि वे पानी पर दौड़ते हुए आये। और पहली बात उन्‍होंने शिष्‍यों को यह कहीं कि, ‘कम भरोसे के लोगो, क्‍यों रोते हो।’ क्‍या तुम्‍हें भरोसा नहीं है?’ वे तो भयभीत थे। जीसस बोले, ‘अगर तुम्‍हें भरोसा है तो नाव से उतरो और चलकर मेरी और आओ।’ वह पानी पर खड़े हुए थे। शिष्‍यों ने अपनी आंखों से देखा कि वे पानी पर खड़े है। लेकिन फिर भी यह मानना कठिन था। जरूर अपने मन में उन्‍होंने सोचा होगा कि ये कोई चाल है। या हो सकता है कोई भ्रम है। या यह जीसस ही न हो। शायद यह शैतान है जो उन्‍हें कोई प्रलोभन दे रहा है। तो वे एक-दूसरे का मुंह देखने लगे। कि कौन चलकर जाएगा। जब खुद पर विश्वास न हो तन भी इंसान तबाह हो जाता है और जब जिस पर आस्था है उस पर भी विश्वास न हो तो भी इंसान तबाही की तरफ चल देता है। 

      जीसस की आवाज़ सुन कर फिर एक शिष्‍य नाव से उतर कर चला। और सच में वह चल पाया। लेकिन इसके बावजुद वह हैरानी से भर गया। वह तो अपनी आंखों पर विश्‍वास न कर सका कि वह पानी पर चल रहा था। आशंका आते ही चमत्कार भी टूट गया। जब वह जीसस के करीब आया तो बोला, ‘कैसे? यह कैसे हो गया?’ तत्‍क्षण पूरा चमत्‍कार खो गया। ‘कैसे?’—और वह डूबने लगा। जीसस ने उसे बाहर निकाला और बोले, ‘कम भरोसे के आदमी,तू यह कैसे का सवाल क्‍यों पूछता है।’ इस शंका ने ही सब कुछ गंवा दिया था। 

     ऐसा अक्सर होता है लेकिन फिर भी इस आशंका से मुक्त हो पाना आसान नहीं होता। बुद्धि ‘क्‍यों?’ और ‘कैसे?’ जैसे बहुत से सवाल पूछती है। बुद्धि पूछती है। बुद्धि प्रश्‍न उठाती है। बुद्धि का काम ही शायद यही है। भरोसा है सब प्रश्‍नों को गिरा देना। अगर तुम सब प्रश्‍नों को गिरा सको और भरोसा कर सको तो यह विधि तुम्‍हारे लिए चमत्‍कार है। इस लिए बड़ी बात यह विधि है तो उससे भी बड़ी बात है भरोसा। 

इस तरह के करिश्मे आज भी दिखाई दे  जाते हैं। कुम्भ मेले को रिपोर्टिंग करने आयी BBC की टीम ने काफी कुछ ऐसा ही पाया। इस टीम को पता चला कि कई ख़ास किस्म के साधू कुम्भ स्नान से पहले अपने शरीर को अग्नि देवता को समर्पित करते हैं। बीबीसी जैसा ज़िम्मेदार मीडिया  बिना किसी जांच के कैसे रहता_ऐसे साधुओं का पता चला . . तो .. उन्होंने वीडियो शूट किया .. आग की गरमी इतनी थी के उनको दूर जाना पड़ा पर साधु को कुछ नहीं हुआ।  सवाल ज़ह भी उठा कि कहीं कपड़ो में कुछ केमिकल तो नहीं है? इसकी भी जाँच की गई पर कुछ नहीं मिला। केवल और केवल उन साधुओं का ध्यान मंत्रोचार में ही था। तंत्र मंत्र और साधना की दुनिया में इसे ही सिद्ध साधु कहते  हैं। कुम्भ के मेले में मीडिया ने ऐसे  400 साधु सन्यासियों का मिलन देखा गया। ये हे हिन्दू धर्म से सबंधित साधु और इस धर्म की महानता। कहा जाता है कि BBC की विज्ञान  सबंधित टीम ने भी इसका परीक्षण किया। इसे उनके चैनल ने किसी रात को टेलीकास्ट भी किया था। इसी तरह के कई मामले देखने में आते रहते हैं।  

आखिर तंत्र विज्ञान है क्या?

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